सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
तृतीयः सर्गः २७ क्रोडीकृतायामपि नाम लक्ष्म्यां सत्वैकमूर्तिः पुरुषोत्तमोऽयम् । आस्ते जगतपालनयोग्यमत्र लोकोत्तरं पौरुषमीहमानः ॥३७॥ सत्व की (सत्व गुण की और पराक्रम की) साक्षात् मूर्ति, प्राणियों में श्रेष्ठ ये भगवान् विष्णु भी जिन्होंने समूची लक्ष्मी को अपनी गोद में बैठा रखा है, यहाँ जगत् के पालन करने की क्षमता प्रदान करने वाले अलौकिक पराक्रम को प्राप्त करने की इच्छा से भगवती की उपासना कर रहे हैं ॥३७॥ कस्तूरिकाकर्दमितप्रतीराः ससैकताश्चन्द्रपरागपूरैः । कालागुरुश्यामलितेः क्वचिच्च सशैवलाः केसरगुच्छपुञ्जैः ॥३८॥ विलेपनैर्ग्रन्थितगन्धसारद्रवप्रधानैर्घनगन्धसारैः । विनिर्मिताः पार्थिव पश्य कुल्याः कुलान्यलीनां भृशमन्धयन्तीः ॥३९॥ राजन् ! देखिये (देवी पर चढ़ाये गये) उत्कृष्ट सुगन्ध वाले चन्दन आदि के विलेपनों की ये छोटी-छोटी नदियाँ बह निकली हैं जिनके तटों पर कस्तूरी का कीचड़ है, कपूर की रेत है, काले अगुरु (धूप) से श्यामल केसर के गुच्छों के समूह काई या कुमुदिनी के समान लग रहे हैं, और जो अपनी तीव्र सुगन्ध से भ्रमरों के समूहों को अत्यन्त मदान्ध बना रही हैं ॥३८-३९॥ आवृत्य वक्त्रं वसनाञ्चलेन पुरो भ्रमद्भृङ्गभयेन भीरुः । निर्मातुकामा कमलस्य मालां गुणे निजं गुम्फति पाणिपद्मम् ॥४०॥ अपने ऊपर मँडराते हुये भौंरे के भय से (स्वभाव से ही) भीरु इस कामिनी ने अपने मुख को साड़ी के अञ्चल से ढक लिया है। यह कमलों की माला गूंथ रही है, किन्तु (मुँह ढका होने के कारण) कमल के बजाय अपने कर-कमल को ही सूत्र में पिरो रही है ॥४०॥ उच्चेतुकामागुरुसारधूमं गता गवाक्षावधि भृङ्गपङ्क्तिः । तस्मिन् गते सूक्ष्मतयाऽनुजालैर्नतानतेयं शनकैर्निवृत्ता ॥४१॥ (सुगन्ध से आकृष्ट होकर) अगुरु धूप के सुगन्धित धूम को पकड़ने के लिये भ्रमरों की ऊपर जाली के झरोखे तक गई। धुआँ तो झरोखे की सूक्ष्म जालियों में से बाहर निकल फिर भी भ्रमर-पंक्ति ऊपर नीचे कई बार मँडरा कर धीरे धीरे वहाँ से हटी ॥४१॥ अशेषतः सञ्चरितेऽपि धूमे न धूपपात्रं तरुणी जहाति । प्रतार्यमाणा श्वसितानुसारं भ्रमद्भिरभ्यर्थनया द्विरेफैः ॥४२॥ अपनी (सुगन्धित) साँसों पर मँडराने वाले भ्रमरों के अपने पास पास ही उड़ते रहने के कारण उनके द्वारा ठगी गई तरुणी ने धूप के पूरा जल जाने पर भी और धूम के चारों ओर फैल जाने पर भी, धूप के पात्र को हाथ से नहीं हटाया ॥४२॥ (३८) चन्द्रपरागः कर्पूररजः । (३९) गन्धसारश्चन्दनः । कुल्याः क्षुद्रनद्यः ।
