भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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तृतीयः सर्गः २३ आतिथ्यसम्भारभरां सपर्यां प्रगृह्य तेषां सुमनाः स राजा । प्रश्नैरुदारैः कुशलप्रदानैरनुग्रहो विग्रहवान् बभूव ॥१३॥ नृपोचित आतिथ्य की वस्तुओं से युक्त उन भेटों को ग्रहण कर विशाल हृदय वाले राजा ने बड़े प्रेम से उन प्रजाजनों से कुशल-प्रश्न पूछे और राजा उनके लिये मूर्तिमान् अनुग्रह बन गये ॥ १३ ॥ तत्रैव बाह्योपवनेऽतिवाह्य निशीथिनीं तां शिथिलाध्वखेदः । प्राप्तः परेद्युः प्रयतान्तरात्मा पतिः प्रजानामविशत् पुरं तत् ॥१४॥ संयमी राजा विश्वपति ने नगर के बाह्य उपवन में ही वह रात बिता कर मार्ग का श्रम दूर किया और दूसरे दिन नगर में प्रवेश किया ॥ १४ ॥ स ग्रामसीम्नामवस्थितान् तान् विनायकादीन् विनयात् प्रणम्य । अपश्यदाश्चर्यतरङ्गितात्मा तरङ्गिणीरोधसि पुष्पवाटीम् ॥१५॥ गाँव की सीमा पर स्थित गणेश आदि देवताओं को सविनय प्रणाम कर, आश्चर्य से उद्वेलित [