भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

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तृतीयः सर्गः २७ क्रोडीकृतायामपि नाम लक्ष्म्यां सत्वैकमूर्तिः पुरुषोत्तमोऽयम् । आस्ते जगतपालनयोग्यमत्र लोकोत्तरं पौरुषमीहमानः ॥३७॥ सत्व की (सत्व गुण की और पराक्रम की) साक्षात् मूर्ति, प्राणियों में श्रेष्ठ ये भगवान् विष्णु भी जिन्होंने समूची लक्ष्मी को अपनी गोद में बैठा रखा है, यहाँ जगत् के पालन करने की क्षमता प्रदान करने वाले अलौकिक पराक्रम को प्राप्त करने की इच्छा से भगवती की उपासना कर रहे हैं ॥३७॥ कस्तूरिकाकर्दमितप्रतीराः ससैकताश्चन्द्रपरागपूरैः । कालागुरुश्यामलितेः क्वचिच्च सशैवलाः केसरगुच्छपुञ्जैः ॥३८॥ विलेपनैर्ग्रन्थितगन्धसारद्रवप्रधानैर्घनगन्धसारैः । विनिर्मिताः पार्थिव पश्य कुल्याः कुलान्यलीनां भृशमन्धयन्तीः ॥३९॥ राजन् ! देखिये (देवी पर चढ़ाये गये) उत्कृष्ट सुगन्ध वाले चन्दन आदि के विलेपनों की ये छोटी-छोटी नदियाँ बह निकली हैं जिनके तटों पर कस्तूरी का कीचड़ है, कपूर की रेत है, काले अगुरु (धूप) से श्यामल केसर के गुच्छों के समूह काई या कुमुदिनी के समान लग रहे हैं, और जो अपनी तीव्र सुगन्ध से भ्रमरों के समूहों को अत्यन्त मदान्ध बना रही हैं ॥३८-३९॥ आवृत्य वक्त्रं वसनाञ्चलेन पुरो भ्रमद्भृङ्गभयेन भीरुः । निर्मातुकामा कमलस्य मालां गुणे निजं गुम्फति पाणिपद्मम् ॥४०॥ अपने ऊपर मँडराते हुये भौंरे के भय से (स्वभाव से ही) भीरु इस कामिनी ने अपने मुख को साड़ी के अञ्चल से ढक लिया है। यह कमलों की माला गूंथ रही है, किन्तु (मुँह ढका होने के कारण) कमल के बजाय अपने कर-कमल को ही सूत्र में पिरो रही है ॥४०॥ उच्चेतुकामागुरुसारधूमं गता गवाक्षावधि भृङ्गपङ्क्तिः । तस्मिन् गते सूक्ष्मतयाऽनुजालैर्नतानतेयं शनकैर्निवृत्ता ॥४१॥ (सुगन्ध से आकृष्ट होकर) अगुरु धूप के सुगन्धित धूम को पकड़ने के लिये भ्रमरों की ऊपर जाली के झरोखे तक गई। धुआँ तो झरोखे की सूक्ष्म जालियों में से बाहर निकल फिर भी भ्रमर-पंक्ति ऊपर नीचे कई बार मँडरा कर धीरे धीरे वहाँ से हटी ॥४१॥ अशेषतः सञ्चरितेऽपि धूमे न धूपपात्रं तरुणी जहाति । प्रतार्यमाणा श्वसितानुसारं भ्रमद्भिरभ्यर्थनया द्विरेफैः ॥४२॥ अपनी (सुगन्धित) साँसों पर मँडराने वाले भ्रमरों के अपने पास पास ही उड़ते रहने के कारण उनके द्वारा ठगी गई तरुणी ने धूप के पूरा जल जाने पर भी और धूम के चारों ओर फैल जाने पर भी, धूप के पात्र को हाथ से नहीं हटाया ॥४२॥ (३८) चन्द्रपरागः कर्पूररजः । (३९) गन्धसारश्चन्दनः । कुल्याः क्षुद्रनद्यः ।