सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
१६ हमारे कवि की कल्पना का एक और उदाहरण देखिये—वासुदेव राजा की शुभ्र कीर्ति- हंसी शत्रुओं के दुष्कीर्तिरुपी कीचड़ में पड़े हुये उनके बचे खुचे यश रूपी कमलतन्तुओं को खा- जाने के लिये ढूंढ़ती हुई सारे विश्व में घूम रही है— 'दुष्कीर्तिपङ्कगतवैरियशोमृणाललेशानशेषयितुमाशु गवेषयन्ती । यस्योल्लसद्विशदवारिगर्भशुभ्रा बभ्राम विश्वमखिलं किल कीर्तिहंसी ।।' (१,१५) एक साथ दानवीर और युद्धवीर का उदाहरण देखिये— यदि वासुदेव राजा बलात् घेरे गये शत्रुओं की ललनाओं के आँसुओं से चम्बल नदी को वापस न भर देते तो निःसन्देह चम्बल का सारा पानी उनके दानसंकल्पों के जल में खर्च हो जाता और चम्बल में कीचड़ ही कीचड़ रह जाता— 'एतस्य दानसलिलव्ययितप्रवाहा चर्मण्वती ध्रुवमधास्यत पङ्कभावम् । नाऽपूरयिष्यत यदि प्रसभोपरुद्धविद्वेषिवामनयनानयनाम्बुपूरैः ।।' (१, १८) हम्मीरदेव के प्रताप के विषय में कवि लिखते हैं—स्नानार्थ आई हुईं देवाङ्गनाओं द्वारा अर्पित पारिजात पुष्पों से प्रवृद्ध शोभा वाली और मंगलमय प्रवाह वाली चम्बल आज भी वीर हम्मीरदेव के यश को अपने कलकल शब्दों से मानों वीणा बजाती हुई गा रही है— 'सुराङ्गनावर्जितपारिजातप्रसूनपर्याप्ततरङ्गशोभा । चर्मण्वती शर्ममयप्रवेणी प्रवीणयामास यशांसि यस्य ।।' (११, ४०) कवि ने हम्मीरदेव के मुख से कितनी सुन्दर वीरोक्ति कहलाई है—चौहाण वंश या तो शत्रुमंडल को भेद कर विजय प्राप्त करता है और या युद्ध में वीरगति पाकर आदित्यमंडल को भेदता हुआ स्वर्ग प्राप्त करता है; चौहाण वंश अपने आगे विनीत होने वाले पुरुष को करावलम्ब (हाथ का सहारा) देकर उठाता है, वह किसी दूसरे राजा को करदान नहीं देता— 'रिपुमण्डलमर्कमण्डलं वा तरसोच्चैःपदलब्धये भिनत्ति । तनुते प्रणते करावलम्बं करदानं नहि चाहुवाणवंशः ।।' (१२, २६) अन्य उक्ति देखिये—इससे बढ़ कर और क्या अपमान और लज्जा की बात हो सकती है कि लोग वीरों की युद्ध में पीठ और कुलीन स्त्रियों का वक्षःस्थल देख सकें ? — 'अतः परं किन्नु विडम्बनं स्यादपत्रपायाः परमावधिर्वा । पृष्ठं परे यत् समितौ भटानां पश्यन्ति वक्षोऽपि कुलाङ्गनानाम् ।।' (१७,४३) कवि की कल्पना का एक और उत्कृष्ट उदाहरण देखिये—युद्धभूमि में विजयी राजा की सेना से जो धूल (रजः) उठी वह शत्रुओं के लिये अन्धकार (तमः) बन गई और अपनी सेना के लिये साहस तथा बल (सत्व) बन गई तथा शत्रुओं की स्त्रियों के हारों के सूत्र (गुण) को तोड़ कर उन्हें निर्गुण बना देने वाली बन गई । राजा की रजोगुणजन्य शत्रुमारणप्रवृत्ति शत्रुओं के लिये तमोगुणजन्य किंकर्तव्यविमूढ़ता, अपनी सेनाओं के लिये सत्वगुणजन्य उत्साह और शत्रु-
१७ ललनाओं के लिये भावि वैधव्यसूचक स्तनहारनिर्गुणत्व बन गई । आश्चर्य है कि एक रजोगुण ही तमोगुण, सत्वगुण और निर्गुण बन गया ! — ‘यस्मिन् जयाहितमतौ समराजिरेषु जातं रजः प्रतिभटेषु तमस्तदेव । सत्वं सपत्नपृतनासुविपक्षजायावक्षोजहारलतिकास्र्वपि निर्गुणत्वम् ॥' (१,३९) राजा को प्रस्थान के समय शुभशकुनरूप जल से भरे हुये घड़े मिले । कवि कहते हैं कि कुम्भस्तनी स्त्रियों से आलिङ्गित कण्ठ वाले ये घड़े मानों अपने परिपाक के लिये किये गये अग्नि- प्रवेश रूपी तप का फल भोग रहे हैं— ‘समश्नुवानान् स्वपरोपतापाद्वह्निप्रवेशोग्रतपःफलानि । कुम्भस्तनीभिः परिरब्धकण्ठान् संभावयामास स पूर्णकुम्भान् ॥' (३,५) कवि ने कितने सरल और सरस शब्दों में पूर्वराग का चित्र खींचा है। दूती नायक से नायिका की दशा का वर्णन कर रही है—घुटने पर कुहनी, शिथिल हाथ पर गाल
१८ पुष्कर सरोवर में खिले हुये सफेद कमल पर काला भ्रमरसमूह इस प्रकार शोभित हो रहा है मानों सूर्य की गरमी से घबरा कर शरद् ऋतु का सफेद बादल अपने साथ काले आकाश के टुकड़े को लेकर पुष्कर के जल में आ गिरा हो !— 'अत्रावदातं शतपत्रजातं भृङ्गैः क्वचित् मेचकितं चकास्ति । सव्योम शङ्के शरदभ्रखण्डं सूर्यांशुतापात् पतितं पयःसु ।।' (७, ४२) नीली यमुना के किनारे किनारे लाल कमल खिल रहे हैं और उनके कारण यमुना पापों के खून से लाल धार वाली धर्मराज की तलवार लग रही है— 'रक्तोत्पलैरभिनवैरभितः स्फुरद्भिः स्फीतेन्द्रनीलमणिमेदुरमुग्धवेणिः । आभाति पातकततिक्षतजाक्तधारा धर्मस्य खड्गलतिकेव कलिन्दकन्या ।। (१८, २७) यद्यपि यमुना और गंगा दोनों ही संसार को पवित्र करने वाली हैं, तथापि भगवान् कृष्ण ने गंगा में तो केवल पाँव ही धोया (गंगा विष्णु के पैर से निकली है) किन्तु यमुना में गोपियों के साथ वारिविहार किया— 'इयञ्च गीर्वाणतरङ्गिणी च कामं जगत्पावनतां दधाते । परन्तु धौतं पदमेव तस्याम्यज्जगाहे हरिणा विहारे ।।' (१८, २९) जिनके स्मरणमात्र से द्रौपदी का वस्त्र असीम बन गया, वे भगवान् कृष्ण वृन्दावन में गोपियों वस्त्र चुराया करते थे— 'यस्य स्मृतावपि सपत्नतिरस्कृताया निःसीममम्बरमभूद् द्रुपदात्मजायाः । यत्राम्बराणि स लसत्कलस्तनीनामस्तेनयद् विकचनीपवनीविलासी ।।' (१८,५३) वृन्दावनवासी मोर अपने मित्र मेघ की ओर भी, घनश्याम का स्मरण हो जाने के कारण— उन घनश्याम का जो उन मोरों के स्वयं गिरे हुये पंखों को अपने मस्तक का आभूषण बनाते थे, नाचना छोड़ कर बड़ी कठिनता से आँसू बहाते हुये देख पाते थे— 'बर्हेण येषां विदधे वतंसं कंसस्य शत्रुः स्वयमुज्झितेन । कलापिनः प्रोज्झितताण्डवास्ते विलोकयन्ति स्म घनं संवाष्पाः ।।' (१८,६७) गंगा का वर्णन करते हुये कवि कहते हैं—ब्रह्मा जी के कमण्डलु में रहने के कारण यह गंगा तो पहले ही पवित्र थी, फिर विष्णु भगवान् का चरण धोकर यह और अधिक पवित्र हुई और फिर भगवान् शिव की जटा में रहने के कारण इसकी पवित्रता अनिर्वचनीय बन गई ; फिर जब यह काशी से मिल गई तो इसका जल, जल न रह कर, द्रवीभूत धर्म हो गया; ऐसी गंगा के माहात्म्य का वर्णन कौन कर सकता है?— 'प्रागेव पुण्यसलिलाथ हरेः पदाब्जं प्राप्ता ततोऽनुपरिपृष्टहरोत्तमाङ्गी । धर्मद्रवी यदि पुनर्मिलितेह काश्यां कोऽस्या महित्वमभिधातुमहो क्षमः स्यात् ।।' (१९,२८)
