भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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४ सुर्जनचरितमहाकाव्य नक्तं दिनं सममदीपि सुमेरुशृङ्गमारोहति स्म महसा जितसैंहिकेयः। अस्तं जगाम न कदापि जगत्प्रकाशस्तस्य प्रतापतपनः पुनरन्य एव ॥१३॥ सूर्य केवल दिन में चमकता है, सुमेरु पर्वत पर चक्कर लगाया करता है, ग्रहण के समय राहु द्वारा ग्रस्त कर लिया जाता है, रात में अस्त हो जाता है और एक समय विश्व के केवल आधे भाग को ही प्रकाशित कर सकता है। वासुदेव राजा का प्रतापरूपी सूर्य विलक्षण है। वह रात- दिन समान रूप से चमकता है, सुमेरु पर्वत के शिखर पर चढ़ा हुआ है, अपने तेज से राहु को जीत लेता है, कभी अस्त नहीं होता तथा एक साथ सम्पूर्ण विश्व को प्रकाशित करता है ॥१३॥ क्षीराम्बुधिः सुरगणैरपनीतसारः पूर्णो विधुर्विवश एव विधुन्तुदस्य । रुद्राचलोऽपि तुलितो रजनीचरेण को नाम साम्यमयतामदसीयकीर्तेः ॥१४॥ इन राजा की शुभ्र कीर्ति की हम किससे तुलना करें ? क्षीर-समुद्र को तो देवताओं ने अमृतरूपी सार निकालकर निःसार बना रक्खा है। पूर्ण चन्द्रमा (कलंकित होने के अतिरिक्त) राहु के सामने विवश हो जाता है और श्वेत कैलास पर्वत को तो रजनीचर रावण ने हँसी में ही हाथ पर उठा लिया था ॥ १४ ॥ दुष्कीर्तिपङ्कगतवैरियशोमृणाललेशानशेषयितुमाशु गवेषयन्ती । यस्योल्लसद्विशदवारिदगर्भशुभ्रा बभ्राम विश्वमखिलं किल कीर्तिहंसी ॥१५॥ इनकी शरद् ऋतु के प्रसन्न बादल के समान शुभ्र कीर्ति रूपी हंसी अपकीर्ति रूपी कीचड़ में फँसनेवाले शत्रुओं के बचे-खुचे यशरूपी कमल-तन्तुओं को खा जाने के लिये इधर-उधर शीघ्र उड़ती हुई सम्पूर्ण विश्व में घूम रही है ॥ १५ ॥ संग्रामसोम्नि शमनं भ्रुकुटीसमानं यस्मिन् विधुन्वति धनुर्धरणीवतंसे । दर्पोद्धतप्रतिभटप्रमदाजनानां सीमन्तसान्द्रखचिता मणयो निपेतुः ॥१६॥ विश्व-भूषण वासुदेव राजा के युद्ध-स्थल में (शत्रुओं को परास्त करके) शान्ति स्थापित करनेवाले अथवा यमराज (शमन) के समान लगनेवाले तथा भौंह के समान टेढ़े धनुष को टंका- रते ही उत्कट अभिमान में चूर शत्रुओं की स्त्रियों के माँग में बँधे हुए मोती (वैधव्य की सूचना देते हुए) अपने आप नीचे गिर जाते हैं ॥ १६ ॥ निध्वानतो बधिरितैः शतदुन्दुभीनामन्धीकृतैश्च पृतनारजसां भरेण । मार्गेषु वारणमदैरतिपिच्छिलेषु नो वेदि विद्रुतममुष्य कथं द्विषद्भिः ॥१७॥ वासुदेव की रणभूमि में बजनेवाली सैकड़ों दुन्दुभियों के घोर स्वर से शत्रुओं के कान बहरे हो जाते हैं और इनकी विशाल सेना के चलने से उड़नेवाली धूल से शत्रुओं की आँखें अन्धी हो जाती हैं। युद्ध के हाथियों के गण्डस्थल से बहनेवाली मद-जल की धारा से मार्ग की धूल कीचड़ (१३) रात्रावपि दीपनात्, सुमेरुशृंगारोहणात्, राहोः विजयात्, अस्तगमनाऽभावात्, एकदैव सम्पूर्णविश्व- गोलकप्रकाशनात् च राज्ञः प्रतापसूर्यस्य सूर्यात् विशेषः । (१४) रावणस्य स्वहस्ते कैलासधारणं प्रसिद्धमेव । (१५) हंसपक्षिणः मृणाललेशान् भुञ्जते इति प्रसिद्धिः ।