सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२ प्रथमः सर्गः ९ न स्म प्रमाद्यति मदेन स मेदिनीशो नापि प्रमाद्यति रिपौ प्रजिघाय शस्त्रम् । नायं क्वचिद् विमुखतां समितौ जगाम प्रत्यर्थिनं न विमुखं पुनरन्वियेष ॥३७॥ वे नरेश कभी दर्प और प्रमाद नहीं करते थे ! न वे शत्रु पर प्रहार करके कभी आलस करते थे । उन्होंने युद्ध में कभी पीठ नहीं दिखाई और न कभी उन्होंने पीठ दिखाने वाले शत्रु का पीछा किया ॥ ३७ ॥ कामं क्रमेण नितरां दुरतिक्रमेण दोर्वििक्रमेण वसुधां वशयाम्बभूव । भूपालरीतिरिति नीतिपथोपनेतृन् नेता स मन्त्रसचिवान् सममभ्यनन्दत् ॥३८॥ जननायक विश्वपति ने अपने अत्यन्त दुर्धर्ष बाहु-बल द्वारा क्रमशः पृथ्वी के राज्यों को अच्छी तरह वश में कर लिया। ऐसा उन्होंने लोभ या स्वार्थवश नहीं किया, किन्तु इसलिये किया कि यह उत्कृष्ट राजाओं की रीति है। और साथ ही साथ उन्होंने नीति के पथप्रदर्शक मन्त्रिमुख्यों का समुचित आदर-सत्कार किया ॥ ३८ ॥ यस्मिन् जयाऽऽहितमतौ समराजिरेषु जातं रजः प्रतिभटेषु तमस्तदेव । सत्वं सपत्नपृतनासु विपक्षजायावक्षोजहारलतिकास्वपि निर्गुणत्वम् ॥३९॥ युद्धक्षेत्र में शत्रुओं को जीतने की इच्छा रखने वाले विश्वपति की सेनाओं से जो धूल ऊपर उठी वह शत्रुओं के लिये अन्धकार बन गई, अपनी सेनाओं के लिये बल और साहस बन गई तथा शत्रुओं की ललनाओं के वक्षःस्थल के हारों के लिये सूत्र तोड़ देने वाली बन गई । युद्धक्षेत्र में शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने के लिये विश्वपति में रजोगुण (शत्रुओं को मारने के वीरकर्म में प्रवृत्ति) उत्पन्न हुआ। आश्चर्य है कि वह रजोगुण शत्रुओं के लिये तमोगुण बन गया (अर्थात् शत्रु निश्चेष्ट हो गये और उनकी आँखों के आगे अंधेरा छा गया) तथा विश्वपति की सेनाओं के लिये सत्वगुण बन गया (अर्थात् उनकी सेनाओं में बलऔर साहस आ गया) और शत्रु-ललनाओं के वक्षःस्थल के हारों के लिये निर्गुण बन गया (अर्थात् वैधव्य की सूचना देते हुए शत्रुललनाओं के हारों का 'गुण' अर्थात् सूत्र टूट गया और हारों के मोती नीचे बिखर गये) ॥ ३९ ॥ पारीन्द्रमेव मृगयन् मृगयां गतोऽसौ नान्यान् जघान घनया घृणया परीतः । नष्टं तदैव परिपन्थिनितम्बिनीनां वक्षोजपत्रमकरीभिरिदं विचित्रम् ॥४०॥ शिकार खेलते समय विश्वपति केवल सिंह को ही खोजते थे । अन्य प्राणियों को मारने में उन्हें बड़ी घृणा होती थी । फिर भी आश्चर्य है कि उनके शिकार के लिये प्रस्थान करते ही वैरि- वनिताओं के वक्षःस्थल के मकराकृति आभूषण निर्जीव से नीचे गिर पड़ते थे । (विश्वपति (३८) अयं राजा नितरां दुरतिक्रमेण दोर्विक्रमेण क्रमेण वसुधां कामं वशयाम्बभूव । इयं भूपालरीतिरिति कारणेन न तु लोभेन । (३९) अस्य राज्ञः सेनायाः गमनेन युद्धस्थले यत् रजः धूलिः रजोगुणजन्यशत्रुमारणप्रवृत्तिश्च उत्थितं तदेव प्रतिभटेषु तमः अन्धकारः तमोगुणजन्यकर्त्तव्यविमूढ़ता च संजातं तद्रूपेण रज एव परिणतमित्यर्थः, स्वसैनि- केषु च सत्वं बलं सत्वगुणजन्योत्साहश्च संजातं, शत्रुललनास्तनहारेषु च निर्गुणत्वं गुणराहित्यं भाविवैधव्यसूचिका 'हारसूत्रत्रुटिश्च संजातम् । रजः एव तमः सत्वं निर्गुणत्वं च संजातमिति महदाश्चर्यम् ।