१९ राव सुर्जन के काशी में प्रतिदिन असीम वस्त्र बाँटने के कारण एक स्वतन्त्र भगवान् शिव ही ऐसे बच गये थे जो अपनी आदत से मज़बूर होकर गजचर्म पहनते थे— 'विश्राणयत्यनुदिनं ननु दीनबन्धौ तस्मिन्नसीमवसनान्यविशेषदृष्ट्या। आत्मस्वभावपरतन्त्रतया स्वतन्त्रोऽप्येकः परं पुरहरोऽजनि कृत्तिवासाः ॥' (१९,३४) कवि ने भगवान् शिव की क्या मीठी चुटकी ली है—स्वामी चाहे कितना ही बड़ा क्यों न हो और चाहे कितना ही प्रसन्न क्यों न हो जाय, किन्तु वह अपने वैभव के अनुसार ही पुरस्कार दे सकता है; यही कारण था कि भगवान् शिव ने राव सुर्जन से अत्यन्त प्रसन्न होकर भी उनको पहिनने के लिये गजचर्म और सवारी के लिये बैल ही दिया ! — 'भूरिप्रसादसुमुखोऽपि सदीश्वरोऽपि भृत्यं यथाविभवमेव पुरस्करोति । यद् वाहनं वृषभमम्बरमैभकृत्तिं तस्मै ददे प्रमुदितोऽपि स कृत्तिवासाः ॥' (१९, ४४) राव भोज के शुभ्र यश को प्रसन्न किन्नर कामिनियां विन्ध्याचल पर बैठ कर गाती है; इसलिये वह यश शुभ्र हिम के समान जम कर विन्ध्याचल पर व्याप्त हो गया है; शायद यही कारण है कि पिता के पास रहने की इच्छुक भगवती विन्ध्यवासिनी, विन्ध्याचल को हिमालय समझ कर उसे छोड़ना नहीं चाहती— पिण्डीभूततुषारपाण्डरतरे यस्यानुविन्ध्यं यशः- स्तोमे किन्नरकामिनीभिरभितः प्रोद्गीयमाने मुदा । प्रालेयाचलशङ्कया पितृगृहावासाय बद्धस्पृहा शैलेन्द्रं तमपोहितुं न सहते मन्ये नगेन्द्रात्मजा ॥' (२०, ५६) ओज और शब्दाडम्बर का नमूना भी देखिये— 'कोदण्डं गाण्डिवस्याप्युपचितयशसचण्डतां खण्डयन्तं दोर्दण्डोद्दण्डदर्पप्रकटितविकटध्वानधन्यं धुनानः । काण्डीरः काण्डपातैरथ रिपुरथिनां खण्डयन् मुण्डजालं । तस्तार स्फारधारोद्धुररुधिरधुनीधोरणीभिर्धरित्रीम् ॥' (४, ३९) विविध स्वरों, शब्दों और नादों के वर्णन में हमारे कवि ने कमाल किया है। तृतीय सर्ग में (श्लोक ४६–५०) देवी के मन्दिर में होने वाली विविध ध्वनियों और शब्दों का वर्णन ; अट्ठारहवें सर्ग में (श्लोक ४५–४९) वृन्दावन में भ्रमरों की गूँज, मयूरों की केका, कोयलों की काकली, शुकसारिकाओं की कथा, कपोती का घूत्कार, सारसों और हंसों के शिञ्जित तथा दात्यूह, कबूतर, तीतर आदि के स्वरों का वर्णन; एवं सत्तरहवें सर्ग में (श्लोक ८–१०) युद्ध में होने वाले विविध घोषों का वर्णन बहुत सुन्दर है। ऊपर दिये गये उद्धरणों से पाठकों को हमारे कवि की प्रतिभा का कुछ परिचय प्राप्त हो जायगा। यदि इसका विस्तृत वर्णन और आलोचना की जाय तो भूमिका का कलेवर बहुत बढ़ जायगा। महाकवि चन्द्रशेखर को संस्कृत साहित्य में निःसन्देह बहुत उच्च स्थान प्राप्त होगा। 0
२० इस अमूल्य ग्रन्थरत्न के इतिहास पक्ष का इतिहास के विद्वान् और साहित्यिक पक्ष का साहित्य के विद्वान् विवेचन करें। मेरा कार्य तो इस महान् महाकाव्य को प्रकाश में लाना है। इस ग्रन्थ को हिन्दी अनुवाद और संस्कृत टिप्पणी सहित प्रकाशित करके मैंने संस्कृत-साहित्य और हिन्दी-साहित्य की कुछ सेवा करने का प्रयास किया है। कुछ शब्द अपने अनुवाद के विषय में भी कह दूं । अनुवाद अनुवाद ही होता है और उसमें मूल का सौन्दर्य कदापि नहीं आ सकता । अनुवाद भावों का हो सकता है; शब्द-लालित्य का नहीं हो सकता । और फिर प्रत्येक साहित्य की अपनी अपनी परम्परा होती है जिसका सौन्दर्य अनुवाद में नहीं आ सकता। मेरे सामने कठिनाई यह थी कि यदि संस्कृत का शाब्दिक अनुवाद करूँ तो हिन्दी की हत्या होती है और यदि हिन्दी का ध्यान रखूँ तो संस्कृत का यथार्थ अनुवाद नहीं होता । अपने अनुवाद में मैंने संस्कृत और हिन्दी दोनों का ध्यान रखने का प्रयत्न किया है। जो संस्कृत साधारण जानते हैं वे इस अनुवाद की सहायता से श्लोकों को समझ लेंगे और जो संस्कृत बिलकुल नहीं जानते वे भी, केवल अनुवाद ही पढ़ कर, मेरे विचार से, साहित्य का कुछ रसास्वाद ले सकेंगे । सबसे पहले मैं श्रीमान् दानवीर, गुणग्राही, विद्या-प्रेमी और उदार कोटानरेश के प्रति हार्दिक आभार प्रकट करता हूँ क्योंकि उन्हीं की कृपापूर्ण आर्थिक सहायता के कारण यह ग्रन्थ प्रकाशित हो रहा है। इस सत्कार्य में श्रीमान् कोटानरेश के प्रातिस्विक अमात्य और मेरे परम- स्नेहास्पद साहित्य-प्रेमी श्रीमान् आप दलेलसिंह जी साहब ने अत्यन्त सहायता दी है और एतदर्थ उनको हार्दिक धन्यवाद देता हूँ । एक ही आदर्शपुस्तक होने पर पाठसंशोधन आदि का कार्य अत्यन्त जटिल हो जाता है । कहीं कहीं पाठ खण्डित हो रहा है । जो श्लोक आधे से अधिक छूट रहे हैं उनको मैंने वैसे ही रहने दिया है। जहाँ जहाँ कुछ कुछ लेख-त्रुटि हुई है