भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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तृतीयः सर्गः पुरस्कृतः पार्श्वचरैरथाल्पैः प्रजेश्वरः पुष्परथाधिरूढः । प्रसन्नचेता दिवसे प्रशस्ते द्विजैः कृतस्वस्त्ययनः प्रतस्थे ॥ १ ॥ उस शुभ दिन प्रसन्नचित्त राजा विश्वपति ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन करवा कर, इनेगिने अनुचरों को अपने आगे करके, पुष्पों से सज्जित रथ पर आरूढ़ होकर चले ॥ १ ॥ तमन्वगान् मानवदेवमुच्चैः प्रेमानुबन्धेन वशो वयस्यः । यशो जगत्सु प्रथयिष्यमाणं राजा ऋतूनामिव कामदेवम् ॥ २ ॥ निकट भविष्य में ही विश्व में अद्वितीय यश को पर्याप्त मात्रा में फैला देने वाले उन नरपति विश्वपति के पीछे, कामदेव के पीछे ऋतुराज वसन्त के समान, दृढ़ प्रेम-पाश में बँधे हुए मित्र सुनय चल रहे थे ॥ २ ॥ तमुत्तराशां तरसा प्रयान्तं तेजःप्रकर्षं प्रतिलप्स्यमानम् । गुरोस्तनूजोऽनुजगाम धाम्नामधीशमह्नाय यथा निदाघः ॥ ३ ॥ उत्तर दिशा की ओर वेग से प्रयाण करने वाले और शीघ्र ही और भी उत्कृष्ट तेज को प्राप्त करने वाले उन तेजःपुञ्ज विश्वपति के पीछे, उत्तरायण और प्रचण्ड सूर्य के पीछे ग्रीष्म ऋतु के समान, गुरु-पुत्र सुनय चल रहे थे ॥ ३ ॥ अनुप्रयाणाय कृतानुबन्धान् निवर्त्य बन्धून् वसुधाधिनाथः । संभाव्य पौरानपि पौरकान्तः कान्तैर्वचोभिर्निरियाय पुर्याः ॥ ४ ॥ साथ चलने का प्रयत्न करनेवाले बन्धु-वर्ग को राजा ने वापस लौटा दिया। मधुर वचनों से प्रजा का सत्कार कर वै प्रजाप्रिय नरेश नगरी के बाहर चले गये ॥ ४ ॥ समश्नुवानान् स्वपरोपतापाद्वह्निप्रवेशोग्रतपःफलानि । कुम्भस्तनीभिः परिरब्धकण्ठान् संभावयामास स पूर्णकुम्भान् ॥ ५ ॥ अपने उत्कृष्ट परिपाक के लिये जो अग्नि-प्रवेश रूपी कठिन तप किया था मानों उसी का पुण्य फल भोगने वाले, घट के समान पीवर स्तन वाली कामिनियों द्वारा आलिंगित कण्ठ वाले, जल से भरे हुए, घड़ों का (शुभ शकुन होने के कारण) राजा ने स्वागत किया (अथवा कलश बँधाने की प्रथा पूर्ण की) ॥ ५ ॥ (२) प्रथयिष्यमाणं विस्तृतं करिष्यमाणम् । (४) पौरेषु पौराणां वा कान्तः मनोहरः प्रजाप्रियश्चेत्यर्थः । (५) स्वस्य यः पर उत्कृष्ट उपतापरूपः सन्तापरूपो वह्नौ प्रवेशस्तदेवोग्रं तपस्तस्य फलानि समश्नु- वानान् उपभुञ्जानान् । संभावयामास इति पदेन शुभशकुनरूपत्वादपि राज्ञस्तत्राऽऽदरातिशयो व्यञ्जितः।