सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् उच्चैस्तया ध्रुवमलङ्घ्यतया परेषां तेनाजयैन निरमायि परोऽपि मेरुः । तस्मादभूदजयमेरुरिति प्रसिद्धं दुर्गं तदद्भुतफलं किल योगसिद्धेः ॥२३॥ उन अजयपाल ने अत्यन्त उच्च और शत्रुओं द्वारा अलंघ्य तथा अजेय (सुमेरु से भिन्न) एक दूसरा ही मेरु बनाया। योगसिद्धि के अद्भुत फल के समान सुन्दर उस प्रसिद्ध दुर्ग का नाम 'अजयमेरु' (अजमेर) हुआ ॥ २३ ॥ तेनापि सूनुरनुरूपगुणोज्ज्वलेन राजन् जयेन जनितो जयराजनामा । दोर्दण्डचण्डिमचमत्कृतिचारुदृप्यत्कोदण्डताण्डवितदण्डितवैरिवर्गः ॥२४॥ उन अजयपाल के पुत्र जयराज हुए जो सदा जय से सुशोभित रहे और जो अपनी उद्दाम तथा प्रचण्ड भुजाओं में चमचमाते हुए अभिमानी धनुष के नृत्य से शत्रु-वर्ग को दण्ड देते रहे ॥ २४ ॥ सामन्तसिंह इति तस्य सुतः प्रतोतः सिंहासनं निजकुलोचितमारुरुक्षुः