उसे अपनी बुद्धि के अनुसार शुद्ध और पूर्ण कर दिया है। कहीं कहीं जो पाठ मैंने अधिक उचित समझा उसे ही दिया है। पाठ संशोधन और संस्कृत-टिप्पण आदि सत्कार्य में मुझे महामहोपाध्याय वाचस्पति श्रीमान् पण्डित गिरि- धर जी शर्मा चतुर्वेदी और सर्वतन्त्रस्वतन्त्र कवितार्किकचक्रवर्ती श्रीमान् पण्डित महादेव जी पाण्डेय से अत्यधिक सहायता मिली है। इन दोनों गुरुजनों की मुझ पर पूर्ण कृपा रही है और इन दोनों की सहायता और आशीर्वाद के कारण ही यह ग्रन्थ इतने शुद्ध और सुन्दर रूप में निकल रहा है। मैं इन दोनों गुरुजनों के प्रति हार्दिक आभार प्रदर्शित करता हूँ । मैं अपने स्नेही श्रीयुत पं० गौरीशङ्कर जी मिश्र और भार्गव भूषण प्रेस के सर्वस्व श्रीयुत पं० पृथ्वीनाथ जी भार्गव को धन्यवाद दिये बिना नहीं रह सकता क्योंकि इस ग्रन्थ की इतनी सुन्दर छपाई का सारा श्रेय इन सज्जनों को ही है। हिन्दू विश्वविद्यालय, चन्द्रधर शर्मा काशी २५-११-५२
विषयानुक्रमः प्रथमः सर्गः विषयः पृष्ठसंख्या श्लोकसंख्या मङ्गलाचरणम् ... ... ... ... ... ... ... १-२ १-४ सज्जनप्रशंसा ... ... ... ... ... ... ... २ ५ काव्यस्य रचनाहेतुः ... ... ... ... ... ... ... २ ७ खलनिन्दा ... ... ... ... ... ... ... ३ ८ आद्यचौहाननृपतेर्वासुदेवस्य वर्णनम् ... ... ... ... ... ... ... ३-५ ९-१९ तत्पुत्रनरदेववर्णनम् ... ... ... ... ... ... ... ५ २० तत्पुत्रश्रीचन्द्रवर्णनम् ... ... ... ... ... ... ... ५ २१ तत्पुत्रस्याऽजयपालस्य वर्णनम् ... ... ... ... ... ... ... ५-६ २२-२३ तत्पुत्रजयराजवर्णनम् ... ... ... ... ... ... ... ६ २४ तत्पुत्रसामन्तसिंहवर्णनम् ... ... ... ... ... ... ... ६ २५ तत्पुत्रगुर्वकवर्णनम् ... ... ... ... ... ... ... ६ २६ तत्पुत्रस्य चन्दनस्य वर्णनम् ... ... ... ... ... ... ... ६-७ २७-२८ तत्पुत्रवज्रस्य वर्णनम् ... ... ... ... ... ... ... ७ २९ तत्पुत्रविश्वपतेः प्रतापवर्णनम् ... ... ... ... ... ... ... ७-१० ३०- द्वितीयः सर्गः अन्यभूभृतामविशिष्टतया राज्ञो विश्वपतेर्निर्वेदवर्णनम् ... ... ... ११-१२ १-१२ विश्वपतेर्गुरुपुत्रस्य सुनयस्य वर्णनम् ... ... ... ... १२-१३ १३-२० सुनयस्य रहसि राज्ञे निर्वेदानौचित्यनिवेदनम् ... ... ... १४-१६ २१-४१ सुनयं प्रति विश्वपतेरचलकीर्तिलिप्सोपस्थापनम् ... ... ... १७ ४२-४५ विश्वपतिं प्रति सुनयस्य शाकम्भरीदेव्या आराधनोपदेशः ... १७-२० ४६-६३ तृतीयः सर्गः विश्वपतेः सुनयेन सह शाकम्भरीमन्दिरं प्रति प्रस्थानवर्णनम् .... ... २१-२२ १-१० विश्वपतेः शाकम्भरीप्रदेशप्रवेशवर्णनम् ... ... ... २२-२३ ११-१४ शाकम्भरीमन्दिरपुष्पवाटिकावर्णनम् ... ... ... २३-२४ १५-२२ सुनयकृतं देवीमन्दिरवर्णनम् ... ... ... २४-२९ २३-५० विश्वपतेर्देव्याराधनवर्णनम् ... ... ... २९-३० ५१-६२ देव्याः प्रादुर्भावः ... ... ... ३१ ६३-६९ चतुर्थः सर्गः विश्वपतिकृता देवीस्तुतिः ... ... ... ३२-३५ १-२३ देव्या वरदानं लवणसमुद्रनिर्माणञ्च ... ... ३५-३६ २४-२९
लदेव"? Look at the letter: 'दु' or 'गु'? In 'गुन्ददेव' (line 17), 'गु' has a straight left stem and curved bottom. In line 22, the letter starts with a top horizontal, goes down slightly, curves right and has a tail like 'द', with a 'ु' (u matra). Wait, look at line 21: 'दु' in 'दुर्लभराज'. It is identical! So it is definitely 'दु': 'दुलसदेववर्णनम्'!
Wait, look at line 28: "तत्पुत्रवल्हणप्रतापवर्णनम् ... ... ... ... ६०-६१ ८३-८६" There is a hyphen before ६०: "-६०-६१".
Wait, look at the page number in line 25: ५८-६० The '५' has an ink smudge: looks like ५८-६०.
Let's check line 35: "तदानीमेव सूर्यमण्डलादवतीर्णस्य चतुर्बाहुमतश्चौहाणवंशप्रवर्तकस्य" Wait, does it have dots and page number on line 35? No, line 35 wraps into line 36: "तेजोमयपुरुषस्य वर्णनम् ... ... ... ... ७१ ५८-६०" This is a two-line entry.
Line 37: "पुरोधसा पुष्कर
१. सर्ग १-५: चाहमान (चौहान) वंशोत्पत्ति, शाकम्भरी, अजमेर एवं बूँदी हाड़ा राज्य-स्थापना
२३ विषयः पृष्ठसंख्या श्लोकसंख्या अष्टमः सर्गः अनलदेवेन पुष्करतीर्थे षट्प्रासादमन्दिरोद्याननिर्माणम् ... ... ... ७३-७६ १-२५ तत्पुत्रजगदेववर्णनम् ... ... ... ... ... ७६ २६-२७ तत्पुत्रवीसलदेववर्णनम् ... ... ... ... ... ७६ २८-३१ तत्पुत्राजयपालवर्णनम् ... ... ... ... ... ७६-७७ २९-३१ वसन्तवर्णनम् ... ... ... ... ... ७७-८० ३२-५६ नवमः सर्गः अजयपालस्य कामिनीभिः सह वसन्तशोभादर्शनार्थमुद्यानप्रवेशस्ताभिः सह केलिवर्णनञ्च ... ... ... ८१-८३ १-१८ राज्ञा कस्याश्चिदलौकिकसुन्दर्या दर्शनं राज्ञः कामपीडावर्णनञ्च ... ... ८३-८५ १९-२९ सुन्दर्याः सरोवरेऽन्तर्धानम् ... ... ... ... ८५ ३० राज्ञो विह्वलत्वं तत्प्राप्त्युपायचिन्तनञ्च ... ... ... ८५ ३१-३३ राज्ञः सदसि सिद्धपुरुषागमनं तस्य च सुन्दर्या नागकन्यात्वमुपपाद्य तत्प्राप्त्यर्थं भगवदाराधनमुपदिश्यान्तर्धानम् ... ... ... ८५-८७ ३४-४७ अजयपालस्य भगवत्प्रसादेन सरसि प्रविश्य नागलोकगमनम् ... ... ८७ ४८-४९ नागलोकवर्णनम् ... ... ... ... ... ८७-८८ ५०-५४ राज्ञा शेषनागदर्शनं शेषवर्णनञ्च ... ... ... ८८-८९ ५५- शेषप्रसादेन सुदामनागस्य दुहितरं विजयां परिणीय तया सह राज्ञः स्वराजधानीपरावर्तनम् तत्पुत्रगंगदेववर्णनञ्च ... ... ८९-९० ६२- दशमः सर्गः तत्पुत्रसोमेश्वरवर्णनम् कर्पूरदेव्याः पाणिग्रहणम् ... ... ... ९१ १-६ तयोः पृथ्वीराजमाणिक्यराजयोरुत्पत्तिः ... ... ... ९२ ७-९ पृथ्वीराजवर्णनम् ... ... ... ... ... ९२ १० पृथ्वीराजसविधे कान्यकुब्जेश्वरकन्यकाकान्तिमतीसख्या आगमनं तया कृतं कान्तिमतीसौन्दर्यवर्णनञ्च ... ... ... ... ९२-९३ ११-१८ कान्तिमत्याः पृथ्वीराजेऽनुरागवर्णनं तस्याः पूर्वरागदशाया वर्णनञ्च ... ९३-९७ १९-४६ राज्ञा दूतीमाश्वास्य विसर्जनं छद्मवेशेन सामन्तमुख्यैः सह कान्यकुब्जप्रवेशश्च ९७-९९ ४७-६२ गंगायां मीनैः क्रीडतः पृथ्वीराजस्य कान्तिमत्या दर्शनं तत्सविधे सखीप्रेषणं राज्ञः सखीसंभाषणञ्च ... ... ... ९९-१०४ ६३-९७ राज्ञःप्रच्छन्नवेशेनान्तःपुरे प्रवेश कान्तिमत्या सह स्वपुरं प्रति पलायनञ्च १०४-१०६ ९८-११८ तत्सामन्तानां कान्यकुब्जेश्वरसेनया सह युद्धवर्णनं तेषां वीरगतिश्च ... १०७ ११९-१२२ राजेन्द्रप्रस्थं प्राप्य तत्र कान्यकुब्जेश्वरसेनामन्यनं कान्यकुब्जेश्वरपराजयश्च १०७ १२३-१२५ पृथ्वीराजेन कृतो यवनपतिशहाबुद्दीनपराजयः ... ... ... १०८ १२६-१२८ शहाबुद्दीनेन पृथ्वीराजं निर्जित्य स्वदेशं नीत्वा तस्याऽन्धीकरणम् ... ... १०८ १२९-१३२
२४ विषयः पृष्ठसंख्या श्लोकसंख्या तत्र पृथ्वीराजस्य चन्देन समागमः तत्साहाय्येन शहाबुद्दीनवधश्च ... ... १०८–११३ १३३–१६४ स्वदेशमागत्य पृथ्वीराजस्य स्वर्गमनम् ... ... ... ... ११३ १६५–१६६ एकादशः सर्गः तत्सुतप्रह्लादवर्णनम् ... ... ... ... ... ... ११४ १–२ तत्सुतगोविन्दराजवर्णनम् ... ... ... ... ... ११४ ३ तत्सुतवीरनारायणवर्णनम् ... ... ... ... ... ११४ ४ तत्सुतवाग्भटवर्णनम् ... ... ... ... ... ... ११४ ५ तत्सुतजैत्रसिंहवर्णनम् ... ... ... ... ... ... ११४ ६ जैत्रसिंहात् हम्मीरदेवस्योत्पत्तिः ... ... ... ... ... ११४ ७ हम्मीरदेवयशोवर्णनम् ... ... ... ... ... ... ११५–११७ ८–२१ हम्मीरदेवस्य पट्टनपुरं प्रति प्रस्थानम् ... ... ... ... ११७ २२–२५ तिलद्रोणिनदीवर्णनम् ... ... ... ... ... ... ११७–११८ २६–२७ पारियात्रगिरिवर्णनम् तत्र राज्ञा कृताया बिल्वेश्वरपूजाया वर्णनञ्च ... ११८–११९ २८–३७ पट्टपुरवर्णनम् ... ... ... ... ... ... ११९ ३८ हम्मीरस्य पट्टनपुरप्रवेशश्चर्मण्वतीस्नानं मृत्युञ्जयार्चनञ्च ... ... १२० ३९–४१ हम्मीरस्य सूर्यग्रहणे तुलादानवर्णनम् ... ... ... ... १२०–१२२ ४२–५६ हम्मीरकृतयज्ञस्य वर्णनम् ... ... ... ... ... १२२–१२३ ५७–६३ अलाउद्दीनभ्रातुरुलूगखानस्य रणस्तम्भपुराक्रमणं हम्मीरदेवसेनापतिना रणमल्लेन पराजितस्य तस्य पलायनञ्च ... ... ... १२४ ६४–७० अलाउद्दीनस्य रणस्तम्भपुराक्रमणम् ... ... ... १२४–१२५ ७०–७३ तच्छ्रुत्वा हम्मीरस्य रणस्तम्भपुरं प्रति प्रस्थानम् ... ... ... १२५ ७४ द्वादशः सर्गः हम्मीरस्य रणस्तम्भपुरप्रवेशः ... ... ... ... १२६ १–२ अलाउद्दीनेन प्रेषितस्य दूतस्य हम्मीरसविधे आगमनं स्वस्वामिसन्देशवर्णनं तत्सन्देशमस्वीकृत्य हम्धीरेण दूतविसर्जनञ्च ... ... ... १२६–१३२ ३–४३ स्वपक्षविद्रोहिणा रणमल्लेन सहितस्य अलाउद्दीनस्य विशालसेनाया वर्णनम् ... १३२–१३३ ४४–४७ हम्मीरकृतं समयनृशंसतावर्णनं कृतघ्नमहिमाशाहोदिभिर्यवनवीरैः सह हम्मीर- देवस्य दुर्गादियुद्धभूमावतारश्च ... ... ... ... १३३–१३४ ४८–५४ हम्मीरमहिषीणां 'जौहर' वर्णनम् ... ... ... ... १३४ ५५ हम्मीरस्यालाउद्दीनेन सह युद्धवर्णनं हम्मीरदेवस्य वीरगतिप्राप्तिश्च ... १३४–१३७ ५७–७७ त्रयोदशः सर्गः हम्मीरदेवस्य सप्तमपूर्वजस्य पृथ्वीराजस्य भ्रातुर्माणि क्यराजस्य तद्वंश्यानां . चन्दराज-भीमराज-विजयराज-रयण-कोह्लणगङ्गदेवानाञ्च वर्णनम् ... १३८–१३९ १–१२ गङ्गदेवसुतदेवसिंहवर्णनम् ... ... ... ... ... १३९ १३ तत्सुतसमरसिंहवर्णनम् ... ... ... ... ... १३९ १४
२५ विषयः पृष्ठसंख्या श्लोकसंख्या तत्सुतनरपालवर्णनम् ... ... ... ... ... ... १३९ १५ तत्सुतहम्मीरवर्णनम् ... ... ... ... ... ... १४० १६ तत्सुतवरसिंहवर्णनम् ... ... ... ... ... ... १४० १७ तत्सुतभारमल्लवर्णनम् ... ... ... ... ... ... १४० १८ तत्सुतनर्मदवर्णनम् ... ... ... ... ... ... १४० १९ तत्सुतस्यार्जुनस्य वर्णनम् ... ... ... ... ... ... १४०-१४१ २०-२८ अर्जुनेन जयन्त्याः पाणिग्रहणम् तस्याः सौन्दर्यवर्णनञ्च ... ... ... १४१-१४२ २९-३३ पुत्रप्राप्त्यर्थं राज्ञोऽर्जुनस्य तपोवर्णनं भगवतो विष्णोः प्रसादात् जयन्त्यां सुर्जनस्योत्पत्तिश्च ... ... ... ... ... ... १४२-१४३ ३४-४५ सुर्जनस्य शैशवयौवनयोः राज्याभिषेकस्य च वर्णनम् ... ... ... १४४-१४६ ४६-६७ सुर्जनमहाराजस्य प्रतापवर्णनम् ... ... ... ... ... १४७-१५० ६८-८० चतुर्दशः सर्गः सुर्जनस्य जगमालसुतां कनकावतीं परिणेतुं जगमालपुरं प्रति प्रस्थानम् तत्र प्रवेशश्च ... ... ... ... ... १५१ १-५ विवाहोत्सवे गीतनृत्यादिवर्णनम् वध्वास्तैलमर्दनस्नानादिवर्णनञ्च ... १५१-१५२ ६-१३ कनकावतीशृङ्गारवर्णनं तस्याः विवाहमण्डपं प्रति प्रस्थानञ्च ... ... १५३-१५५ १४-२८ सन्ध्यावर्णनं रात्रिवर्णनं चन्द्रोदयवर्णनञ्च ... ... ... १५५-१६१ ३१-६४ कनकावतीपरिणयः सुर्जनकनकावतीदेव्योर्मिथः स्नेहवर्णनञ्च ... ... १६१-१६५ ६५-१०१ पञ्चदशः सर्गः सूर्योदयवर्णनम् ... ... ... ... ... ... १६६-१६८ १-६ यानोन्मुखीं कनकावतीं प्रति तन्मातुरुपदेशः ... ... ... १६८-१७० १६-३३ सुर्जनस्य भार्यया सह स्वराजधानीपरावर्तनम् ... ... ... १७१ ३५-३६ ग्रीष्मवर्णनम् ... ... ... ... ... ... १७१-१७४ ३८-५५ सुर्जनस्य वारिविहारवर्णनम् ... ... ... ... ... १७४-१७८ ५६-८० षोडशः सर्गः सुर्जनकनकावत्योः पुत्रस्य भोजस्य पराक्रमवर्णनम् ... ... ... १७९ १-४ अकबरसेनायाः रणस्तम्भपुराक्रमणं तत्पराजयंश्च ... ... ... १७९-१८० ५-११ ततः प्रभूतसेनान्वितस्याकबरस्य रणस्तम्भपुराक्रमणम् तच्छ्रुत्वा सुर्जनस्य सेनया सह पट्टनपुररात् रणस्तम्भपुरं प्रति प्रस्थानम् ... ... ... १८०-१८४ ११-४२ सुर्जनसेनया नद्युत्तरणम् रणस्तम्भपुरप्रवेशश्च ... ... ... १८४-१८७ ४३-५५ सप्तदशः सर्गः अकबरसेनाया वर्णनम् ... ... ... ... ... १८८-१८९ १-१० सुर्जनाकबरसेनयोस्तुमुलयुद्धवर्णनम् ... ... ... ... १८९-१९१ ११-२६ युद्धभूमी सुर्जनपराक्रमवर्णनम् ... ... ... ... १९१-१९६ २७-५६ Dr. Urmila Sharma Collection, Varanasi
२६ विषयः पृष्ठसंख्या श्लोक संख्या अष्टादशः सर्गः अकवरसचिवस्य सुर्जनसविधे आगमनं सन्धिप्रस्ताववर्णनञ्च ... ... १९७-२०० १-२१ तत्स्वीकृत्य सुर्जनेन अकवरात् नर्मदा-मथुरा-काशीनां भूभागानुपादाय तस्मै रणस्तम्भपुरदुर्गसमर्पणम् ... ... ... ... ... ... २०० २२-२३ सुर्जनस्य नर्मंदागमनम् ... ... ... ... ... ... २०० २४ ततो मथुरागमनम् ... ... ... ... ... ... २०० २५ यमुनावर्णनम् ... ... ... ... ... ... २००-२०१ २७-२९ मथुरा वर्णनम् ... ... ... ... ... ... २०१-२०३ ३०-४० अश्मन्ततीर्थवर्णनम् ... ... ... ... ... ... २०३ ४१ वृन्दावनवर्णनम् ... ... ... ... ... ... २०३-२०५ ४२-५५ गोवर्धनवर्णनम् ... ... ... ... ... .... २०५-२०६ ५६-५८ वर्षर्तुवर्णनम् ... ... ... ... ... ... २०६-२०९ ५९-७९ एकोनविंशतितमः सर्गः सुर्जनस्य प्रयागागमनम् ... ... ... ... ... ... २१० १ गङ्गायमुनयोः सङ्गमवर्णनम् ... ... ... ... ... ... २१०-२११ २-६ सुर्जनस्य काशीगमनम् ... ... ... ... ... ... २११ ७-८ काशीवर्णनम् ... ... ... ... ... ... २११-२१४ १०-२४ ...टवर्णनम् ... ... ... ... ... ... २१४-२१५ २५-२९ ...त्र दानयशोवर्णनम् ... ... ... ... ... ... २१५-२१७ ३१-४२ ...य काश्यां देहत्यागो ब्रह्मसायुज्यप्राप्तिश्च ... ... ... २१७-२१९ ४३-५० विंशतितमः सर्गः सभासदां शोकवर्णनम् ... ... ... ... ... ... २२० १-७ भोजस्य राज्याभिषेकवर्णनम् ... ... ... ... ... ... २२१-२२५ ८-३५ भोजस्य प्रतापवर्णनम् ... ... ... ... ... ... २२५-२३१ ३६-६३ कविपरिचयः ... ... ... ... ... ... २३१ ६४
सुर्जनचरितमहाकाव्यम्
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श्रीः गौडीयमहाकविश्रीचन्द्रशेखरविरचितम् सुर्जनचरितमहाकाव्यम् प्रथमः सर्गः कार्यं प्रकाशयति कारणमन्तरेण स्वेच्छानुरूपविभवः प्रभुरव्ययो यः। सामोपगीतशिवकीर्तननामधेयः इयामः समग्रयतु सर्वसमीहितं नः ॥ १ ॥ जो स्वयम्भू अपनी माया-शक्ति के द्वारा स्वयं को अधिष्ठान बनाकर इस सम्पूर्ण कार्य- प्रपञ्च को, जिसका मिथ्या होने के कारण वास्तव में कोई कारण नहीं है, अभिव्यक्त करते हैं, जिनकी इच्छा-मात्र से यह विश्व-प्रपञ्च अभिव्यक्त होता है अथवा जो अपनी इच्छा-मात्र से वामन और विराट् बन सकते हैं, जो सम्पूर्ण जगत् के स्वामी हैं, जो कूटस्थ नित्य और अविनाशी हैं, जिनके कीर्तन और नाम-स्मरण को महामङ्गलकारी बतलाते हुए सामवेद जिनकी महिमा का गान करते हैं, वे भगवान् विष्णु हमारे सम्पूर्ण मनोरथों को पूर्ण करें ॥ १ ॥ यस्याः कृपालवसुधापरिशीलनेन निर्मात्यशेषमगुणोऽपि पुमान् पुराणः। तां मन्महे निगमसारगिरामुपास्यामाशापुरां पुरुषकारखनिं पुरारेः ॥ २ ॥ जिनकी कृपा के अणुमात्र अमृत को पाकर आदिपुरुष भगवान् विष्णु स्वयं निर्गुण होते हुए भी इस सारे संसार का निर्माण करनेमें समर्थ होते हैं तथा वेदों और शास्त्रों की सार-भूत वाणी जिनकी उपासना करती है उन (चौहाणवंशान्तर्गत हाड़ाकुल की कुलदेवता) भगवती आशापुरा देवी को हम भगवान् सदाशिव के पौरुष की खान मानते हैं (क्योंकि बिना शक्ति के 'शिव' 'शव' ही बने रहते हैं) ॥ २ ॥ (१) वस्तुतः अविद्यमानस्य कार्यप्रपञ्चस्य कारणरहितत्वात् कारणं विनापि कार्यावभासः संभवति यथोक्तं वेदान्तसम्प्रदायविद्भिः गौडपादाचार्यैः “संभूतेरपवादाच्च संभवः प्रतिषिध्यते । कोन्वेनं जनयेदिति कारणं प्रतिषिध्यते ।” इति, अपि च “अतो वक्ष्याम्यकार्पण्यमजातिसमतां गतम् । यथा न जायते किंचिज्जाय- मानं समन्ततः ॥” इति, “मायामात्रमिदं द्वैतमद्वैतं परमार्थतः ।” इति च । स्वस्या इच्छाया अनुरूपो विभवः सर्गः यस्य सः । यद्वा स्वेच्छानुरूपो विभवः शरीरं यस्य सः, अणोरणीयासः महतो महीयसः परमेश्वरस्य वामन- विराड्रूपधारणसामर्थ्यात् । सामभिः उपगीतं शिवं मंगलं कीर्तनं नामधेयं च यस्य सः। कालिदासैरप्युक्तं रघुवंशे (१०, २१) “सप्तसामोपगीतं त्वां” इत्यादि । (२) अगुणः निराकारनिर्गुणरूपः गुणरहितश्च । आशापुरा नाम चौहाणवंशान्तर्गतहाडाकुलदेवी यस्याः द्वे मन्दिरे बूँदीनगरे कोटानगरे च विराजते । पुरारेः शिवस्य पुरुषकारस्य पौरुषस्य खनिं उद्गमरूपां, पौरुषस्य शक्तिरूपत्वात् शक्तिं विना शिवे स्पन्दाऽभावात् च ।
