भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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द्वितीयः सर्गः अथ विश्वपतिः क्रमागतं प्रतिपद्यापि स पैतृकं पदम् । अविशिष्टतयाऽन्यभूभृतां न मनस्वी भजते स्म निर्वृतिम् ॥ १ ॥ स्वाभिमानी राजा विश्वपति पैतृक राज्य को पाकर भी, अन्य राजाओं की अपेक्षा स्वयं में कोई असाधारण विशेषता न पाकर, शान्ति न पा सके ॥ १ ॥ सदसि स्पृहणीयसौहृदैः सवयोभिः समशीलचेष्टितैः । न बबन्ध धृतिं स बन्धुभिर्नवहर्म्येषु हिरण्मयेष्वपि ॥ २ ॥ सभा में प्रशंसनीय मैत्रीभाव वाले एवं अवस्था, शील और चेष्टा में समान, बन्धु-वर्ग को पाकर, सुवर्णमय नवीन प्रासादों में भी वे धैर्य धारण न कर सके ॥ २ ॥ करिणः परिणद्धकन्धरा नवशृङ्गारितचारुविग्रहाः । नवनिर्झरमेदुरानना न मुदे तस्य बभूवुरोशितुः ॥ ३ ॥ विशाल गण्डस्थल वाले, नवीन शृङ्गारों से सुसज्जित शरीरवाले, मदजल से गाढ़े चिकने मुखवाले मदोत्कट हाथी भी उन्हें आनन्दित न कर सके ॥ ३ ॥ दिवमुत्पतितुं कृतोद्यमा विनिरुद्धा विनियम्य सादिभिः । अभवञ्जवना वनायुजाः प्रमदायाऽस्य न मेदिनीभुजः ॥ ४ ॥ टापें फटकार कर मानों आकाश में उड़ने की इच्छा रखनेवाले, साईसों द्वारा कठिनाई से रोके जाने वाले, अत्यन्त वेगवाले उत्तम अरबी घोड़े भी उन्हें आनन्द न दे सके ॥ ४ ॥ दयिताधरचारुपल्लवाः कुसुमोद्भेदविजृम्भितस्मिताः । अलिगुञ्जितमञ्जुगीतयो रुरुधुस्तस्य मनो न वीरुधः ॥ ५ ॥ जिनके सुकुमार लाल पत्ते कामिनियों के अधरों के समान सुन्दर थे, जिनके विकसित पुष्प रमणियों की मुस्कान के समान शुभ्र थें, भ्रमरों की गूँज के बहाने जो मानों सुन्दर गीत गा रहीं थीं ऐसी लतायें भी उनके मन को न बाँध सकीं ॥ ५ ॥ सरसीरुहसौरभोज्ज्वला कलहंसीकलनादकोमला । सरसी विमलाशायाप्यलं सरसीकर्तुमभून् न भूभृतम् ॥ ६ ॥ कमलों की सुगन्ध से सुरभित, हंसियों के सुन्दर नाद से मुखरित, स्वच्छ हृदय के समान निर्मल जल से युक्त, मनोहर सरोवरा भी उनके हृदय को सरस न कर सकी ॥ ६ ॥ समये समुदीरितोच्चकैर्जयशब्दैरवदानशंसिभिः । स ननन्द न वन्दिचारणैर्विरुदालीपदबन्धकोविदैः ॥ ७ ॥ समय पर उच्च स्वर से जयशब्द का उच्चारण करने वाले, प्रशस्त कर्मों का वर्णन करनेवाले, प्रशंसा की पंक्तियों को सुन्दर रूप से पद्य-बद्ध करने में निपुण भाट और चारण उन्हें आनन्दित न कर सके ॥ ७ ॥ (४) वनायुजाः पारसीका अश्वाः ।