२८ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् प्रद्योतयन्ती परितः प्रदीपान् स्वभूषणेषु प्रतिबिम्बिताङ्गान् । मनोभुवो मूर्तिमतातपेनालिङ्गितेव प्रतिभाति तन्वी ॥४३॥ कोईं सुमध्या तरुणी चारों ओर दीपक जला रही है। उसके आभूषणों में दीपकों का प्रति- बिम्ब पड़ने से ऐसा प्रतीत होता है मानों कामदेव के मूर्तिमान् प्रताप ने उसका आलिङ्गन कर रखा हो ॥४३॥ इयं भवानीभवनं पुनः किं चित्रेण सम्भावयति स्म सुभ्रूः । अलभ्यवस्तुप्रतिपादनेन चित्रं प्रकृत्यैव समस्तमस्य ॥४४॥ कोई सुन्दर भौंहों वाली तरुणी देवी के मन्दिर में चित्र बना रही है। यह मन्दिर तो (अपने भक्तों को) अलभ्य वस्तु प्रदान करने के कारण स्वभाव से ही 'चित्र' अर्थात् विचित्र महिमा वाला है। फिर इसको दोबारा 'चित्र' से सुसज्जित करने का प्रयास क्यों ? ॥४४॥ असौ स्वभक्तिप्रतिपादनाय भक्तिं शिवासद्मभुवस्तनोतु । तथापि कामं कमलाननानां
तृतीयः सर्गः २९ नृत्य-कुशल मयूरों की अत्यन्त मनोहर ‘केका’ ध्वनि सुनाई दे रही है। तथा कहीं ब्राह्मणों के वेदपाठ की ध्वनि और ‘जय’ ‘जय’ कार के शब्दों की ध्वनि से मिश्रित, श्रद्धा से हाथ जोड़े हुये जन-समूह के द्वारा भक्तिपूर्वक आनुपूर्वी से पढ़े जाने वाले, श्रुति और स्मृति के पवित्र स्तोत्रों की ध्वनि सुनाई दे रही है। कहीं अत्यन्त भक्ति के कारण ‘पहले मैं जाऊँ’ ‘पहले मैं जाऊँ’ इस प्रकार की स्पर्धा से मन्दिर के भीतरी भाग में प्रवेश करने के लिये उद्यत जन-समूह के कोलाहल की ध्वनि सुनाई दे रही है। कहीं ढोल, शंख, नगाड़े और घंटे आदि के दिशाओं को गूंजा देने वाले शब्द सुनाई पड़ रहे हैं और कहीं इसी प्रकार के अन्य सुन्दर वाद्यों की ध्वनि सुनाई दे रही है। उपर्युक्त सब ध्वनियों का एक साथ मिल कर एक विचित्र प्रकार का अनिर्वचनीय घोष सुनाई दे रहा है, जैसे नाना प्रकार के पुष्पों की सुगन्धियों को एक साथ वहन करने वाले पवन की एक विचित्र प्रकार की मिश्रित सुगन्ध आती हो ॥४६-५०॥ एवं स शृण्वन् सुनयस्य वाणीं विनीतवेशः प्रविवेश वेश्म । पुष्पादि-संभारभृतोऽथ भृत्यास्तमन्वयुः केचन मानवेन्द्रम् ॥५१॥ सुनय के इन वचनों को सुन कर राजा विश्वपति विनीत वेश धारण करके मन्दिर के अन्दर प्रविष्ट हुये। उनके अनुचर पुष्प आदि पूजा की सामग्री लेकर उनके पीछे पीछे गये ॥५१॥ यथोपचारं स नृपः सपर्यां समाप्य सोमार्धभृतो महिष्याः । प्रणम्य सम्यक् स्तुतिपाठगीतैरगात् सदः साधकसत्तमानाम् ॥५२॥ चन्द्रचूड़ शिव की अर्द्धांगिनी भगवती पार्वती की सांगोपांग विधिवत् पूजा समाप्त करके तथा विधिवत् स्तुतिपाठ करके देवी को प्रणाम कर, विश्वपति साधकों में श्रेष्ठ मुनिवरों के समाज में गये ॥५२॥ तत्राभिवाद्य प्रथमं मनीषी मनीषितं चाथ निवेद्य तेभ्यः । साङ्गं स विद्यां विदुषां प्रसङ्गादासेदिवान् सिद्धिमिवाद्धितीयाम् ॥५३॥ मनीषी राजा ने पहले उनका सादर अभिवादन किया और फिर अपनी इच्छा प्रकट कर उन विद्वानों से राजा ने सांग विद्या, अद्वितीय सिद्धि के समान, प्राप्त की ॥