सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् अमूनि चालोकय पाण्डुरत्नैश्चत्वारि चामीकरतोरणानि । येषां बहिस्था हरितामधीशाः सेवां वहन्ति प्रतिहारहार्याम् ॥३२॥ श्वेत रत्नों से जड़े हुये सुवर्णनिर्मित इन चार बाहर के दरवाजों को देखिये जिनके बाहर खड़े हुये दिक्पाल द्वारपाल का कार्य कर रहे हैं ॥३२॥ विनिह्नुतं दीप्तिवितानकेन सितांशुरत्नस्य वितानजालम् । अन्तर्हितस्वर्गत रुपसूनमालोपगूढालिरुतैः प्रतीतम् ॥३३॥ उज्ज्वल श्वेत किरणों वाले रत्नों से निर्मित यह गोल छत्र (देवी के) तेजःपुञ्ज के घेरे से छिपा हुआ भी, अपने भीतर स्थित स्वर्ग के मन्दार पुष्पों की मालाओं के अन्दर छिपे हुये भ्रमरों की गूंज से प्रतीत हो रहा है ॥३३॥ अत्रागतानां सहसैव सिद्धिर्मा भैष्ट विघ्नादिति हस्तचिह्नम् । दिदेश देवी निजशासनं तु पञ्चाङ्गुलीकैतवतो गृहेषु ॥३४॥ मन्दिर की भित्ति पर देवी का हस्तचिह्न बना हुआ है। उसकी पाँचों खुली हुई अँगुलियों के बहाने मानों देवी यह निर्देश दे रही है—"यहाँ भक्तिपूर्वक आनेवालों को सहज ही में सिद्धि प्राप्त हो जाती है, उन्हें विघ्नों से कोई भय नहीं।" ॥३४॥ शुभ्रत्रिपुण्ड्रच्छलतो दधानास्त्रिस्रोतसं मूर्धनि साधकेन्द्राः । रुद्राक्षदामोज्वलनीलकण्ठाः सर्वज्ञतां साधु भजन्ति एते ॥३५॥ यहाँ उपासना करने वाले साधक-श्रेष्ठ धवल त्रिपुण्ड्र तिलक के बहाने मानों तीन स्रोत वाली गंगाजी को मस्तक पर धारण किये हुये हैं और नीली रुद्राक्ष-मालाओं को गले में पहन कर 'नीलकण्ठ' बने हुये हैं तथा उत्कृष्ट साधना द्वारा शिव-ज्ञान का साक्षात्कार करके वास्तव मे 'सर्वज्ञ' बन गये हैं अर्थात् ये श्रेष्ठ साधक शिव के समान केवल 'गंगाधर' और 'नीलकंठ' ही नहीं बने हुये हैं किन्तु 'सर्वज्ञ' बनकर वास्तव में शिव-स्वरूप हो गये हैं ॥३५॥ पद्मासनस्था अपि हंसलीनाः श्रुत्या निरुक्तं विधिमन्वयुर्ये । ध्यायन्ति धन्या नगराजकन्यापदाम्बुजं तेऽत्र समाधिभाजः ॥३६॥ पद्मासन लगाकर बैठे हुये भी हंस में स्थित (आत्मा में लीन), बिना कही बातों को भी सुनने वाले अर्थात् हृदय के भावों को भी जानने वाले और वेदों द्वारा प्रतिपादित विधियों का पालन करने वाले (अपने वाहन हंस पर पद्मासन लगाकर बैठे हुये वेदपाठी ब्रह्मा जी के समान सुशो- भित होने वाले) ये धन्य साधक-श्रेष्ठ समाधि लगाकर भगवती पार्वती के चरण-कमलों का ध्यान कर रहे हैं ॥३६॥ (३४) 'अत्र मन्दिरे आगतानां सहसैव सिद्धिर्भवति, यूयं विघ्नान्मा भैष्ट' इति हस्ताक्षरितं निजशासनं मन्दिरभित्तिषु पञ्चाङ्गुल्ल्यात्मकहस्तचिह्नव्याजेन देवी दत्तवती । (३६) हंसलीनाः हंसस्थाः हंसे आत्मनि लीनाश्च । श्रुत्या निरुक्तं श्रुतिप्रतिपादितम् । निरुक्तमनुक्तं श्रुत्या कर्णेनानुजग्मुरिति विरोधः, निरुक्तं प्रतिपादितमिति परिहारः । पद्मासनेन हंसासीनं विधिं विधातार- मनुचक्रुरित्यपि गम्यते ।