सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७ ललनाओं के लिये भावि वैधव्यसूचक स्तनहारनिर्गुणत्व बन गई । आश्चर्य है कि एक रजोगुण ही तमोगुण, सत्वगुण और निर्गुण बन गया ! — ‘यस्मिन् जयाहितमतौ समराजिरेषु जातं रजः प्रतिभटेषु तमस्तदेव । सत्वं सपत्नपृतनासुविपक्षजायावक्षोजहारलतिकास्र्वपि निर्गुणत्वम् ॥' (१,३९) राजा को प्रस्थान के समय शुभशकुनरूप जल से भरे हुये घड़े मिले । कवि कहते हैं कि कुम्भस्तनी स्त्रियों से आलिङ्गित कण्ठ वाले ये घड़े मानों अपने परिपाक के लिये किये गये अग्नि- प्रवेश रूपी तप का फल भोग रहे हैं— ‘समश्नुवानान् स्वपरोपतापाद्वह्निप्रवेशोग्रतपःफलानि । कुम्भस्तनीभिः परिरब्धकण्ठान् संभावयामास स पूर्णकुम्भान् ॥' (३,५) कवि ने कितने सरल और सरस शब्दों में पूर्वराग का चित्र खींचा है। दूती नायक से नायिका की दशा का वर्णन कर रही है—घुटने पर कुहनी, शिथिल हाथ पर गाल