५३॥ अक्षीणया दक्षिणया स तेषां दाक्षिण्यभाजां प्रथमः प्रमोदम् । सम्पाद्य सद्यः प्रतिपद्यते स्म तथानुपूर्व्या विधिमर्हणायाः ॥५४॥ चतुर पुरुषों में अग्रगण्य राजा ने अपनी अक्षीण दक्षिणा से उन विद्वानों को प्रसन्न कर उनसे आनुपूर्वी सहित अनुष्ठान की विधि प्राप्त की ॥५४॥ अजातरूपाभरणोपि मूर्ध्नि स जातरूपो जनितो जटाभिः । विमुक्तवानक्षगुणेषु सङ्गं भृशं बभूवाक्षगुणेषु सक्तः ॥५५॥ यद्यपि राजा के मस्तक पर कोई ‘जातरूपाभरण’ (स्वर्ण के आभूषण) नहीं थे, फिर भी वे जटाओं से ‘जातरूप’ (सुन्दर) प्रतीत होते थे। उन्होंने ‘अक्ष-गुण’ (चौपड़-पासों के शौक) का संग छोड़ दिया था, फिर भी ‘अक्ष-गुण’ में (रुद्राक्ष माला फिराने में) अत्यन्त आसक्त थे॥५५॥
३० सुर्जनचरितमहाकाव्यम् मुदं विधानात् किल देवतानां विशुद्धपक्षाश्रयणात् स राजा । वृत्तं दधानः परिपूर्णमेव बभौ मृगेणेव मृगाजिनेन ॥५६॥ यज्ञादि कर्मों से देवताओं को प्रसन्न रखने वाले, शुद्ध पक्ष का आश्रय लेने वाले, पूर्ण विशुद्ध चरित्र वाले वे राजा विश्वपति मृगचर्म पर, देवों के प्रिय एवं पूर्ण विम्ब धारण करने वाले शुक्ल- पक्ष के मृगांक चन्द्रमा के समान सुशोभित हुये (शुक्लपक्ष में पूर्ण बिम्ब से शोभित होने वाला मृगलाञ्छन चन्द्रमा देवताओं को अमृत पिला कर तृप्त करता है) ॥५६॥ वन्यं फलं मूलमथार्द्रपर्णं शुष्कं तदेवेति नृपः क्रमेण । प्रकल्पयन् भक्ष्यमपेततृष्णो दर्भास्तृतं स्थण्डिलमध्यशेत ॥५७॥ वे क्रम से पहले वन के फल, फिर कन्द-मूल, फिर हरे पत्ते और फिर सूखे पत्ते खाते थे एवं तृष्णा छोड़कर एक छोटे से मिट्टी के चबूतरे पर दर्भ का आसन बिछा कर सोते थे ॥५७॥ श्रद्धासमृद्धागमसम्प्रदायसत्वानुरूपैरखिलो पहारैः । त्रिसन्ध्यमेवान्धकवैरिजायामाराधयामास धरावतंसः ॥५८॥ पूर्ण श्रद्धालु भूमि-भूषण राजा ने आगम सम्प्रदाय के अनुकूल सब प्रकार की विधियों से— प्रातः, मध्याह्न और सायं—तीनों समय, शिवपत्नी भगवती की आराधना की ॥५८॥ कुर्वन् यथाकालमुपात्तकृत्यं निराकृतप्रावरणो नृवीरः । अम्बापदद्वन्द्वनिवेशितात्मा न द्वन्द्वदुःखानि विदाञ्चकार ॥५९॥ यथासमय विधिवत् कार्य करने वाले नरपति का अज्ञान आवरण हटने लगा और भगवती के चरणों में मन लगा देने के कारण उन्हें द्वन्द्व दुःखों का अनुभव नहीं हुआ ॥५९॥ यमेन नित्यं नियमेन चायं नितान्तमासादितभावशुद्धिः । सिंहासनार्होऽप्युचितं मुनीनां पद्मासनं शान्तमना बबन्ध ॥६०॥ नित्य यम-नियम का पालन करने से उन्हें उत्कृष्ट सत्त्व-शुद्धि प्राप्त हुई । राजसिंहासन पर बैठने वाले विश्वपति अब शान्तमना होकर मुनियों के योग्य पद्मासन लगा कर बैठने लगे ॥६०॥ सप्राणपञ्चेन्द्रियसंयमेन स निस्तरङ्गं निजमन्तरङ्गम् । नासाग्रसंदंशितशान्तदृष्टिर्नियोजयामास निजेष्टदेवे ॥