सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३ द्वितीयः सर्गः १७ इतिवादिनमादिवर्णजं सुनयं सूनृतभाषितेन सः। अवदद् वदतां वरो नृपः स्वरशिष्यायितनूतनाम्बुदः ॥४२॥ ब्राह्मण-श्रेष्ठ सुनय के ये वचन सुन कर गंभीर घोष से नवीन मेघ को अपना शिष्य बनाने वाले, बोलने में कुशल, राजा विश्वपति ने इस प्रकार सत्य बात कही ॥ ४२ ॥ अनुकूलतरेण यत् त्वया वचनं सम्प्रति सोपपत्तिकम् । प्रणयात् प्रणिधाय भाषितं हृदयं प्रह्वयतीव तन् मम ॥४३॥ आपने जो स्नेहवश सावधान मन से युक्तियुक्त और अत्यन्त अनुकूल बातें कहीं उनको सुन कर मेरा मन बहुत विनीत हुआ है ॥ ४३ ॥ तदपि स्वमहं विभावयन् बत साधारणमन्यपार्थिवैः। न मनो विनियन्तुमुत्सहे वशगायामपि सर्वसम्पदि ॥४४॥ तथापि मैं अपने आपको अन्य राजाओं के समान साधारण समझ रहा हूँ और इसीलिये सब प्रकार की सम्पत्ति होते हुये भी, मैं अपने मन को शान्ति देने में समर्थ नहीं हो पा रहा हूँ॥४४॥ हरभूधरतोऽपि शाश्वती यदि जागर्ति न कीर्तिरुज्ज्वला । तरुणीनयनान्तचञ्चलैः किमु साम्राज्यसमुद्भवैः सुखैः ॥४५॥ यदि कैलास पर्वत से भी अधिक शुभ्र और अधिक चिरस्थायी कीर्ति इस विश्व में व्याप्त न रहे, तो तरुणी स्त्रियों के कटाक्ष के समान चञ्चल और क्षणिक साम्राज्य से उत्पन्न होने वाले सुखों से क्या लाभ ? ॥४५॥ अधिगम्य निरुढमाशयं किल रत्नाकरमेखलापतेः । द्रुतमस्य विगाहनक्षमां प्रतिपेदे सुनयः सरस्वतीम् ॥४६॥ समुद्र-रशना पृथ्वी के पति विश्वपति के हृदय में रूढ़ इस आशय को समझ कर सुनय ने शीघ्र इस आशय की प्राप्ति के उपाय बताने में समर्थ ये वचन कहे ॥ ४६ ॥ प्रतिपालनमंत्र वस्तुनः सुधियस्तद्वदलब्धसाधनम् । द्वयमाहुरिहेष्टसाधनं तदुपायाः परमुद्यमाः परे ॥४७॥ विद्वान् लोग इष्ट साधन के लिये दो बातें (योग और क्षेम) बताते हैं—प्राप्त वस्तु की रक्षा (क्षेम) और अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति (योग) । अन्य सब उद्योग इन्हीं के उपाय हैं ॥ ४७ ॥ अनयोः प्रथमे प्रवर्तते नियतं सर्वजनः प्रयत्नतः । विरमत्यपि नाऽऽफलोदयं तदसिद्धौ महदेव दुर्यशः ॥४८॥ इनमें से पहली बात के लिये—प्राप्त वस्तु की रक्षा के लिये—सभी लोग सदा प्रयत्नशील रहते हैं और सफलता मिलने तक प्रयत्न नहीं छोड़ते क्योंकि प्राप्त वस्तु की रक्षा न करने में तो बड़ी भारी अपकीर्ति है ॥ ४८ ॥