सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० सुर्जनचरितमहाकाव्यम् शिकार के लिये जाते थे किन्तु उनके शत्रु सोचते थे कि उनसे युद्ध करने जा रहे हैं और इस भय से शत्रु-ललनाओं के मकराकृति स्तनाभूषण गिर पड़ते थे मानों उनके भावी वैधव्य की सूचना दे रहे हों।) ॥४०॥ नाश्चर्यमेतदमुमेकमपि द्विषन्तो दोषाहता यदि रणेषु बहूनपश्यन् । एकोऽप्यनेक इव कैरवबान्धवोऽसावाभासते तिमिरताडितलोचनानाम् ॥४१॥ विश्वपति एक होते हुए भी युद्धक्षेत्र में शत्रुओं को अनेक से दिखाई देते थे। तैमिरिक पुरुषों को जिनकी आँखों की ज्योति मन्द पड़ गई है, अन्धकार में एक चन्द्रमा भी अनेक दिखाई देता है ॥४१॥ सम्पद्द्युतोऽपि तरुणोऽपि नराधिपोऽपि नाङ्गीचकार स कदाचन पानलीलाम् । बाणाः पुनः परपुरं सपदि प्रविश्य रक्तासवं निभृतमेव निपीतवन्तः ॥४२॥ विश्वपति यद्यपि सम्पन्न और समृद्ध थे, युवा थे, राजा थे, फिर भी उन्होंने कभी मदिरा नहीं पी। केवल उनके तीक्ष्ण बाण शत्रुओं के शरीरों में घुस कर चुपचाप पर्याप्त मात्रा में रक्त-मदिरा पीते थे ॥४२॥ स्तब्धत्वहेतुमपनीतविशेषदृष्टिं गुर्वङ्कुशानपि हठादवसादयन्तम् । यो वैरिणाञ्च करिणाञ्च तदाश्रितानामत्याजयन् मदमुदञ्चितमञ्चितौजाः ॥४३ ओजस्वी विश्वपति ने वैरि-राजाओं के प्रबल मद को, जिसके कारण वे अभिमान में चूर हो हो रहे थे, उनकी भले और बुरे का विचार करने की विवेक-दृष्टि लुप्त हो गई थी और गुरुजनों के उपदेशों का तिरस्कार करते थे, दूर कर दिया और साथ ही साथ वैरियों के हाथियों के प्रबल मद (दान जल) को भी छुड़ा दिया जिस मद के कारण हाथी उन्मत्त हो रहे थे, उनकी दृष्टि कलावृत हो रही थी और वे महावतों के अंकुशों के भारी आघातों की भी अवहेलना कर रहे थे ॥४३॥ समुल्लङ्घ्य क्षीराम्बुधिमधरितः शीतकिरणः समाक्रान्तं शश्वद् गिरिशगिरिगौरीगुरुपदम् । कृतश्चान्तेवासी भुजगपतिरित्थं विभुतया वितेने यः कीर्त्या भुवनजययात्राविलसितम् ॥४४॥ विश्वपति ने तीनों लोकों में अपनी शुभ्र कीर्ति के द्वारा मानों विजय यात्रा की। क्षीरसागर को पार करके (शुभ्रता में परास्त करके) उनकी कीर्ति आकाश में छा गई और शुभ्रता में चन्द्रमा को फीका कर दिया। मर्त्यलोक में कैलास और हिमालय के गौरीशंकर शिखर पर (धवलता में उनको पराजित करती हुई) फैल गई। पाताल में शेषनाग के पास तक फैल गई मानों शुक्लता में शेषनाग को भी अपना शिष्य बना लिया हो ॥४४॥ इति सुर्जनचरितमहाकाव्ये प्रथमः सर्गः। (४०) मृगयां गतोऽसौ राजा सिंहमेव हन्ति नान्यान् प्राणिनः। तथापि शत्रुललनास्तनपत्रमकरीभिः नष्ट- मिति विरोधाभासः। मृगयां गतमपि एनं शत्रुस्त्रियः युद्धार्थिनं मत्वा राज्ञः भयात् त्रस्यन्ति, तासां भयजन्यप्रबल- कम्पात् मकराकृतीनि स्तनाभूषणानि भाविवैधव्यभयादिव प्रपतन्ति इत्यर्थः। (४२) परपुरं शत्रुशरीरम्। रक्तासवं रुधिररूपरक्तमदिराम्।