सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् तनया महतां महीभृतां परिणीता हरिणीदृशस्त्वया। नयनान्तनिदेशपात्रतामपि यासामभिनन्दति स्मरः ॥३५॥ बड़े बड़े राजाओं की मृगनयनी कुमारियों का आपने पाणिग्रहण किया है जिनकी आँखों के इशारे पर नाचने में कामदेव अपना गौरव समझता है ॥ ३५ ॥ जनिता न धुरन्धराः सुताः प्रमदाः प्रेमभरेण नादृताः। नहि सौम्य शमः समञ्जसस्तरुणस्त्रीप्रथमातिथौ तव ॥ ३६ ॥ न तो आपने अभी राज्य-भार सँभालने योग्य राजकुमार ही उत्पन्न किये हैं और न आपने अभी रानियों का प्रेम-सत्कार किया है। स्त्रियों के तारुण्य की प्रथम तिथि में ही आपको इस प्रकार का वैराग्य शोभा नहीं देता ॥ ३६ ॥ क्व तनुर्नवयौवनाश्रया क्व विरागस्तव देव दारुणः। न निदाघकठोरमातपं सुकुमारा सहते हि माधवी ॥३७॥ देव ! कहाँ तो आपका