६१॥ पंच प्राण और पंच इन्द्रियों का संयम करके तथा नासिका के अग्र भाग पर दृष्टि गाड़ कर शान्तमना राजा ने अपने (चंचल) मन को स्थिर बना कर इष्ट देवी भगवती में लीन कर दिया ॥६१॥ सर्वेन्द्रियाणां विनिरुध्य वृत्तिं स वीतसङ्कल्पतया कथञ्चित् । शनैः शनैः सानुमतस्तनूजामन्तःपदव्याः पथिकीञ्चकार ॥६२॥ संकल्प-विकल्प से ऊपर उठ कर, इन्द्रियों की विषय-वृत्ति को रोक कर, चित्त-वृत्ति का निरोध कर, राजा ने धीरे धीरे भगवती पार्वती को अपने अन्तःकरण में उतार लिया ॥६२॥ (५६) चन्द्रः शुक्लपक्षे सुधाप्रदानेन देवान् रञ्जयति, असौ राजा यज्ञादिकर्मसु हवीरूपसुधादानेन तान् रञ्जयति, पवित्रं पक्षं चाश्रयति । वृत्तं बिम्बं चरित्रं च ।
तृतीयः सर्गः ३१ अभ्यासयोगेन निरन्तरेण निरन्तरायेण हितस्य राज्ञः । विनैव निर्बन्धमवन्ध्यसेवा शाकम्भरी प्रादुरभूदजस्रम् ॥६३॥ विघ्नरहित और निरन्तर योगाभ्यास के कारण राजा से प्रसन्न होकर उनके हित के लिये भगवती शाकंभरी देवी, जिनकी सेवा कभी भी व्यर्थ नहीं जाती, बिना आग्रह के, साक्षात् प्रकट हुईं ॥६३॥ तद्ध्यानधाराविनिमग्नचेता विस्मृत्य सर्वान् विषयान् वशीन्द्रः । दशासु सर्वासु समस्तदिक्षु ददर्श तां दैवतवृन्दवन्द्याम् ॥६४॥ भगवती के ध्यान की धारा में मग्न चित्त वाले राजा ने सब प्रकार के विषयों को भूल कर एवं सब अवस्थाओं में अपने मन को वश में रख कर (भक्ति के प्रताप से) सब दिशाओं में देवताओं के वृन्दों से वन्द्य भगवती के दर्शन किये ॥६४॥ स्वप्नेषु स प्रेष्ठतमां पुरारेः पश्यन् विशेषात्नतु विस्मितोऽभूत् । ददर्श यज्जागरणेऽपि योगी जगन्ति पूर्णानि तयैव तावत् ॥६५॥ राजा स्वप्नों में भगवती के दर्शन करके अधिक विस्मित नहीं होते थे, किन्तु जब उन्होंने जाग्रत् अवस्था में सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त भगवती के (विराट् रूप के) दर्शन किये (तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ) ॥६५॥ अन्तःस्फुरन्त्याः परदेवताया महीयमानो महसा महीशः । ॰सुदुःसहोऽभूत् तपसा कृशोऽपि यथार्ककान्तः किरणेन भानोः ॥६६॥ अन्तःकरण में सदा स्फुरित रहने वाली भगवती परा शक्ति के तेज से महनीय राजा, तप के कारण दुर्बल होने पर भी, रवि की किरण के सामने सूर्यकान्त मणि के समान, सुदुःसह प्रतीत हुये ॥६६॥ इत्थं जपै रभिवषैर्यजनैस्तपोभिर्ध्यानेन होमविधिना द्विजतर्पणे श्च । अन्यैश्च भक्तिरचितैरुचितोपचारैराविश्चकार जननी नृपतौ प्रसादम् ॥६७॥ इस प्रकार जप, अभिषेक, यज्ञ, तप, ध्यान, होम, द्विज-तर्पण एवं अन्य भक्तिपूर्वक किये गये उपचारों से प्रसन्न होकर जगदम्बा ने विश्वपति पर अपना प्रसाद प्रकट किया ॥६७॥ वरय वरमभीप्सितं ददामि द्रुतमिह विश्वपते न तेऽस्तु भीतिः । निरुपधिवरिवस्ययाऽनया ते मम समजायत सम्प्रति प्रसादः ॥६८॥ विश्वपति ! इच्छित वर माँगो, मैं शीघ्र उसे दूँगी, तुम्हें कोई भय नहीं होगा, तुम्हारी इस निष्कपट सेवा से प्रसन्न होकर में अब अपना प्रसाद प्रकट कर रही हूँ ॥६८॥ आलोक्य तां तरुणभास्करकोटिजैत्रज्योतिर्विशेषविभवादविभाव्यमूर्तिम् । न प्रत्यपद्यत किमप्यवशान्तरात्मा स्विद्यत्सवेपथुतनूर्मनुजाधिनाथः ॥६९॥ करोड़ों प्रचण्ड सूर्यों की प्रभा को जीतने वाली ज्योति के कारण आँखों को चौंधिया देने वाली देवी के दर्शन कर विश्वपति विमूढ हो गये, उनके शरीर में स्वेद और कम्प होने लगा और उन्हें कुछ भी न सूझा ॥६९॥ इति सुर्जनचरितमहाकाव्ये तृतीयः सर्गः Dr. Urmila Sharma Collection, Varanasi
चतुर्थः सर्गः स क्षणात् प्रकृतिमेत्य पार्थिवः प्रार्थिताधिकफलोपधायिनीम् । स्तोतुमद्रितनयामुपाददे भारतीमिति सुभक्तिभावितः ॥ १ ॥ क्षण भर में ही विश्वपति ने प्रकृतिस्थ हो, प्रार्थना से भी अधिक फल देने वाली भगवती की पूर्ण भक्ति-भाव से यों स्तुति करना प्रारंभ किया ॥ १ ॥ गौरि! शौरिगिरिशाम्बुजासनास्त्वद्गुणोक्तिषु निबद्धवासनाः । आननानि दधतो बहून्यपि स्पन्दयन्ति रसना न साध्वसात् ॥ २ ॥ हे गौरि ! ब्रह्मा, विष्णु और शंकर आपके अपरिमित और अनिर्वचनीय गुणों को वर्णन करने की इच्छा रखते हुये भी और अनेक मुखों को (चतुरानन, पञ्चानन आदि) धारण करते हुये भी, भय से अपनी जिह्वा नहीं खोल पाते हैं ॥ २ ॥ वैभवं तव भवानि ! वेदितुं कोऽहमत्र गुरुमोहविह्वलः । नावधारयितुमुत्सहेत यत् सावधानमपि वैधसं मनः ॥ ३ ॥ हे भवानि ! भारी मोह से घिरा हुआ मैं आपका वैभव कैसे जान सकता हूँ ? ब्रह्मा जी का सावधान मन भी उसे जानने में समर्थ नहीं है ॥ ३ ॥ रूपमौपनिषदः सदातनं चिन्मयं तव वदन्ति केचन । चेतनेति चितिरित्यथाऽपरे शब्दभेदचतुराः पुराविदः ॥ ४ ॥ कोई उपनिषद्-ज्ञानी आपके रूप को कूटस्थ नित्य शुद्ध 'सत्' और शुद्ध 'चित्' बतलाते हैं और कोई शब्द-चतुर प्राचीन विद्वान् उसे 'चेतना' या 'चिति' कहते हैं ॥ ४ ॥ यद्बहिस्थमखिलप्रपञ्चतस्तद्विदामनुभवैकवेदनम् । स्वप्रकाशमवकाशि सर्वतः पार्वति ! त्वमसि तत्ववस्तु तत् ॥ ५ ॥ हे पार्वति ! आप वह अनादि और अनन्त तत्त्व वस्तु हैं जो तत्त्व समस्त-प्रपञ्चातीत है, स्वप्रकाश है, स्वतःसिद्ध है, सर्वव्यापी है और जिसका साक्षात्कार अपरोक्ष स्वानुभूति द्वारा ही हो सकता है ॥ ५ ॥ त्वां विना जननि ! चेतनामयीं नैव चेतितुमपि क्षमः पुमान् । किं पुनस्त्रिभुवनस्य निर्मितौ पालने प्रलयकल्पनेऽथवा ॥ ६ ॥ जगदम्ब ! आप परा चित्-शक्ति हैं। आपके बिना 'शिव' स्पन्दन भी नहीं कर सकते, जगत् के निर्माण, पालन और संहार की तो बात ही क्या । (जगत् के निर्माता ब्रह्मा, पालक विष्णु और संहर्ता शिव पराशक्ति के ही अंश हैं। परशिव और पराशक्ति में कोई अन्तर नहीं । गुणातीत और प्रपञ्चातीत परशिव शक्ति के कारण सगुण प्रतीत होते हैं। बिना शक्ति के शिव स्पन्दन भी नहीं कर सकते। बिना शक्ति के 'शिव' 'शव' के समान हैं) ॥ ६ ॥
