सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् यस्यां निनादैर्विशदच्छदानां पुंस्कोकिलानां कलकण्ठनादैः । स्पर्धाऽनुबन्धीनि विरामशून्यं विरेजिरे बर्हिणकूजितानि ॥१९॥ जहाँ हंसों और सारसों के मधुर निनाद को तथा कोकिलों के मनोहर कण्ठस्वर को सुन सुन कर मोर मानों स्पर्धा से निरन्तर कूज रहे थे ॥१९॥ यस्यां लवङ्गीमपि मल्लिकां च जातीं च रोलम्बयुवाऽवलम्ब्य । पिबन् मुहुः स्तोकतरं मरन्दं चकार तासामिव तारतम्यम् ॥२०॥ जहाँ युवा भ्रमर लवङ्गी, मल्लिका और जाति के फूलों का थोड़ा थोड़ा मकरन्द रस बार बार पीकर मानों उनके उत्कर्षापकर्ष की परीक्षा ले रहा था ॥२०॥ स्वर्नायिकाकल्पितकर्णपूरमन्दारगुत्सेन सहावतीर्णाः । यत्पुष्पवल्लीषु विलासलोलाः पुनर्न दध्युस्त्रिदिवं द्विरेफाः ॥२१॥ (भगवती के दर्शनार्थ आने वाली) स्वर्ग की देवियों के कानों में पहने गये मन्दार पुष्पों के गुच्छों के साथ-साथ उस उद्यान में उतरने वाले भ्रमर वहाँ की पुष्पवल्लियों के साथ विलास में अनुरक्त होकर फिर वापस स्वर्ग जाने का नाम नहीं लेते थे ॥२१॥ दृशोरिदम्पूर्वतया विशेषादाकर्षणों तामवलोकमानः । विशां पतिर्विस्मयविस्मृतेन नासीन् निमेषेण कृतान्तरायः ॥२२॥ उस पुष्पवाटिका की प्रत्येक वस्तु अनुपम सुन्दर होने के कारण नेत्रों को मानों 'पहले मुझे देखिये' कह कर विशेष रूप से आकर्षित कर रही थी । राजा विश्वपति अत्यन्त आश्चर्य से चकित होकर उसे निर्निमेष देखने लगे ॥२२॥ ततो भृतोत्साहभरे नरेन्द्रे निधाय दृष्टिं स निधिर्गुणानाम् । जगाद योग्यं जगदम्बिकाया विगाहमानः सुनयो वनान्तम् ॥२३॥ तब गुणनिधि सुनय ने जगदम्बा के उस उद्यान में प्रवेश किया और उत्साह से भरे हुये राजा पर दृष्टि डाल कर उस समय के योग्य इस प्रकार निवेदन किया ॥२३॥ उद्यानमेतन् मदनारिपत्न्याः सदृतुभिः षड्भिरुपास्यमानम् । निषेवमाणो विजितारिष्टकः समश्नुते षण्मुखगां समृद्धिम् ॥२४॥ कामदेव को भस्म करने वाले भगवान् शिव की अर्द्धाङ्गिनी भगवती पार्वती का यह उद्यान सदा छहों ऋतुओं (वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद्, हेमन्त और शिशिर) से सुशोभित रहता है । यहाँ रह कर छहों शत्रुओं को (काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह और मात्सर्य को) जीतने वाला भगवती का भक्त देव-सेनापति स्वामी कार्तिकेय की सी दिव्य समृद्धि प्राप्त कर लेता है ॥२४॥ भृङ्गावलीझङ्कृतिसङ्कुलेन वनप्रियाणां कलकूजितेन । तिरोहितं पञ्चमगीतमस्मिन्नाकर्ण्यते किन्नरकामिनीनाम् ॥२५॥ भ्रमरों की पंक्तियों की गूंज के साथ मिश्रित कोकिलों के मधुर पञ्चम स्वर के कारण यहाँ किन्नरों की कामिनियों द्वारा पञ्चम स्वर में गाये गये गीत सुनाई नहीं देते ॥२५॥ (१९) विशदच्छदानां हंसानाम् ।