भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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पृष्ठ 38

१२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् शिथिलेतरबन्धबन्धुरा सुकुमाराऽपि विदग्धभूपतेः । रसभावनिरन्तराप्यहो ! कविवाणी न विनोदभूरभूत् ॥ ८ ॥ दृढ़ बन्धों से सुन्दर, सुकुमार, रसों और भावों में सनी हुई, कवियों की 'कोमल कान्त पदावली' भी, आश्चर्य है कि, उन सहृदय और विदग्ध नरेश को आनन्दित न कर सकी ॥ ८ ॥ मधुमत्तविदग्धकामिनीभणितादप्यधिकं मनोरमान् । अभिनन्दति न स्म भूपतिः स विपञ्चीकलनिक्कणानपि ॥ ९ ॥ मदिरा से मत्त और कामकला में चतुर कामिनी के सरसं शब्दों से भी अधिक मनोहर, वीणा के सुन्दर स्वर भी उन्हें प्रमुदित न कर सके ॥ ९ ॥ मदनेप्युपदेष्टुमिच्छवः कुटिलभ्रूदलवल्गुचालनैः । नयनान्तनिरस्तरङ्गितैस्तृणयन्त्यस्तरुणीर्नभःसदाम् ॥ १० ॥ सविलासपदाम्बुजार्पणैरनुगृह्णन्त्य इवावनीतलं । प्रमदा न मदालसा मनागपि निन्युर्वशतां विशां पतिम् ॥ ११ ॥ टेढ़ी भौंहों को नचाकर कटाक्षों द्वारा मानों पुष्पधन्वा कामदेव को तीर चलाने की विद्या में उपदेश देने की इच्छा रखनेवाली, अपाङ्गों के विलासों से स्वर्ग की तरुणियों को भी तृणवत् तुच्छ बना देनेवाली, मन्द सविलास चाल के बहाने मानों अपने पदारविन्दों से धरातल को अनुगृहीत करनेवाली, मद में अलस प्रमदायें भी उन राजा को जरा भी वश में न कर सकीं ॥ १०-११ ॥ इति दुर्मनसं मनीषिणं विषये सत्यपि वीतवासनम् । अधिराजतया दुरासदं तमलं बोधयितुं न कश्चन ॥ १२ ॥ विषयों की उपस्थिति में भी वासना-रहित, कठिनता से मिलने योग्य, उन बुद्धिमान् विश्व- पति को खिन्न देखकर भी, उनके राजा होने के कारण, उन्हें कोई समझा न सका ॥ १२ ॥ तनयोऽस्य गुरोरथैकदा सुनयो नामतयोपबृंहितः । समशीलवयो विचेष्टितैरधिरूढः किल बालमित्रताम् ॥ १३ ॥ विश्वपति के गुरु के पुत्र, जिनका नाम सुनय था, अवस्था और शील में इनके समान थे और बचपन के मित्र थे ॥ १३ ॥ वपुषा ललितेन चेष्टितैरभिरामैर्भणितैश्च सूनृतैः । विशदं परितो विकाशयन्ननिशं विश्वजनीनमाशयम् ॥ १४ ॥ सुन्दर शरीर से, कुलीन चेष्टाओं से, सत्य और मधुर वचनों से सुनय सदा सब लोगों के हृदयों को अच्छी तरह प्रफुल्लित करते थे ॥ १४ ॥ द्विगुणं खलु बिम्बमात्मनः सहसाऽऽदर्शसमोपगं दधत् । कलयन्नधिकोज्वलाः कला रुचिमासाद्य च कृत्स्नपक्षगाम् ॥ १५ ॥ (१५) दर्शं अमायां चन्द्रबिम्बस्याभावः, आदर्शो पुरोधसः बिम्बस्य प्रतिबिम्बात् द्विगुणत्वम् । कृत्स्नपक्षगां रुचिं सम्पूर्णपक्षगां जनानां रुचि, कृष्णपक्षे शुक्लपक्षे सर्वत्र समानकान्ति च । कलाः वेदिनिर्माणलेखाद्याः विद्याः चन्द्रकलाश्च ।