भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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प्रथमः सर्गः ५ बन जाती है और चारों ओर फिसलन छा जाती है । समझ में नहीं आता कि मार्ग में चारों ओर भयंकर कीचड़ और फिसलन होने पर भी बहरे और अन्धे बने हुए शत्रु-गण इन राजा के सम्मुख आते ही युद्ध-स्थल से बड़ी तेज़ी से किस प्रकार भाग जाते हैं ? ॥ १७ ॥ एतस्य दानसलिलव्ययितप्रवाहा चर्मण्वती ध्रुवमधास्यत पङ्कभावम् । नाऽपूरयिष्यत यदि प्रसभोपरुद्धविद्वेषिवामनयनानयनाम्बुपूरैः ॥१८॥ युद्धवीर राजा वासुदेव ने बलात् घेरे गये शत्रुओं की स्त्रियों की (वियोग के कारण उत्पन्न) आँसुओं की धारा से यदि चम्बल नदी को वापस न भर दिया होता तो इन राजा के दानवीर होने के कारण चम्बल नदी का सारा पानी दान संकल्पों के जल में खर्च हो जाता और निःसन्देह चम्बल में कीचड़ ही कीचड़ रह जाता ॥ १८ ॥ बृन्दारकाधिपदृशामपि लोभनीयां वृन्दानि यः सुमनसां सुमना दधानम् । बृन्दाटवीमभिमतामिव नन्दसूनुर्वृन्दावतीपुरमनाकुलमध्युवास ॥१९॥ जिस प्रकार (भक्तों के प्राण) नन्दनन्दन वृन्दावन में रहते थे उसी प्रकार (प्रजा के प्राण) सुन्दर मन वाले राजा वासुदेव भयरहित और समृद्ध बूंदी नगरी में रहते थे । विविध देवताओं और पुष्पों से शोभित तथा इन्द्र के लिये भी दर्शनीय वृन्दावन के समान वह नगरी नाना प्रकार के विद्वानों एवं पुष्पों से सुशोभित थी और (उसकी समृद्धि) देवताओं के राजा इन्द्र के (हज़ार) नेत्रों के लिये भी दर्शनीय थी ॥ १९ ॥ तस्मादजायत सुतो नरदेवनाम्ना धाम्ना परानधरयन् नरदेवमुख्यान् । रूपेण यन्निरुपमेण निरूप्यमाणं नार्यो नराकृतिममन्वत देवमेव ॥२०॥ उन वासुदेव के नरदेव नामक पुत्र उत्पन्न हुए जो अपने तेज से अन्य प्रमुख नरदेवों (राजाओं) को कान्तिहीन कर देते थे और जिनको, अनुपम रूप के कारण, स्त्रियां नरदेहधारी देव ही मानती थीं ॥ २० ॥ तेनाजनिष्ट यशसाऽर्दितपूर्णचन्द्रः श्रीचन्द्र इत्यभिहितस्तनयो नयज्ञः । यस्यानिसमुद्रमपैनिद्रभुजप्रतापैरेकातपत्रमवनीवलयं बभूव ॥२१॥ उन नरदेव के श्रीचन्द्र नामक नीतिकुशल पुत्र पैदा हुए जिन्होंने अपने शुभ्र यश से पूर्ण चन्द्र को भी फीका बना दिया था और समुद्र तक फैला हुआ पृथ्वीमंडल जिनकी सजग भुजाओं के प्रताप से शुभ्र और देदीप्यमान बनकर एकमात्र छत्र-सा प्रतीत होता था ॥ २१ ॥ तस्मिन्नलङ्कृतवति त्रिदिवं वयोऽन्ते पुत्रः स्वपैतृकपर्द प्रतिपद्यते स्म । यः पालयन्नपि जयं निजपौरुषेण प्राप्तः क्षितावजयपाल इति प्रसिद्धिम ॥२२॥ श्रीचन्द्र के वृद्धावस्था में स्वर्गवासी हो जाने पर उनके पुत्र पैतृक सिंहासन पर आरूढ़ हुए । यद्यपि वे अपने पराक्रम से सदा जय प्राप्त करके और उसकी रक्षा करके 'जयपाल' बने रहे तथापि उनके नाम की प्रसिद्धि संसार में 'अजयपाल' के रूप में हुई ॥ २२ ॥ (१९) इन्द्रस्य सहस्रनेत्राणामपि लोभनीयाम् । सुमनसां देवानां विदुषां पुष्पाणां च । (२२) जयपालोऽपि अजयपालः इति विरोधाभासः । अजयपालः इति राज्ञो नामेति तत्परिहारः ।