भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

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द्वितीयः सर्गः १५ अमितैः परितो विस्तृतरैर्वसुविश्राणननीरनिर्झरैः । अपि जाङ्गलभूमयस्त्वया विहितास्तावददेवमातृकाः ॥२८॥ आपके दानसंकल्प के अपार जल की जो नदियाँ चारों ओर वह निकली हैं उनके कारण जंगली देश भी 'अदेवमातृक' अर्थात् 'नदीमातृक' (वह भूमि जहाँ नदी या नहरों से सिंचाई होती है) बन गये हैं ॥ २८ ॥ अभिरामतरं निरामयं भवतो वीक्ष्य वपुर्वधूजनः । नरदेव निरादरोऽभवद् भिषजोर्नाकनिवासिनोरपि ॥२९॥ हे नरदेव ! आपके अत्यन्त सुन्दर और स्वस्थ शरीर को देखकर रानियों के मन में स्वर्ग के वैद्य अश्विनीकुमारों के सौन्दर्य और वैद्य विद्या के प्रति कोई आदर नहीं रहा है ॥ २९ ॥ इति ते कृतकृत्यता मया कृतिनां नायक निश्चिता धिया । सुविचारयताऽपि दृश्यते न च निर्वेदनिदानमण्वपि ॥३०॥ कर्मठ पुरुषों में श्रेष्ठ ! मेरी मति के अनुसार तो आपको जो कार्य करने चाहिये थे वे सब आप कर चुके हैं। खूब विचार करने पर भी मुझे आपके खेद का ज़रा भी कारण नहीं दिखाई देता ॥३०॥ रिपवो वनगोचरा अपि स्फुटमुत्साहविपर्ययं तव । निशमय्य विधातुमिच्छवः पुनराशाङ्कुरमात्मनो हृदि ॥३१॥ आपके शत्रु जो इस समय आपके भय से वन में छिप रहे हैं आपकी उदासीनता और निर्वेद की खबर सुनकर फिर अपने मन में आशा का अंकुर उपजाना चाहते हैं ॥ ३१ ॥ विधुरं ध्रुवमप्रसादतः सदसि प्रेक्ष्य सदोशितुर्मुखम् । न च नोद्विजतेऽनुजीविनां हृदयं भूरिवितर्कसङ्कुलम् ॥३२॥ सभा में आपका अप्रसन्न और उदासीन मुख देखकर आपके शुभचिन्तकों के हृदय नाना प्रकार के संकल्प-विकल्पों से पीड़ित होकर व्याकुल हो जाते हैं ॥ ३२ ॥ सरितां पतिरप्यधीरतां भजते कारणगौरवात् क्वचित् । न कदापि मनो महीयसां प्रलयेऽपि प्रतियाति वैकृतम् ॥३३॥ समुद्र भी ज्वार के समय (चन्द्रमा के प्रेम के) गुरुकारणवश अधीर हो उठता है, किन्तु महान् पुरुषों का मन प्रलय में भी विकृत नहीं होता ॥ ३३ ॥ विषयेष्वधिका विरागिता विजनेषु स्पृहयालुता तथा । शमिनां समवैति शर्मणे महसाक्रान्तभुवां न भूभुजाम् ॥३४॥ विषयों में अधिकाधिक वैराग्य और अधिकाधिक एकान्तप्रेम निवृत्तिमार्ग के लोगों के लिये कल्याणकारक होते हैं, अपने तेज से पृथ्वी को वश में रखने वाले राजाओं के लिये नहीं ॥ ३४ ॥ (२८) अदेवमातृकाः नदीमातृकाः नद्यः मातरः धान्यादिसंवर्धनेन पालिकाः येषां ते । (२९) राज्ञः वपुषा स्वर्वैद्यौ अश्विनौ सौन्दर्ये अधःकृतौ, निरामयत्वात् च उपेक्षितौ तद् दृष्ट्वा वधूजनस्तयोः निरादरोऽभूत् ।