सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
पृष्ठ 14, कुल 256 में से
संदर्भ में पढ़ें१६ हमारे कवि की कल्पना का एक और उदाहरण देखिये—वासुदेव राजा की शुभ्र कीर्ति- हंसी शत्रुओं के दुष्कीर्तिरुपी कीचड़ में पड़े हुये उनके बचे खुचे यश रूपी कमलतन्तुओं को खा- जाने के लिये ढूंढ़ती हुई सारे विश्व में घूम रही है— 'दुष्कीर्तिपङ्कगतवैरियशोमृणाललेशानशेषयितुमाशु गवेषयन्ती । यस्योल्लसद्विशदवारिगर्भशुभ्रा बभ्राम विश्वमखिलं किल कीर्तिहंसी ।।' (१,१५) एक साथ दानवीर और युद्धवीर का उदाहरण देखिये— यदि वासुदेव राजा बलात् घेरे गये शत्रुओं की ललनाओं के आँसुओं से चम्बल नदी को वापस न भर देते तो निःसन्देह चम्बल का सारा पानी उनके दानसंकल्पों के जल में खर्च हो जाता और चम्बल में कीचड़ ही कीचड़ रह जाता— 'एतस्य दानसलिलव्ययितप्रवाहा चर्मण्वती ध्रुवमधास्यत पङ्कभावम् । नाऽपूरयिष्यत यदि प्रसभोपरुद्धविद्वेषिवामनयनानयनाम्बुपूरैः ।।' (१, १८) हम्मीरदेव के प्रताप के विषय में कवि लिखते हैं—स्नानार्थ आई हुईं देवाङ्गनाओं द्वारा अर्पित पारिजात पुष्पों से प्रवृद्ध शोभा वाली और मंगलमय प्रवाह वाली चम्बल आज भी वीर हम्मीरदेव के यश को अपने कलकल शब्दों से मानों वीणा बजाती हुई गा रही है— 'सुराङ्गनावर्जितपारिजातप्रसूनपर्याप्ततरङ्गशोभा । चर्मण्वती शर्ममयप्रवेणी प्रवीणयामास यशांसि यस्य ।।' (११, ४०) कवि ने हम्मीरदेव के मुख से कितनी सुन्दर वीरोक्ति कहलाई है—चौहाण वंश या तो शत्रुमंडल को भेद कर विजय प्राप्त करता है और या युद्ध में वीरगति पाकर आदित्यमंडल को भेदता हुआ स्वर्ग प्राप्त करता है; चौहाण वंश अपने आगे विनीत होने वाले पुरुष को करावलम्ब (हाथ का सहारा) देकर उठाता है, वह किसी दूसरे राजा को करदान नहीं देता— 'रिपुमण्डलमर्कमण्डलं वा तरसोच्चैःपदलब्धये भिनत्ति । तनुते प्रणते करावलम्बं करदानं नहि चाहुवाणवंशः ।।' (१२, २६) अन्य उक्ति देखिये—इससे बढ़ कर और क्या अपमान और लज्जा की बात हो सकती है कि लोग वीरों की युद्ध में पीठ और कुलीन स्त्रियों का वक्षःस्थल देख सकें ? — 'अतः परं किन्नु विडम्बनं स्यादपत्रपायाः परमावधिर्वा । पृष्ठं परे यत् समितौ भटानां पश्यन्ति वक्षोऽपि कुलाङ्गनानाम् ।।' (१७,४३) कवि की कल्पना का एक और उत्कृष्ट उदाहरण देखिये—युद्धभूमि में विजयी राजा की सेना से जो धूल (रजः) उठी वह शत्रुओं के लिये अन्धकार (तमः) बन गई और अपनी सेना के लिये साहस तथा बल (सत्व) बन गई तथा शत्रुओं की स्त्रियों के हारों के सूत्र (गुण) को तोड़ कर उन्हें निर्गुण बना देने वाली बन गई । राजा की रजोगुणजन्य शत्रुमारणप्रवृत्ति शत्रुओं के लिये तमोगुणजन्य किंकर्तव्यविमूढ़ता, अपनी सेनाओं के लिये सत्वगुणजन्य उत्साह और शत्रु-