५ चतुर्थः सर्गः ३३ त्वत्कलाभिरणिमादिभिः परं सिद्धिभिः परशिवः समेधितः । ईशितेति गिरिपुत्रि ! गीयते निष्कलोऽपि निखिलार्थदर्शिभिः ॥ ७ ॥ निर्गुण, निष्कल, पर शिव आपकी कलाओं, गुणों और अणिमा-महिमादिक सिद्धियों के कारण सगुण और सकल प्रतीत होकर 'ईशिता' (प्रभु, स्वामी, जगत् के निर्माता, पालक और संहर्ता) कहलाते हैं—ऐसा आगमों के अर्थ को जानने वाले विद्वानों का मत है ॥ ७ ॥ पद्मभूवदनपद्मपावनौ वाङ्मयीं प्रकृतिमाश्रयामि ते । या प्रसूय निगमाञ्जगत्प्रसूः सप्रकाशमकरोज्जगत्त्रयम् ॥ ८ ॥ मैं आपकी वाङ्मयी प्रकृति की शरण लेता हूँ जो समस्त जगत् की जननी है, जो ब्रह्मा जी के मुख-कमल द्वारा पवित्रित है और जिसने वेदों को प्रकट करके तीनों लोकों को सप्रकाश बना दिया है ॥ ८ ॥ निर्गुणस्य न शरीरसंस्थितिः सर्व एव हि गुणास्तदाश्रयाः । ब्रह्मविष्णुगिरिशाः शरीरिणो युक्तमेव वशगास्तवाम्बिके ॥ ९ ॥ निर्गुण, निष्कल, पर शिव की तो शरीर-स्थिति भी संभव नहीं (अर्थात् गुणातीत एवं प्रपञ्चा- तीत होने के कारण वे अशरीरी और अनिर्वचनीय हैं) । हमारी बुद्धि तो केवल गुणों को जान सकती है (निर्गुण को नहीं) और सम्पूर्ण गुणों का आधार आप ही हैं । जगन्मातः ! सृष्टि के निर्माता ब्रह्मा, पालक विष्णु और संहर्ता शिव ये तीनों आप ही के रूप हैं क्योंकि तीनों सगुण और शरीरधारी हैं और आपके वश में हैं ॥ ९ ॥ अप्यनावरणमीश्वरं शिवे ! सर्वतस्तिरयसि प्रभावतः । अप्यलीकमखिलं यथार्थवद् या तनोषि विभुता तवाद्भुता ॥१०॥ हे मंगलमयि ! आपका वैभव अद्भुत है क्योंकि वह अपने प्रभाव से स्वप्रकाश स्वतःसिद्ध पर शिव को भी, जो वस्तुतः कभी आवृत नहीं हो सकते, आवृत करता-सा प्रतीत होता है और इस सम्पूर्ण प्रपञ्च को, जो वस्तुतः मिथ्या है, सत्य-सा प्रतीत कराता है । (सत्य का आवरण करने वाली और मिथ्या की विक्षेप द्वारा प्रतीति कराने वाली आपकी सदसदनिर्वचनीय मा- का वैभव विलक्षण है) ॥१०॥ पञ्चवक्त्रचतुराननौ कथं वैभवं तव विवेक्तुमुद्यतौ । अर्थतस्तव पुरं च शंसितुं यत् सहस्रवदनोऽपि न क्षमः ॥११॥ चतुरानन ब्रह्मा और पञ्चानन शिव आपके वैभव को कैसे जान सकते हैं? जब सहस्रानन शेष भी वस्तुतः आपके विग्रह की महिमा को जान लेने में असमर्थ हैं ॥११॥ ज्ञानशक्तिरसि मुक्तिसाधनं भुक्तिरप्यचलपुत्रि ! मुक्तिदा । बन्धहेतुरसि बन्धुरूपिणी बन्धमोचनकरी च जन्मिनाम् ॥१२॥ हे पार्वति ! आप ज्ञानशक्ति हैं जो मोक्ष प्राप्ति का साधन है । आप ही 'भुक्ति' (भोग मय संसार) हैं और आप ही 'मुक्ति' (मोक्ष रूप कैवल्य) हैं । आप ही 'भुक्ति' (सांसारिक भोग) (११) पुरं अतिशयमहिमान्वितं विग्रहम् ।
