भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 34, कुल 256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 34

८ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् भूभृद्विशालकटकं समकालमेव तस्मिन् रणोद्यमिनि दुर्दिनयाम्बभूव । दानद्रवैर्द्विपकदम्बकुम्भजातैर्बाष्पैश्च वैरिवनितानयनाब्जमुक्तैः ॥३३॥ विश्वपति के युद्ध के लिये उद्यत होते ही राजाओं की विशाल सेना में दुर्दिन (वह दिन जब आकाश में बादलों के कारण अन्धकार सा छा जाता है और घनघोर वृष्टि होती है) छा जाता था क्योंकि हाथियों के गण्डस्थलों से मदजल की झड़ी लगी रहती थी और शत्रुओं की स्त्रियों के नय- नारविन्दों से आँसुओं की धारायें बरसती रहती थीं (तथा उनकी आहों के बादल छाये रहते थे) ॥ ३३ ॥ आह्लादितद्विजगणाऽविरतप्रवाहा पद्मावतारसुरभिं परिभूततृष्णाम् । एतस्य दानजलनिर्झरिणीं विगाह्य को नाम नाऽजनि जनोऽत्र विमुक्ततापः ॥३४॥ जिस प्रकार नदी के प्रवाह में प्रसन्न हंस आदि पक्षी क्रीड़ा किया करते हैं, खिले हुए कमलों से वह सुगन्धित रहती है, लोगों की प्यास बुझाती है और स्नान कर लेने पर उनकी गर्मी शान्त करती है उसी प्रकार विश्वपति के दान-संकल्पों के जल की जो नदी बह चली थी उसमें प्रसन्न ब्राह्मणों के समूह निरन्तर स्नान करते थे तथा वह लक्ष्मी के अवतार के कारण कामधेनु के समान थी एवं याचकों की तृष्णा को शान्त करनेवाली थी । विश्वपति की इस दान-नदी में स्नान करके किस मनुष्य ने अपना सन्ताप दूर नहीं किया ? ॥ ३४ ॥ आकारतो न परमस्य भुजद्वयस्य स्वर्वासिवृक्षविटपैः प्रतिपक्षताऽऽसीत् । अप्राथितं धनमनेन वनीयकेभ्यो विश्राण्य सन्ततमहारि यशोऽपि तेषाम् ॥३५॥ ...तः विश्वपति के सुन्दर और कोमल हाथों ने स्वर्ग के कल्पवृक्षों की केवल आकृति ...ही ग्रहण नहीं की, किन्तु याचकों को बिना माँगे ही निरन्तर धन दे-देकर उनका (कल्पवृक्षों की शाखाओं का) यश भी छीन लिया । (कल्पवृक्ष तो माँगने पर ही धन देता है, किन्तु विश्वपति के हाथों ने बिना माँगे ही धन दिया) ॥ ३५ ॥ वाञ्छाधिकद्रविणवर्षिणि याचकानां यस्योज्ज्वले जगति जाग्रति पञ्चशाखे । वीतप्रयोजनतया सुरपादपानां पञ्चत्वमेव बत युक्ततरं प्रतीमः ॥३६॥ ...हि याचकों को उनकी इच्छा से अधिक धन देने वाले विश्वपति के उज्ज्वल हाथ के विद्यमान रहने पर स्वर्ग के कल्पवृक्षों का कोई प्रयोजन नहीं रहा । अतः कल्पवृक्षों का 'पञ्चत्व' (पाँच की संख्या; मृत्यु) प्राप्त करना युक्त ही है ॥ ३६ ॥ (३४) पद्मानां कमलानां अवतारः पद्मायाः लक्ष्म्याश्च अवतारः । (३५) अस्य राज्ञः भुजयुगलेन पारिजातादिस्वर्गतकविटपानां न केवलं आकार एव अहारि, किन्तु याचकेभ्यः अप्राथितं धनं प्रदाय तेषां यशोऽपि अहारि । स्वर्गकल्पवृक्षास्तु प्रार्थितमेव धनं ददति, अयं राजा च अप्राथितमपि ददातीति अस्य तेभ्यो विशेषः । (३६) पारिजातमन्दारादिस्वर्गकल्पद्रुमाः पञ्चसंख्याकाः सन्ति । ते हि वाञ्छितमेव धनं ददति । अस्य राज्ञः पंचशाखः करः वाञ्छितादपि अधिकं धनं ददाति । अतः अस्य राज्ञः करे जाग्रति सति कल्पद्रुमाणां पञ्चत्व- मेव पञ्चसंख्यात्वं मरणं च युक्ततरमेव ।