भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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४ तृतीयः सर्गः २५ कदम्बवीथीमनुवेदिमध्यमध्यासिता व्योमसदां सुमध्याः । अस्मिन् भवानीमुपवीणयन्ति वाणीमुखादुल्लसितैः प्रबन्धैः ॥२६॥ यहाँ कदम्बों के कुञ्ज के पास बनी हुई वेदी के बीच में बैठ कर स्वर्ग की पतली कमर वाली देवियाँ स्वयं सरस्वती के मुखारविन्द से निकले हुये स्तुतिगीतों को वीणा पर बजाते हुये गाकर भगवती की आराधना किया करती हैं ॥२६॥ अस्यान्तरे सन्ततरत्नजालैर्हिरण्मयोऽसौ खचितः समन्तात् । प्रासादराजो गिरिराजपुत्र्याः पुरोऽपरो राजति रत्नसानुः ॥२७॥ इस उद्यान के बीच में वह सामने दिखाई देने वाला देवी पार्वती का भव्य मन्दिर जो सोने का बना है और जिसमें चारों ओर देदीप्यमान रत्न जड़े हैं एक दूसरे रत्नशिखर के समान शोभित हो रहा है ॥२७॥ विनिर्मितं हीरदलैरुदारैः प्रालम्बिमुक्तालतिकं समन्तात् । दण्डं महानीलमयं दधानं पश्यातपत्रं सितमद्रिपुत्र्याः ॥२८॥ चारों ओर बड़े-बड़े मोतियों से जड़ा हुआ और अमूल्य हीरों के समूहों से बना हुआ तथा महानील मणियों (नीलम) से बने हुये लम्बे दण्ड वाला भगवती पार्वती का यह श्वेत छत्र देखिये ॥२८॥ श्रियं सितच्छत्रतले दधाति दण्डो महानीलविनिर्मितोऽयम् । स्वर्भानुदन्तव्रणवर्त्मनाऽधःपतन्निवेन्दोस्तनुरेखयाङ्कः ॥२९॥ श्वेत छत्र के नीचे यह महानील मणियों (नीलम) का बना हुआ दण्ड इस प्रकार शोभित , हो रहा ह मानों राहु के दाँतों के प्रहार से चन्द्रमा के शरीर पर पड़े हुये छेद के मार्ग से चन्द्रमा के नीले धब्बे का एक बारीक लम्बा टुकड़ा आ गिरा हो ॥२९॥ अधो दधानं नवनीलदण्डं छत्रं पुरः पश्य सितांशुगौरम् । उपेन्द्रपादोपरि वर्त्तमानं स्थिरं महावर्त्तमिव द्युनद्याः ॥३०॥ देखिये सामने (हीरोंकी) शुभ्र-किरणों से जगमगाता हुआ यह श्वेत छत्र, जिसके नी' नीलम का दण्ड सुशोभित है, ऐसा लग रहा है मानों भगवान् विष्णु के (नीले) पाँव पर स्थित गंगाजी के जल की स्थिर भँवर हो (गंगा जी विष्णु भगवान के पैर के अँगूठे से निकलीं हैं। विष्णु का रंग नीला है। गंगाजल का रंग श्वेत है।) ॥३०॥ तरङ्गिता मन्दतरैर्मरुद्भिर्निशाकरांशुप्रतिमाः पताकाः । अनेकधा भिन्नतयाऽतिसूक्ष्मा विभान्ति धारा इव नाकनद्याः ॥३१॥ मन्द मन्द पवन से हिलोरें लेती हुईं ये चन्द्रकिरणों के समान धवल पताकायें, आकाश-गंगा की कई मार्गों में बँट जाने के कारण अत्यन्त सूक्ष्म दिखाई देने वाली धाराओं के समान, सुशोभित हो रही हैं ॥३१॥ (३०) उपेन्द्रो विष्णुः ।