२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् शुम्भादिदम्भदलनेन विजृम्भमाणशम्भुप्रमोदभरपल्लवितप्रभावाम् । सम्भावितां नुतिभिरम्बुजसम्भवाद्यैः शाकम्भरीं भगवतीमनिशं भजामः ॥ ३ ॥ शुम्भ आदि दैत्यों को मारकर उनके अभिमान को चूर कर देने के कारण उत्पन्न होने वाले भगवान् शिव के हर्षातिरेक से विकसित प्रभाव वाली तथा ब्रह्मा, विष्णु और अन्य देवताओं द्वारा प्रणामों से पूजित (साँभर नगर में स्थित चौहानवंश की कुलदेवता) भगवती शाकम्भरी देवी का हम रात दिन भजन करते हैं ॥ ३ ॥ पीयूषसारसरसान् भणितिप्रवाहान् मूकेऽपि वत्सलतया प्रतिपादयन्ती । देवी गिरां मयि चिराय विरामशून्यमाविष्करोतु करुणोपचितं प्रसादम् ॥ ४ ॥ जो वात्सल्य के कारण गूँगे को भी अमृत के सार के समान सरस और मधुर शब्दों की धारा बहा देने में समर्थ बना देती हैं वे वाणी की देवी सरस्वती दयाकरके मुझे भी कभी न रुकनेवाला वरदान दें ॥ ४ ॥ औचित्यमात्रमवलम्ब्य नमामि साधूनेतेषु मे किमपि नैव निवेद्यमस्ति । ये निर्निमित्तमुपकारपराः परेषामारोपितानपि गुणान् शतशाखयन्ति ॥ ५ ॥ केवल परम्परागत औचित्य का निर्वाह करने के कारण ही मैं सज्जनों को प्रणाम करता हूँ। वास्तव में उनकी सेवा में निवेदन करने के लिये मेरे पास कुछ नहीं है। बिना किसी स्वार्थ के सदा दूसरों का उपकार करना ही सज्जनों का स्वभाव है। जैसे धरती में रोपे गये पौधे की सैकड़ों शाखायें फूट निकलती हैं वैसे ही सज्जन दूसरों के गुणों को सौगुना बढ़ा चढ़ा कर मानते हैं अथवा सज्जन इससे भी अधिक हैं क्योंकि शाखायें तो सचमुच के पौधे से ही निकल सकती हैं, किन्तु सज्जन लोग दूसरों के 'आरोपित' अर्थात् कल्पित (वस्तुतः अविद्यमान) गुणों को भी सौगुना बढ़ाकर मानते हैं ॥ ५ ॥ राज्ञामपारगुणसारधुरन्धराणां वंशान्हं कृशमतिप्रसरो विवक्षुः। पद्भ्यामुदग्रगिरिशेखरमारुरुक्षोः पङ्गोर्विवेकविकलः पदवीं प्रपन्नः ॥ ६ ॥ मैं दुर्बल-बुद्धि और अविवेकी होते हुए भी अपार गुणों में अग्रगण्य चौहान-वंश के राजाओं का वर्णन करने की इच्छा कर रहा हूँ। मेरी यह इच्छा वैसी ही है जैसी कि किसी पंगु की उन्नत गिरिशिखर पर पैदल चढ़ने की इच्छा ॥ ६ ॥ आज्ञाबलात् तदपि शूरजनस्य राज्ञः स्वान्तःस्थितेन हरिणा स्वयमीरितस्य । सोऽहं विहाय परिहासभयं सभायां लौल्येन साहसरसं सहसा प्रपन्नः ॥ ७ ॥ अपने अन्तःकरण में स्थित भगवान् की प्रेरणा के कारण शूर-वीरों में अग्रगण्य राव सुर्जन ने मुझे यह महाकाव्य लिखने की आज्ञा दी है। अतएव उनकी आज्ञा को शिरोधार्य करके मैं, सभा में मेरा परिहास होगा इस भय को छोड़कर, चपलतावश सहसा यह महाकाव्य लिखने का साहस कर रहा हूँ ॥ ७ ॥ (३) शुम्भादिदैत्यदलनेन प्रकटितो यः शंभुप्रमोदभरः शिवस्य हर्षातिरेकः तेन पल्लवितो विकसितः प्रभावो यस्यास्ताम् । शाकम्भरी नाम चौहानवंशकुलदेवी यस्याः मन्दिरं शाकम्भरी (सांभर) प्रदेशे विराजते । (५) आरोपितान् वस्तुतः अविद्यमानान् भूमौ आरोपितांश्च ।
प्रथमः सर्गः ३ जिह्नाविलोलनविलासंवशा द्विजिह्वा मूर्ध्ना धृता अपि नहि प्रकृतिं त्यजन्ति । तेभ्यो न भीतिरिह भूपतिसुर्जनस्य जागर्ति जाङ्गलिकवत् करुणाविशेषः॥८॥ इधर उधर जीभ चलाना ही जिनका विलास बन गया है और जो इस स्वभाव के वशीभूत होकर ज़बान पर कोई लगाम नहीं लगा सकते उन दुर्जन चुगलखोर रूपी सर्पों को यदि कोई अपने मस्तक पर भी बैठाये तो भी वे अपना दुष्ट स्वभाव नहीं छोड़ते। मुझे ऐसे दुर्जनों रूपी सर्पों से कोई भय नहीं है क्योंकि मन्त्रों एवं ओषधियों द्वारा सर्प के विष को नष्ट कर देनेवाला राव सुर्जन का अपूर्व कृपा-रूपी वैद्य मेरी रक्षा के लिये सदैव सजग है ॥८॥ चौहाणवंशभवभूमिपुरन्दराणामाद्यो यथा तनुभृतां पुरुषः पुराणः । ख्यातः क्षितावजनि दीक्षितवासुदेवनामा स्वधर्मसुमनोकृतवासुदेवः ॥९॥ जिस प्रकार शरीरधारी प्राणियों में सबसे आदि पुरुष भगवान् विष्णु हैं उसी प्रकार चौहाण वंश के नृपेन्द्रों में यज्ञ में दीक्षित तथा अपनी धर्मनिष्ठा से भगवान् वासुदेव को प्रसन्न रखने वाले आदि पुरुष संसार में 'वासुदेव' नाम से विख्यात हुए ॥९॥ सत्ये युधिष्ठिर उदग्रबले च भीमश्चापेऽर्जुनः स नकुलस्तुरगाधिरोहे । शास्त्राभियोगसमये सहदेव एवमेकोऽवतार इव पाण्डवपञ्चकस्य ॥१०॥ वे सत्य में युधिष्ठिर के समान, उत्कट बल में भीम के समान, धनुर्विद्या में अर्जुन के समान, अश्वविद्या में नकुल के समान और शास्त्र-व्यसन में सहदेव के समान निपुण थे। अतः पाँचों पाण्डवों के मानों वे एक ही अवतार थे ॥१०॥ यः कामपाल इव धामनिधिर्बलेन जग्राह काम इव वामदृशां मनांसि । कामारिवत् करुणयाऽधिककोमलात्मा कामानपूरि परितः शरणागतानाम् ॥११॥ वे बलदेव के समान तेजस्वी थे। कामदेव के समान सुन्दर होने के कारण कामिनियों के मन को हठात् वश में कर लेते थे। भगवान् शिव के समान परम कारुणिक एवं आशुतोष होने के कारण शरणागतों के सम्पूर्ण मनोरथों को पूर्ण करते थे ॥११॥ उद्दामधाम्नि सवितुः सविधेऽपि काष्ठासङ्गेन धूमविकृतेरकृतान्तराये । यस्य प्रतापदहने गहने निपेतुर्हप्यत्सपत्नपृतनापतयः पतङ्गाः ॥१२॥ जिनकी सूर्य के सामने भी उत्कट तेज से प्रज्वलित, काष्ठाओं (दिशाओं) में व्याप्त, बिना ईंधन ही जलनेवाली और इसलिये धूम-विकृति से रहित प्रतापरूपी भीषण अग्नि में अनेक अभि- मानी शत्रु-सेनापति-रूपी पतंगे गिर गिर कर भस्म हो जाते थे ॥१२॥ (८) द्विजिह्वाः सर्पाः पिशुनाश्च। जाङ्गलिको विषवैद्यः। (९) स्वधर्मेण सुमनीकृतः प्रसन्नीकृतो वासुदेवो येन सः। (१२) सूर्यसामीप्येऽपि उत्कटतेजसा प्रज्वलनात्, इन्धनं विनांपि प्रज्वलनात्, सदैव धूमेन अविकृतत्वात् च अस्य राज्ञः प्रतापवह्वेः साधारणवह्नेः विशेषः। काष्ठानां दिशां संगेन, काष्ठस्य इन्धनस्य असंगेन च।
