सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् मालाः सिताम्भोजदलाभिरामा नृपः पताका इव कार्यसिद्धेः । प्रसारितास्ता अपि चारुदृष्टीः प्रत्यग्रहीन् मालिकनागरीणाम् ॥ ६ ॥ कार्यसिद्धि की पताका के समान शोभित होने वाली एवं मालिन स्त्रियों द्वारा पहनाई गईं श्वेत कमल दल की सुन्दर मालाओं को, उन स्त्रियों के मनोहर कटाक्षों के साथ साथ, राजा ने ग्रहण किया ॥ ६ ॥ तस्योपरिष्टात् परितः पतन्तं निवारयन्तो रविरश्मिजालम् । विनैव दण्डेन शरत्पयोदाः सितातपत्रत्वमयुस्तदानीम् ॥ ७ ॥ राजा के ऊपर चारों ओर से गिरनेवाले सूर्य की किरणों के समूह को रोक कर शरद् ऋतु के शुभ्र बादल उस समय बिना दण्ड के श्वेत छत्र के समान सुशोभित हुए ॥ ७ ॥ गन्धानुमेयानपनोतनिद्रसरोजराजीमकरन्दबिन्दून् । उपाहरन्तो मिहिरांशुतप्तं सिषेविरे तं सरसीसमीराः ॥ ८ ॥ सरोवरों के शीतल पवन, जो प्रफुल्ल कमलों की पंक्तियों के मकरन्द-बिन्दुओं से सुगन्धित थे, सूर्य की किरणों से तप्त राजा की सेवा कर रहे थे ॥ ८ ॥ पर्यन्तमासाद्य ततः पदव्या दिनैः कियद्भिः सुकृती सुखेन । पूर्वोपदिष्टं सुनयेन दूराच्छाकम्भरीदेशमपश्यदग्रे ॥ ९ ॥ पुण्यात्मा राजा कुछ दिनों में सुखपूर्वक मार्ग के अन्त तक जा पहुँचे और सुनय द्वारा पहले बताया गया सांभर देश उन्होंने दूर से अब अपने आगे देखा ॥ ९ ॥ ज्ञातस्तदाऽभ्रङ्कषया विदूराद् देव्याः पुरो हर्म्यपताकयैव । नृपाय तस्मै पुनरुक्तवाग्भिरावेदितो जानपदैः स देशः ॥१०॥ विश्वपति बहुत दूर पहले से ही शाकंभरी देवी के मन्दिर की आकाश को छूने वाली पताका को देख कर उस देश को पहचान गये थे । वहाँ पहुँचने पर जब लोगों ने उस देश का नाम बताया तो उसकी पुनरुक्ति मात्र हुई ॥ १० ॥ दृष्ट्वा जयन्तीमथ वैजयन्तीमानन्दतः स्यन्दनतोऽवरुह्य । साष्टाङ्गपातः मुहुरष्टमूर्तेः कुटुम्बिनीं विश्वपतिर्ववन्दे ॥११॥ विजय से फहराती हुई मन्दिर की पताका को पास देखकर राजा विश्वपति बड़े आनन्द से रथ से उतर गये और भगवान् शिव की अर्द्धांगिनी भगवती शाकंभरी की बार बार साष्टाङ्ग प्रणामों द्वारा वन्दना की ॥ ११ ॥ पुरोपकण्ठं प्रतिपत्स्यमानं पुरोधसा तेन समं निशम्य । प्रत्युद्ययुः पौरजनाः प्रमोदान् नृपोचितोपायनपाण्यस्तम् ॥१२॥ यह सुन कर कि पुरोहित सुनय के साथ राजा अब शीघ्र नगर के समीप पहुँच जायेंगे, वहाँ के प्रजा जन बड़ी प्रसन्नता से राजा को भेंट देने योग्य वस्तुयें हाथों में ले लेकर पहुँचे ॥ १२ ॥