सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८ पुष्कर सरोवर में खिले हुये सफेद कमल पर काला भ्रमरसमूह इस प्रकार शोभित हो रहा है मानों सूर्य की गरमी से घबरा कर शरद् ऋतु का सफेद बादल अपने साथ काले आकाश के टुकड़े को लेकर पुष्कर के जल में आ गिरा हो !— 'अत्रावदातं शतपत्रजातं भृङ्गैः क्वचित् मेचकितं चकास्ति । सव्योम शङ्के शरदभ्रखण्डं सूर्यांशुतापात् पतितं पयःसु ।।' (७, ४२) नीली यमुना के किनारे किनारे लाल कमल खिल रहे हैं और उनके कारण यमुना पापों के खून से लाल धार वाली धर्मराज की तलवार लग रही है— 'रक्तोत्पलैरभिनवैरभितः स्फुरद्भिः स्फीतेन्द्रनीलमणिमेदुरमुग्धवेणिः । आभाति पातकततिक्षतजाक्तधारा धर्मस्य खड्गलतिकेव कलिन्दकन्या ।। (१८, २७) यद्यपि यमुना और गंगा दोनों ही संसार को पवित्र करने वाली हैं, तथापि भगवान् कृष्ण ने गंगा में तो केवल पाँव ही धोया (गंगा विष्णु के पैर से निकली है) किन्तु यमुना में गोपियों के साथ वारिविहार किया— 'इयञ्च गीर्वाणतरङ्गिणी च कामं जगत्पावनतां दधाते । परन्तु धौतं पदमेव तस्याम्यज्जगाहे हरिणा विहारे ।।' (१८, २९) जिनके स्मरणमात्र से द्रौपदी का वस्त्र असीम बन गया, वे भगवान् कृष्ण वृन्दावन में गोपियों वस्त्र चुराया करते थे— 'यस्य स्मृतावपि सपत्नतिरस्कृताया निःसीममम्बरमभूद् द्रुपदात्मजायाः । यत्राम्बराणि स लसत्कलस्तनीनामस्तेनयद् विकचनीपवनीविलासी ।।' (१८,५३) वृन्दावनवासी मोर अपने मित्र मेघ की ओर भी, घनश्याम का स्मरण हो जाने के कारण— उन घनश्याम का जो उन मोरों के स्वयं गिरे हुये पंखों को अपने मस्तक का आभूषण बनाते थे, नाचना छोड़ कर बड़ी कठिनता से आँसू बहाते हुये देख पाते थे— 'बर्हेण येषां विदधे वतंसं कंसस्य शत्रुः स्वयमुज्झितेन । कलापिनः प्रोज्झितताण्डवास्ते विलोकयन्ति स्म घनं संवाष्पाः ।।' (१८,६७) गंगा का वर्णन करते हुये कवि कहते हैं—ब्रह्मा जी के कमण्डलु में रहने के कारण यह गंगा तो पहले ही पवित्र थी, फिर विष्णु भगवान् का चरण धोकर यह और अधिक पवित्र हुई और फिर भगवान् शिव की जटा में रहने के कारण इसकी पवित्रता अनिर्वचनीय बन गई ; फिर जब यह काशी से मिल गई तो इसका जल, जल न रह कर, द्रवीभूत धर्म हो गया; ऐसी गंगा के माहात्म्य का वर्णन कौन कर सकता है?— 'प्रागेव पुण्यसलिलाथ हरेः पदाब्जं प्राप्ता ततोऽनुपरिपृष्टहरोत्तमाङ्गी । धर्मद्रवी यदि पुनर्मिलितेह काश्यां कोऽस्या महित्वमभिधातुमहो क्षमः स्यात् ।।' (१९,२८)