सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् रहसि स्थितमाहितस्थितिः समयज्ञः समये समेत्य तम् । इदमानतकन्धरः शनैरधिगम्यानुमतिं न्यवेदयत् ॥२१॥ विशाल कंधों वाले, परिस्थिति को समझने वाले, समय को जानने वाले वे सुनय एक दिन अनुकूल समय देख कर एकान्त में स्थित राजा विश्वपति के पास गये और उनसे आज्ञा लेकर इस प्रकार निवेदन किया ॥ २१ ॥ उपदिष्टमुपायदर्शिभि र्न विना प्रश्नमुदीरयेत् क्वचित् । इति सर्वत एव सज्जते किमुताऽधृष्यतमेषु राजसु ॥२२॥ नीति-कुशल विद्वानों का उपदेश है कि बिना प्रश्न किये गये उत्तर नहीं देना चाहिये। यह सामान्य नियम सब जगह लागू है, फिर स्वतन्त्र नरेशों की तो बात ही क्या ॥ २२ ॥ अतिविस्मयिनों तथापि ते नृप निर्वेदनिवेदिनीं स्थितिम् । अवलोक्य वितर्कविकलं हृदयं मे दिशति प्रगल्भताम् ॥२३॥ फिर भी खिन्नमनस्कता और निर्वेद को प्रकट करने वाली तथा अत्यन्त आश्चर्य में डाल देने वाली आपकी इस दशा को देखकर तर्क-वितर्क से पीड़ित मेरा हृदय आपकी सेवा में कुछ निवेदन करने के लिये, हे राजन् ! मुझे प्रेरित कर रहा है ॥ २३ ॥ इयमायतिमञ्जुला मही महनीयोज्वलविक्रमेण ते । चिरमुद्धतवैरिकण्टका सुतरां पाणितलावलम्बिनी ॥२४॥ यह विशाल और सुन्दर पृथ्वी, जिसके शत्रुरूपी काँटों को आप, अपने श्लाघ्य और उज्ज्वल पराक्रम से, पहले ही उखाड़ कर फेंक चुके हैं, आपके अधिकार में हैं ॥ २४ ॥ प्रणयैः सुहृदः सभाजिता महसा विद्विषतां सभा जिता । चरितैर्जगदुत्तरैस्त्वया जगदेतन् नृपतेऽनुरञ्जितम् ॥२५॥ आपने मित्रों का सस्नेह सत्कार किया है और अपने तेज से शत्रुओं की सभा को जीत लिया राजन् ! आपने अपने अलौकिक कृत्यों से इस जगत् को प्रसन्न और अनुरक्त बना रक्खा है। ॥ २५ ॥ नितरां निरुपप्लवाः प्रजा वसुपूर्णा वशगा वसुन्धरा । परितः परितर्पितो मखैः समये वर्षति वारि वासवः ॥२६॥ प्रजा को किसी प्रकार के संकट का भय नहीं है। वसुन्धरा (पृथ्वी) अपने नाम को सार्थक करती हुई वसु (धन धान्य) से पूर्ण है और आपके वश में है। चारों ओर यज्ञ होते रहते हैं जिनसे तृप्त होकर इन्द्र समय पर वर्षा करता रहता है ॥ २६ ॥ तव जाग्रति दोर्युगे भुवो धुरि धुर्ये प्रतिलब्धविभ्रमाः । करियूथपकैतवादमी धृतसेवाः सविधे कुलाद्रयः ॥२७॥ आपके पृथ्वी का भार उठाने में समर्थ भुजयुगल के इस कार्य में प्रवृत्त होने पर कुलाचल पर्वत ही मानों अवकाश पाकर बड़े बड़े हाथियों के बहाने आपकी सेवा में संलग्न हैं ॥ २७ ॥