सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् अपरं तु निरन्तरं गुणैर्नयविक्रान्तिमुखैः प्रसाधयन् । लभतेऽद्भुतकीर्तिसत्कृतिं यदि न स्यान् मदतो विकत्थनम् ॥४९॥ किन्तु नीति के अनुरूप गुणों से निरन्तर प्रयत्नशील धीमान् पुरुष अप्राप्त को प्राप्त करके अद्भुत यश से सत्कृत होते हैं, यदि वे प्रमादवश डींग मारकर गुप्त उपायों को प्रकट न कर दें॥४९॥ कति न क्षितिरक्षिणः क्षिताविह जाताः परिभोगलालसाः । गणयन्ति जनास्तमेव तु त्रिजगद् यस्य यशोभिरुज्वलम् ॥५०॥ इस पृथिवी पर अनेक राजा हो गये हैं जो केवल भोग-विलास ही में लिप्त रहे। उन्हें आज कोई जानता भी नहीं। लोग उन्हीं को याद रखते हैं जो अपने सुयश से तीनों लोकों को उज्वल बना जाते हैं ॥५०॥ अवनीमवनीशवंशजा वशयन्तः कुलजेन तेजसा । सुकृतैरुपभुञ्जते परं न हि तत्राधिकविक्रमः क्रमः ॥५१॥ प्रायः राजाओं के वंशज अपने कुल परम्परागत ऐश्वर्य के कारण पृथिवी को अपने वश में रख कर अपने पुण्यों से राज्य-सुख का उपभोग कर लेते हैं। इसमें उनका अपना कोई अधिक पराक्रम नहीं ॥५१॥ यदि कश्चन जायते पुमानिह विश्वोद्यमबुद्धिपौरुषः । स समुज्ज्वलयन् निजान्वयं ध्वनयत्युद्भटकीर्तिडिण्डिमम् ॥५२॥ किन्तु जो राजा अपनी सर्वतोमुखी प्रतिभा और अप्रतिहत पौरुष से विश्व को अपने वश में करता है वही अपने कुल को उज्वल बनाता है और उत्कृष्ट कीर्ति का ढिंढोरा पीट जाता है ॥५२॥ महसां निधयो महोदधेर्मणिवर्गाः कति वा न जज्ञिरे । हरिकण्ठतटाधिरोहणात् परमेकः प्रथितोऽस्ति कौस्तुभः ॥५३॥ समुद्र में से (मन्थन के समय) नाना प्रकार के अत्यन्त उज्वल और प्रकाशमान मणियों के समूह निकले, किन्तु भगवान् विष्णु के वक्षःस्थल पर स्थान प्राप्त कर लेने के कारण एक कौस्तुभ मणि ही आज तक विख्यात है ॥५३॥ मनुवंशभवो भगीरथस्त्रिजगद्गीतयशा विशालधीः । रघुपङ्क्तिरथादयः परे प्रथितास्ते पृथगद्भूतैर्गुणैः ॥५४॥ मनुवंश में जन्म लेने वाले महात्मा भगीरथ का यश आज भी तीनों लोकों में गाया जाता है। रघु और दशरथ आदि भी अपने अद्भुत गुणों के कारण विख्यात हैं ॥५४॥ अपरस्तव पूर्वजेषु कः प्रथितो दीक्षितवासुदेवतः । स्वयमर्जितमूर्जितौजसा नवराज्यं नृवरः शशास यः ॥५५॥ आपके पूर्वजों में भी दीक्षित वासुदेव के समान और कौन प्रतापी हुआ ? वासुदेव ही थे जिन नर-रत्न ने अपने भुजबल के तेज से नवीन राज्य स्थापित कर शासन किया ॥५५॥