सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंCC0. In Public Domain, Digitizagtion by eGangotri प्रथमः सर्गः ७ दक्षिण दिशा से सम्बन्ध—उनमें विद्यमान होने के कारण वे इस संसार में वास्तव में साक्षात् चन्दन ही थे। चन्दन की केवल एक बात उनमें नहीं थी। वह यह कि चन्दन में द्विजिह्व (सर्प) लिपटे रहते हैं किन्तु उनको द्विजिह्वों (चुगलखोरों) का मेल बिलकुल नहीं सुहाता था ॥२८॥ प्रौढाहितावनिभृदुद्धतपक्षवज्रं वज्रायुधप्रतिममायतविक्रमेण । राजन्यवीरनिकुरम्बकिरीटवज्रं वज्राभिधं स तनयं जनयाञ्चकार ॥२९॥ उन चन्दन राजा ने, दुर्धर्ष शत्रु राजाओं के उद्धत पक्ष को भेदने के लिये वज्र के समान (इन्द्र ने वज्र से पर्वतों के पक्षों को काट गिराया था ) एवं उत्कट पराक्रम के कारण इन्द्र के समान और वीर राजाओं के समूह रूपी मुकुट में हीरे के समान शोभित होनेवाले वज्र नामक पुत्र को जन्म दिया ॥ २९॥ वज्रादजायत वशीकृतविश्वराज्यः प्राज्यैर्गुणैर्जगति विश्वपतिः प्रतीतः । यो विश्वनाथवनिताचरणावलम्बी विश्वम्भराखिलधुरां विभराम्बभूव ॥३०॥ वज्र के पुत्र विश्वपति हुए जो अखिल विश्व के राज्य को वश में करने वाले, उत्तम गुणों के कारण् साक्षात् विश्वपति, भगवान् विश्वनाथ की अर्द्धाङ्गिनी भगवती पार्वती के चरणों की शरण लेने वाले तथा (अपने कंधों पर) पृथ्वी का सारा भार उठाने वाले थे ॥ ३० ॥ कामं बभूवुरपरेऽपि पुरा नरेशा धन्या परन्तु धरणीयमनेन भर्त्रा । आलम्बते न कमला कतमं समृद्धं नारायणोरसि परं लभते प्रतिष्ठाम् ॥३१॥ भले ही पहले इस पृथ्वी का उपभोग करनेवाले अनेक राजा हुए, किन्तु यह पृथ्वी विश्वपति को पतिप्वाकर ही धन्य हुई। भले ही लक्ष्मी सभी धनिकों के पास रहे, किन्तु जो प्रतिष्ठा भगवान् विष्णु के वक्षःस्थल पर मिलती है वह अन्यत्र नहीं ॥ ३१ ॥ कीर्त्याऽस्य चन्द्रकरकोमलयाऽतिशुभ्रं शोणं नवार्ककिरणप्रतिमैः प्रतापैः । श्यामद्युति द्विषदकीर्तितमोभिरित्थं चित्रं तदाम्बरमराजत दिग्वधूनाम् ॥३२॥ उन विश्वपति के कारण, दिशारूपी स्त्रियों का आकाशरूपी वस्त्र (प्रकृति-वधू के सत्वरज- स्तमौमय वस्त्र के समान) रंग-बिरंगी 'श्वेत श्याम रतनार' शोभा पा रहा था—वह विश्वपति की चन्द्रमा की किरणों कै समान कोमल कीर्ति के कारण श्वेत था, उनके नवोदित सूर्य की किरणो के समान प्रताप के कारण लाल था और उनके शत्रुओं के दुष्कीर्ति रूपी अन्धकार के कारण कण्वा था ॥ ३२ ॥ (२८) सुरभितां कामधेनुतां सुगन्धित्वं च । परिरक्षिता दक्षिणा आशा दिक् येन सः, अपि च परिरक्षिताः पूरिताः दक्षिणानां अनुकूलजनानां आशाः मनीषितानि येन सः। द्विजिह्वाः सर्पाः पिशुनाश्च । चन्दनवत् चन्दन- भूपतिरपि सुरभितः विशदः शीतः दक्षिणदिक्सम्बन्धयुतश्च, किन्तु द्विजिह्वानां अमिलनात् तस्य चन्दनात् विशेषः । (२९) प्रौढाः उद्भटाः ये अहताः अवनिभृतः शत्रवो राजानः तेषां ये उद्धताः पक्षाः तेषां कर्तने यः वज्रं इन्द्रायुधमिव आचरतीति तम् । पुरा इन्द्रः वज्रेण पर्वतानां पक्षान् कृत्तवान् । राजन्यवीराणां यानि निकुरम्बाणि वृन्दानि तान्येव किरीटानि तेषु वज्रमिव हीरकमिव आचरतीति तम् । (३१) कालिदासेरप्युक्तं—"कामं नृपाः सन्तु सहस्रशोऽन्ये राजन्वतीमाहुरनेन भूमिम् । नक्षत्रताराग्रह- संकुलापि ज्योतिष्मती चन्द्रमसैव रात्रिः ॥” इति । (३२) अम्बरं आकाशः वस्त्रं च । दिग्वध्वोऽपि प्रकृतिनटीवत् सत्वरजस्तमोमयं शुक्ललोहितकृष्णं विचित्रं आकाशाम्बरं धृतवत्यः । Dr. Urmila Sharma Collection, Varanasi