भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 45, कुल 256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 45

द्वितीयः सर्गः १९ इतरोऽपि तदन्वयोद्भवोऽजयपालः स कथं न गण्यताम् ! उपपुष्करमन्यदुष्करं निरमाद् योऽजयमेरुदुर्गकम् ॥५६॥ हाँ, उनके वंश में जो अजयपाल हुए उनकी गिनती भी क्यों न की जाय ? क्योंकि उन्होंने पुष्कर तीर्थ के समीप अन्य लोगों के लिये दुष्कर अजयमेरु (अजमेर) दुर्ग का निर्माण किया ॥५६॥ श्रमविक्रमनीतिरीतिभिस्त्वमसाधारणमर्जयन् यशः । भवितासि भुवि प्रतिष्ठितो ध्रुवमाकल्पमनल्पपौरुषः ॥५७॥ महापौरुषवान् आप पराक्रम और राजनीति की रीतियों से असाधारण यश प्राप्त करके प्रलय-काल तक इस संसार में निश्चित ही प्रतिष्ठित हो जायेंगे ॥ ५७ ॥ मतिमानतिमानुषं यशः पदवीं वा प्रतिपित्सुरुच्छ्रिताम् । तपसा जपसाधनेन वा वरिवस्येद् विधिनेष्टदेवताम् ॥५८॥ जो बुद्धिमान् अतिमानुष यश अथवा अलौकिक पद प्राप्त करना चाहता है उसे चाहिए कि विधिपूर्वक तप और जप के साधन से इष्ट देवता को प्रसन्न करे ॥ ५८ ॥ अखण्डब्रह्माण्डं सहचरितगाण्डीववलयः स्वदोर्दण्डेनैव प्रसभमपहर्तुं प्रभुरपि । समाराध्य श्रद्धासमुचिततपोभिः पशुपतिं प्रपेदे रौद्रास्त्रं स किल नरनामा नरहरिः ॥५९॥ मनुष्यों में श्रेष्ठ अर्जुन, जिनका दूसरा नाम 'नर' भी था, सदा साथ रहनेवाला गाण्डीव धनुष ही जिनका वलय था, और जो अपने भुज-दण्ड के पराक्रम से सारे ब्रह्माण्ड को हठात् वश में करने में समर्थ थे, उन्होंने भी पूर्ण श्रद्धा के साथ उचित तपस्या करके भगवान् शंकर को प्रसन्न किया और उनसे रौद्रास्त्र प्राप्त किया। ॥ ५९ ॥ त्वमप्येवं देवं कमपि सुखसेवं परतरं भजञ्छ्रद्धा श्रद्धाधिकतरविशुद्धाशयतया । अरण्ये पुण्ये वा क्वचन पशुशून्येऽपि विषये ध्रुवां सिद्धिं विद्धि प्रगुणितसमृद्धिं करगताम् ॥६०॥ आप भी अब किसी पवित्र वन में या किसी प्राणि-शून्य निर्जन स्थान में पूर्ण श्रद्धा से अपने हृदय को विशुद्ध करके किसी परात्पर, सुख से सेवा किये जाने योग्य, आशुतोष देवता का भजन करें और निश्चय ही प्रगुणित समृद्धि से युक्त सिद्धि को अपनी मुट्ठी में आई हुई समझें ॥ ६० ॥ शुम्भाऽसुरप्रशमनी सकलार्थदात्री शाकम्भरी जनपदे भवति प्रतीता । आराधयन्नभिमतां परदेवतां तां वीतान्तरायमवधारय सिद्धमर्थम् ॥६१॥ शुम्भ दैत्य को मारने वाली, सम्पूर्ण सिद्धियों को देनेवाली, भगवती इस देश में (साँभर में) शाकंभरी के नाम से प्रसिद्ध है। इन परमपूज्य परदेवता भगवती की आराधना करके आप विघ्नों को नष्ट और अर्थ को सिद्ध समझें ॥ ६१ ॥