भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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२० सुर्जनचरितमहाकाव्यम् इति गिरमनुरूपां नीतिसौहार्दरीत्योः सुनयमुखसमुत्थां सोपि सम्यग्विचार्य । नरपतिरतिभूमिं प्राप्तया मोदलक्ष्म्या विकसितवदनश्रीरादरादभ्यनन्दत् ॥६२॥ चरम सीमा को प्राप्त हुई प्रसन्नता के कारण विकसित हुईं मुख की शोभा से युक्त राजा विश्वपति ने सुनय के मुख से निकले हुए नीति और मित्रता की रीति के अनुकूल वचनों को अच्छी तरह सोच समझ कर बड़े आदर के साथ उनका अभिनन्दन किया ॥ ६२ ॥ अथ सुनयसहायः सम्यगह्नि प्रसन्नः परिणतसचिवेषु स्वां धुरं सन्निवेश्य । गिरिविपिनविहारव्याजतो राजवर्यः परिमितपरिवारः प्रौढसारः प्रतस्थे ॥६३॥ इसके बाद विनम्र मन्त्रियों पर अपने राज्य का भार छोड़कर, सुनय के साथ एक दिन शुभ मुहूर्त में बलवान् और प्रसन्न राजा विश्वपति ने इने-गिने लोगों को साथ लेकर वनों और पर्वतों में विहार करने के बहाने (शाकंभरी देवी के मन्दिर की ओर) प्रस्थान किया ॥ ६३ ॥ इति सुर्जनचरितमहाकाव्ये द्वितीयः सर्गः