भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

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द्वितीयः सर्गः १३ न च वक्रतया विकारितो न कलङ्केन कदाचिदङ्कितः । श्रितवान् नहि जातु वारुणीं न च दोषाकरतामुपागतः ॥१६॥ तमसा न तिरस्कृतः क्वचित् प्रतिपक्षो वपुषा मनोभुवः । अपरो ननु कोऽपि निर्मितो द्विजराजः कुतुकेन वेधसा ॥१७॥ ब्रह्मा ने कौतुकवश सुनय का एक अद्वितीय 'द्विजराज' (श्रेष्ठ ब्राह्मण; चन्द्रमा) के रूप में निर्माण किया था। जब कभी वे दर्पण (आदर्श) के समीप जाते थे तो उनके शरीर-बिम्ब की शोभा (प्रतिबिम्ब के कारण) द्विगुणित हो उठती थी (चन्द्र-बिम्ब तो 'दर्श' अर्थात् अमावस्या के समीप जाने पर लुप्त हो जाता है)। सुनय सब वर्गों के (कृत्स्न पक्ष के) लोगों की प्रीति (रुचि) प्राप्त करके अपनी सारी कलाओं से सदा ही अत्यधिक उज्ज्वल और उन्नत बने रहते थे (चन्द्रमा शुक्लपक्ष की रुचि अर्थात् कान्ति पाकर क्रमशः एक एक कला से बढ़ता है)। सुनय सरल स्वभाव के होने के कारण कभी कुटिलता से दूषित नहीं हुए (चन्द्रमा