सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः सर्गः ३ जिह्नाविलोलनविलासंवशा द्विजिह्वा मूर्ध्ना धृता अपि नहि प्रकृतिं त्यजन्ति । तेभ्यो न भीतिरिह भूपतिसुर्जनस्य जागर्ति जाङ्गलिकवत् करुणाविशेषः॥८॥ इधर उधर जीभ चलाना ही जिनका विलास बन गया है और जो इस स्वभाव के वशीभूत होकर ज़बान पर कोई लगाम नहीं लगा सकते उन दुर्जन चुगलखोर रूपी सर्पों को यदि कोई अपने मस्तक पर भी बैठाये तो भी वे अपना दुष्ट स्वभाव नहीं छोड़ते। मुझे ऐसे दुर्जनों रूपी सर्पों से कोई भय नहीं है क्योंकि मन्त्रों एवं ओषधियों द्वारा सर्प के विष को नष्ट कर देनेवाला राव सुर्जन का अपूर्व कृपा-रूपी वैद्य मेरी रक्षा के लिये सदैव सजग है ॥८॥ चौहाणवंशभवभूमिपुरन्दराणामाद्यो यथा तनुभृतां पुरुषः पुराणः । ख्यातः क्षितावजनि दीक्षितवासुदेवनामा स्वधर्मसुमनोकृतवासुदेवः ॥९॥ जिस प्रकार शरीरधारी प्राणियों में सबसे आदि पुरुष भगवान् विष्णु हैं उसी प्रकार चौहाण वंश के नृपेन्द्रों में यज्ञ में दीक्षित तथा अपनी धर्मनिष्ठा से भगवान् वासुदेव को प्रसन्न रखने वाले आदि पुरुष संसार में 'वासुदेव' नाम से विख्यात हुए ॥९॥ सत्ये युधिष्ठिर उदग्रबले च भीमश्चापेऽर्जुनः स नकुलस्तुरगाधिरोहे । शास्त्राभियोगसमये सहदेव एवमेकोऽवतार इव पाण्डवपञ्चकस्य ॥१०॥ वे सत्य में युधिष्ठिर के समान, उत्कट बल में भीम के समान, धनुर्विद्या में अर्जुन के समान, अश्वविद्या में नकुल के समान और शास्त्र-व्यसन में सहदेव के समान निपुण थे। अतः पाँचों पाण्डवों के मानों वे एक ही अवतार थे ॥१०॥ यः कामपाल इव धामनिधिर्बलेन जग्राह काम इव वामदृशां मनांसि । कामारिवत् करुणयाऽधिककोमलात्मा कामानपूरि परितः शरणागतानाम् ॥११॥ वे बलदेव के समान तेजस्वी थे। कामदेव के समान सुन्दर होने के कारण कामिनियों के मन को हठात् वश में कर लेते थे। भगवान् शिव के समान परम कारुणिक एवं आशुतोष होने के कारण शरणागतों के सम्पूर्ण मनोरथों को पूर्ण करते थे ॥११॥ उद्दामधाम्नि सवितुः सविधेऽपि काष्ठासङ्गेन धूमविकृतेरकृतान्तराये । यस्य प्रतापदहने गहने निपेतुर्हप्यत्सपत्नपृतनापतयः पतङ्गाः ॥१२॥ जिनकी सूर्य के सामने भी उत्कट तेज से प्रज्वलित, काष्ठाओं (दिशाओं) में व्याप्त, बिना ईंधन ही जलनेवाली और इसलिये धूम-विकृति से रहित प्रतापरूपी भीषण अग्नि में अनेक अभि- मानी शत्रु-सेनापति-रूपी पतंगे गिर गिर कर भस्म हो जाते थे ॥१२॥ (८) द्विजिह्वाः सर्पाः पिशुनाश्च। जाङ्गलिको विषवैद्यः। (९) स्वधर्मेण सुमनीकृतः प्रसन्नीकृतो वासुदेवो येन सः। (१२) सूर्यसामीप्येऽपि उत्कटतेजसा प्रज्वलनात्, इन्धनं विनांपि प्रज्वलनात्, सदैव धूमेन अविकृतत्वात् च अस्य राज्ञः प्रतापवह्वेः साधारणवह्नेः विशेषः। काष्ठानां दिशां संगेन, काष्ठस्य इन्धनस्य असंगेन च।