४ सुर्जनचरितमहाकाव्य नक्तं दिनं सममदीपि सुमेरुशृङ्गमारोहति स्म महसा जितसैंहिकेयः। अस्तं जगाम न कदापि जगत्प्रकाशस्तस्य प्रतापतपनः पुनरन्य एव ॥१३॥ सूर्य केवल दिन में चमकता है, सुमेरु पर्वत पर चक्कर लगाया करता है, ग्रहण के समय राहु द्वारा ग्रस्त कर लिया जाता है, रात में अस्त हो जाता है और एक समय विश्व के केवल आधे भाग को ही प्रकाशित कर सकता है। वासुदेव राजा का प्रतापरूपी सूर्य विलक्षण है। वह रात- दिन समान रूप से चमकता है, सुमेरु पर्वत के शिखर पर चढ़ा हुआ है, अपने तेज से राहु को जीत लेता है, कभी अस्त नहीं होता तथा एक साथ सम्पूर्ण विश्व को प्रकाशित करता है ॥१३॥ क्षीराम्बुधिः सुरगणैरपनीतसारः पूर्णो विधुर्विवश एव विधुन्तुदस्य । रुद्राचलोऽपि तुलितो रजनीचरेण को नाम साम्यमयतामदसीयकीर्तेः ॥१४॥ इन राजा की शुभ्र कीर्ति की हम किससे तुलना करें ? क्षीर-समुद्र को तो देवताओं ने अमृतरूपी सार निकालकर निःसार बना रक्खा है। पूर्ण चन्द्रमा (कलंकित होने के अतिरिक्त) राहु के सामने विवश हो जाता है और श्वेत कैलास पर्वत को तो रजनीचर रावण ने हँसी में ही हाथ पर उठा लिया था ॥ १४ ॥ दुष्कीर्तिपङ्कगतवैरियशोमृणाललेशानशेषयितुमाशु गवेषयन्ती । यस्योल्लसद्विशदवारिदगर्भशुभ्रा बभ्राम विश्वमखिलं किल कीर्तिहंसी ॥१५॥ इनकी शरद् ऋतु के प्रसन्न बादल के समान शुभ्र कीर्ति रूपी हंसी अपकीर्ति रूपी कीचड़ में फँसनेवाले शत्रुओं के बचे-खुचे यशरूपी कमल-तन्तुओं को खा जाने के लिये इधर-उधर शीघ्र उड़ती हुई सम्पूर्ण विश्व में घूम रही है ॥ १५ ॥ संग्रामसोम्नि शमनं भ्रुकुटीसमानं यस्मिन् विधुन्वति धनुर्धरणीवतंसे । दर्पोद्धतप्रतिभटप्रमदाजनानां सीमन्तसान्द्रखचिता मणयो निपेतुः ॥१६॥ विश्व-भूषण वासुदेव राजा के युद्ध-स्थल में (शत्रुओं को परास्त करके) शान्ति स्थापित करनेवाले अथवा यमराज (शमन) के समान लगनेवाले तथा भौंह के समान टेढ़े धनुष को टंका- रते ही उत्कट अभिमान में चूर शत्रुओं की स्त्रियों के माँग में बँधे हुए मोती (वैधव्य की सूचना देते हुए) अपने आप नीचे गिर जाते हैं ॥ १६ ॥ निध्वानतो बधिरितैः शतदुन्दुभीनामन्धीकृतैश्च पृतनारजसां भरेण । मार्गेषु वारणमदैरतिपिच्छिलेषु नो वेदि विद्रुतममुष्य कथं द्विषद्भिः ॥१७॥ वासुदेव की रणभूमि में बजनेवाली सैकड़ों दुन्दुभियों के घोर स्वर से शत्रुओं के कान बहरे हो जाते हैं और इनकी विशाल सेना के चलने से उड़नेवाली धूल से शत्रुओं की आँखें अन्धी हो जाती हैं। युद्ध के हाथियों के गण्डस्थल से बहनेवाली मद-जल की धारा से मार्ग की धूल कीचड़ (१३) रात्रावपि दीपनात्, सुमेरुशृंगारोहणात्, राहोः विजयात्, अस्तगमनाऽभावात्, एकदैव सम्पूर्णविश्व- गोलकप्रकाशनात् च राज्ञः प्रतापसूर्यस्य सूर्यात् विशेषः । (१४) रावणस्य स्वहस्ते कैलासधारणं प्रसिद्धमेव । (१५) हंसपक्षिणः मृणाललेशान् भुञ्जते इति प्रसिद्धिः ।
प्रथमः सर्गः ५ बन जाती है और चारों ओर फिसलन छा जाती है । समझ में नहीं आता कि मार्ग में चारों ओर भयंकर कीचड़ और फिसलन होने पर भी बहरे और अन्धे बने हुए शत्रु-गण इन राजा के सम्मुख आते ही युद्ध-स्थल से बड़ी तेज़ी से किस प्रकार भाग जाते हैं ? ॥ १७ ॥ एतस्य दानसलिलव्ययितप्रवाहा चर्मण्वती ध्रुवमधास्यत पङ्कभावम् । नाऽपूरयिष्यत यदि प्रसभोपरुद्धविद्वेषिवामनयनानयनाम्बुपूरैः ॥१८॥ युद्धवीर राजा वासुदेव ने बलात् घेरे गये शत्रुओं की स्त्रियों की (वियोग के कारण उत्पन्न) आँसुओं की धारा से यदि चम्बल नदी को वापस न भर दिया होता तो इन राजा के दानवीर होने के कारण चम्बल नदी का सारा पानी दान संकल्पों के जल में खर्च हो जाता और निःसन्देह चम्बल में कीचड़ ही कीचड़ रह जाता ॥ १८ ॥ बृन्दारकाधिपदृशामपि लोभनीयां वृन्दानि यः सुमनसां सुमना दधानम् । बृन्दाटवीमभिमतामिव नन्दसूनुर्वृन्दावतीपुरमनाकुलमध्युवास ॥१९॥ जिस प्रकार (भक्तों के प्राण) नन्दनन्दन वृन्दावन में रहते थे उसी प्रकार (प्रजा के प्राण) सुन्दर मन वाले राजा वासुदेव भयरहित और समृद्ध बूंदी नगरी में रहते थे । विविध देवताओं और पुष्पों से शोभित तथा इन्द्र के लिये भी दर्शनीय वृन्दावन के समान वह नगरी नाना प्रकार के विद्वानों एवं पुष्पों से सुशोभित थी और (उसकी समृद्धि) देवताओं के राजा इन्द्र के (हज़ार) नेत्रों के लिये भी दर्शनीय थी ॥ १९ ॥ तस्मादजायत सुतो नरदेवनाम्ना धाम्ना परानधरयन् नरदेवमुख्यान् । रूपेण यन्निरुपमेण निरूप्यमाणं नार्यो नराकृतिममन्वत देवमेव ॥२०॥ उन वासुदेव के नरदेव नामक पुत्र उत्पन्न हुए जो अपने तेज से अन्य प्रमुख नरदेवों (राजाओं) को कान्तिहीन कर देते थे और जिनको, अनुपम रूप के कारण, स्त्रियां नरदेहधारी देव ही मानती थीं ॥ २० ॥ तेनाजनिष्ट यशसाऽर्दितपूर्णचन्द्रः श्रीचन्द्र इत्यभिहितस्तनयो नयज्ञः । यस्यानिसमुद्रमपैनिद्रभुजप्रतापैरेकातपत्रमवनीवलयं बभूव ॥२१॥ उन नरदेव के श्रीचन्द्र नामक नीतिकुशल पुत्र पैदा हुए जिन्होंने अपने शुभ्र यश से पूर्ण चन्द्र को भी फीका बना दिया था और समुद्र तक फैला हुआ पृथ्वीमंडल जिनकी सजग भुजाओं के प्रताप से शुभ्र और देदीप्यमान बनकर एकमात्र छत्र-सा प्रतीत होता था ॥ २१ ॥ तस्मिन्नलङ्कृतवति त्रिदिवं वयोऽन्ते पुत्रः स्वपैतृकपर्द प्रतिपद्यते स्म । यः पालयन्नपि जयं निजपौरुषेण प्राप्तः क्षितावजयपाल इति प्रसिद्धिम ॥२२॥ श्रीचन्द्र के वृद्धावस्था में स्वर्गवासी हो जाने पर उनके पुत्र पैतृक सिंहासन पर आरूढ़ हुए । यद्यपि वे अपने पराक्रम से सदा जय प्राप्त करके और उसकी रक्षा करके 'जयपाल' बने रहे तथापि उनके नाम की प्रसिद्धि संसार में 'अजयपाल' के रूप में हुई ॥ २२ ॥ (१९) इन्द्रस्य सहस्रनेत्राणामपि लोभनीयाम् । सुमनसां देवानां विदुषां पुष्पाणां च । (२२) जयपालोऽपि अजयपालः इति विरोधाभासः । अजयपालः इति राज्ञो नामेति तत्परिहारः ।
६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् उच्चैस्तया ध्रुवमलङ्घ्यतया परेषां तेनाजयैन निरमायि परोऽपि मेरुः । तस्मादभूदजयमेरुरिति प्रसिद्धं दुर्गं तदद्भुतफलं किल योगसिद्धेः ॥२३॥ उन अजयपाल ने अत्यन्त उच्च और शत्रुओं द्वारा अलंघ्य तथा अजेय (सुमेरु से भिन्न) एक दूसरा ही मेरु बनाया। योगसिद्धि के अद्भुत फल के समान सुन्दर उस प्रसिद्ध दुर्ग का नाम 'अजयमेरु' (अजमेर) हुआ ॥ २३ ॥ तेनापि सूनुरनुरूपगुणोज्ज्वलेन राजन् जयेन जनितो जयराजनामा । दोर्दण्डचण्डिमचमत्कृतिचारुदृप्यत्कोदण्डताण्डवितदण्डितवैरिवर्गः ॥२४॥ उन अजयपाल के पुत्र जयराज हुए जो सदा जय से सुशोभित रहे और जो अपनी उद्दाम तथा प्रचण्ड भुजाओं में चमचमाते हुए अभिमानी धनुष के नृत्य से शत्रु-वर्ग को दण्ड देते रहे ॥ २४ ॥ सामन्तसिंह इति तस्य सुतः प्रतोतः सिंहासनं निजकुलोचितमारुरुक्षुः
CC0. In Public Domain, Digitizagtion by eGangotri प्रथमः सर्गः ७ दक्षिण दिशा से सम्बन्ध—उनमें विद्यमान होने के कारण वे इस संसार में वास्तव में साक्षात् चन्दन ही थे। चन्दन की केवल एक बात उनमें नहीं थी। वह यह कि चन्दन में द्विजिह्व (सर्प) लिपटे रहते हैं किन्तु उनको द्विजिह्वों (चुगलखोरों) का मेल बिलकुल नहीं सुहाता था ॥२८॥ प्रौढाहितावनिभृदुद्धतपक्षवज्रं वज्रायुधप्रतिममायतविक्रमेण । राजन्यवीरनिकुरम्बकिरीटवज्रं वज्राभिधं स तनयं जनयाञ्चकार ॥२९॥ उन चन्दन राजा ने, दुर्धर्ष शत्रु राजाओं के उद्धत पक्ष को भेदने के लिये वज्र के समान (इन्द्र ने वज्र से पर्वतों के पक्षों को काट गिराया था ) एवं उत्कट पराक्रम के कारण इन्द्र के समान और वीर राजाओं के समूह रूपी मुकुट में हीरे के समान शोभित होनेवाले वज्र नामक पुत्र को जन्म दिया ॥ २९॥ वज्रादजायत वशीकृतविश्वराज्यः प्राज्यैर्गुणैर्जगति विश्वपतिः प्रतीतः । यो विश्वनाथवनिताचरणावलम्बी विश्वम्भराखिलधुरां विभराम्बभूव ॥३०॥ वज्र के पुत्र विश्वपति हुए जो अखिल विश्व के राज्य को वश में करने वाले, उत्तम गुणों के कारण् साक्षात् विश्वपति, भगवान् विश्वनाथ की अर्द्धाङ्गिनी भगवती पार्वती के चरणों की शरण लेने वाले तथा (अपने कंधों पर) पृथ्वी का सारा भार उठाने वाले थे ॥ ३० ॥ कामं बभूवुरपरेऽपि पुरा नरेशा धन्या परन्तु धरणीयमनेन भर्त्रा । आलम्बते न कमला कतमं समृद्धं नारायणोरसि परं लभते प्रतिष्ठाम् ॥३१॥ भले ही पहले इस पृथ्वी का उपभोग करनेवाले अनेक राजा हुए, किन्तु यह पृथ्वी विश्वपति को पतिप्वाकर ही धन्य हुई। भले ही लक्ष्मी सभी धनिकों के पास रहे, किन्तु जो प्रतिष्ठा भगवान् विष्णु के वक्षःस्थल पर मिलती है वह अन्यत्र नहीं ॥ ३१ ॥ कीर्त्याऽस्य चन्द्रकरकोमलयाऽतिशुभ्रं शोणं नवार्ककिरणप्रतिमैः प्रतापैः । श्यामद्युति द्विषदकीर्तितमोभिरित्थं चित्रं तदाम्बरमराजत दिग्वधूनाम् ॥३२॥ उन विश्वपति के कारण, दिशारूपी स्त्रियों का आकाशरूपी वस्त्र (प्रकृति-वधू के सत्वरज- स्तमौमय वस्त्र के समान) रंग-बिरंगी 'श्वेत श्याम रतनार' शोभा पा रहा था—वह विश्वपति की चन्द्रमा की किरणों कै समान कोमल कीर्ति के कारण श्वेत था, उनके नवोदित सूर्य की किरणो के समान प्रताप के कारण लाल था और उनके शत्रुओं के दुष्कीर्ति रूपी अन्धकार के कारण कण्वा था ॥ ३२ ॥ (२८) सुरभितां कामधेनुतां सुगन्धित्वं च । परिरक्षिता दक्षिणा आशा दिक् येन सः, अपि च परिरक्षिताः पूरिताः दक्षिणानां अनुकूलजनानां आशाः मनीषितानि येन सः। द्विजिह्वाः सर्पाः पिशुनाश्च । चन्दनवत् चन्दन- भूपतिरपि सुरभितः विशदः शीतः दक्षिणदिक्सम्बन्धयुतश्च, किन्तु द्विजिह्वानां अमिलनात् तस्य चन्दनात् विशेषः । (२९) प्रौढाः उद्भटाः ये अहताः अवनिभृतः शत्रवो राजानः तेषां ये उद्धताः पक्षाः तेषां कर्तने यः वज्रं इन्द्रायुधमिव आचरतीति तम् । पुरा इन्द्रः वज्रेण पर्वतानां पक्षान् कृत्तवान् । राजन्यवीराणां यानि निकुरम्बाणि वृन्दानि तान्येव किरीटानि तेषु वज्रमिव हीरकमिव आचरतीति तम् । (३१) कालिदासेरप्युक्तं—"कामं नृपाः सन्तु सहस्रशोऽन्ये राजन्वतीमाहुरनेन भूमिम् । नक्षत्रताराग्रह- संकुलापि ज्योतिष्मती चन्द्रमसैव रात्रिः ॥” इति । (३२) अम्बरं आकाशः वस्त्रं च । दिग्वध्वोऽपि प्रकृतिनटीवत् सत्वरजस्तमोमयं शुक्ललोहितकृष्णं विचित्रं आकाशाम्बरं धृतवत्यः । Dr. Urmila Sharma Collection, Varanasi