भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 28, कुल 256 में से

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पृष्ठ 28

२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् शुम्भादिदम्भदलनेन विजृम्भमाणशम्भुप्रमोदभरपल्लवितप्रभावाम् । सम्भावितां नुतिभिरम्बुजसम्भवाद्यैः शाकम्भरीं भगवतीमनिशं भजामः ॥ ३ ॥ शुम्भ आदि दैत्यों को मारकर उनके अभिमान को चूर कर देने के कारण उत्पन्न होने वाले भगवान् शिव के हर्षातिरेक से विकसित प्रभाव वाली तथा ब्रह्मा, विष्णु और अन्य देवताओं द्वारा प्रणामों से पूजित (साँभर नगर में स्थित चौहानवंश की कुलदेवता) भगवती शाकम्भरी देवी का हम रात दिन भजन करते हैं ॥ ३ ॥ पीयूषसारसरसान् भणितिप्रवाहान् मूकेऽपि वत्सलतया प्रतिपादयन्ती । देवी गिरां मयि चिराय विरामशून्यमाविष्करोतु करुणोपचितं प्रसादम् ॥ ४ ॥ जो वात्सल्य के कारण गूँगे को भी अमृत के सार के समान सरस और मधुर शब्दों की धारा बहा देने में समर्थ बना देती हैं वे वाणी की देवी सरस्वती दयाकरके मुझे भी कभी न रुकनेवाला वरदान दें ॥ ४ ॥ औचित्यमात्रमवलम्ब्य नमामि साधूनेतेषु मे किमपि नैव निवेद्यमस्ति । ये निर्निमित्तमुपकारपराः परेषामारोपितानपि गुणान् शतशाखयन्ति ॥ ५ ॥ केवल परम्परागत औचित्य का निर्वाह करने के कारण ही मैं सज्जनों को प्रणाम करता हूँ। वास्तव में उनकी सेवा में निवेदन करने के लिये मेरे पास कुछ नहीं है। बिना किसी स्वार्थ के सदा दूसरों का उपकार करना ही सज्जनों का स्वभाव है। जैसे धरती में रोपे गये पौधे की सैकड़ों शाखायें फूट निकलती हैं वैसे ही सज्जन दूसरों के गुणों को सौगुना बढ़ा चढ़ा कर मानते हैं अथवा सज्जन इससे भी अधिक हैं क्योंकि शाखायें तो सचमुच के पौधे से ही निकल सकती हैं, किन्तु सज्जन लोग दूसरों के 'आरोपित' अर्थात् कल्पित (वस्तुतः अविद्यमान) गुणों को भी सौगुना बढ़ाकर मानते हैं ॥ ५ ॥ राज्ञामपारगुणसारधुरन्धराणां वंशान्हं कृशमतिप्रसरो विवक्षुः। पद्भ्यामुदग्रगिरिशेखरमारुरुक्षोः पङ्गोर्विवेकविकलः पदवीं प्रपन्नः ॥ ६ ॥ मैं दुर्बल-बुद्धि और अविवेकी होते हुए भी अपार गुणों में अग्रगण्य चौहान-वंश के राजाओं का वर्णन करने की इच्छा कर रहा हूँ। मेरी यह इच्छा वैसी ही है जैसी कि किसी पंगु की उन्नत गिरिशिखर पर पैदल चढ़ने की इच्छा ॥ ६ ॥ आज्ञाबलात् तदपि शूरजनस्य राज्ञः स्वान्तःस्थितेन हरिणा स्वयमीरितस्य । सोऽहं विहाय परिहासभयं सभायां लौल्येन साहसरसं सहसा प्रपन्नः ॥ ७ ॥ अपने अन्तःकरण में स्थित भगवान् की प्रेरणा के कारण शूर-वीरों में अग्रगण्य राव सुर्जन ने मुझे यह महाकाव्य लिखने की आज्ञा दी है। अतएव उनकी आज्ञा को शिरोधार्य करके मैं, सभा में मेरा परिहास होगा इस भय को छोड़कर, चपलतावश सहसा यह महाकाव्य लिखने का साहस कर रहा हूँ ॥ ७ ॥ (३) शुम्भादिदैत्यदलनेन प्रकटितो यः शंभुप्रमोदभरः शिवस्य हर्षातिरेकः तेन पल्लवितो विकसितः प्रभावो यस्यास्ताम् । शाकम्भरी नाम चौहानवंशकुलदेवी यस्याः मन्दिरं शाकम्भरी (सांभर) प्रदेशे विराजते । (५) आरोपितान् वस्तुतः अविद्यमानान् भूमौ आरोपितांश्च ।