३४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् देने वाली हैं और आप ही 'मुक्ति' (मोक्ष) देने वाली हैं। (आप भुक्तिमुक्तिप्रदायिका हैं।) आप ही प्राणियों की सच्ची बन्धु हैं। आप ही बन्धनरूप और बन्ध-हेतु हैं तथा आप ही मोक्ष- रूप और बन्धन छुड़ाने वाली हैं ॥१२॥ निर्गुणोऽपि सगुणस्त्वदाश्रयात् त्वां विना बहुगुणोपि निर्गुणः । इन्दिरे ! हरिहृदेकमन्दिरे ! त्वत्कृपाऽल्पतपसां न पार्श्वगा ॥१३॥ निर्गुण परशिव भी आपके कारण सगुण प्रतीत होते हैं। आपका आश्रय लेने पर गुण- हीन भी गुणवान् बन जाते हैं। आपके बिना गुणवान् भी गुण-हीन हैं। आप पराशक्ति हैं (और जिस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु, महेश आपके रूप हैं, उसी प्रकार सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती भी आपके रूप हैं)। आप ही विष्णु के हृदय-मन्दिर की देवी लक्ष्मी हैं (और आप ही सरस्वती और पार्वती हैं)। आपकी कृपा अल्प-पुण्य वालों के भाग्य में नहीं है ॥१३॥ शुम्भदैत्यदलने ! रणाङ्गणे का प्रशस्तिरधिका चकास्ति ते । अप्यखण्डजगदण्डमण्डलं चण्डि ! खण्डयसि हेलयैव यत् ॥१४॥ शुम्भ दैत्य को मारने वाली देवि ! जब आप उग्ररूप धारण कर चण्डी बन जाती हैं तब रण क्षेत्र में आपकी क्या प्रशंसा की जाय, आप सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को सहज ही में तोड़ सकती हैं ॥१४॥ त्वामपारमहिमोपबृंहितां स्तोतुमुद्यमवती मनागसौ । किं करोमि रसना निरङ्कुशा शङ्कते न खलु शङ्करप्रिये ! ॥१५॥ अपार महिमा से अलंकृत आपकी स्तुति करने के लिये मेरी निरंकुश जिह्वा थोड़ा प्रयत्न कर रही है। देवि ! मैं क्या करूँ, यह निरंकुश जिह्वा मानती ही नहीं ॥१५॥ त्वद्गुणश्रवणसाधनं मया नाश्रितं सदुपदेशिनां सदः । त्वं गता श्रुतिपथं यदि क्वचिन् नादरान् मनसि चाधिरोपिता ॥१६॥ आपके गुण को सुनने के लिये मैंने सदुपदेश देने वाले विद्वानों के समाज का आश्रय नहीं लिया। यदि कभी आपकी महिमा सुन भी ली तो आपको अपने मनमें आदरपूर्वक स्थित नहीं किया ॥१६॥ मादृशाऽलसतया शयालुना कुर्वताप्यनुपपत्तिकल्पनाम् । नैव पाणियुगलं पवित्रितं शैलपुत्रि ! परिचर्यया तव ॥१७॥ मुझ जैसे आलसी और (अज्ञानान्धकार में) सोने वाले मनुष्य ने, अनेक प्रकार की अयुक्त कल्पनायें करते रहने पर भी, कभी, हे पार्वति ! आपकी सेवा करके इन दोनों हाथों को पवित्र नहीं किया ॥१७॥ चिन्तनेन सुलभा त्वमन्तरं प्राणिनां श्रितवती निरन्तरम् । मानसं तदपि न क्षणं मया पादयोस्तव शिवे ! निवेशितम् ॥१८॥ मङ्गलमयि ! आप अन्तर्यामिनी हैं। सब प्राणियों के अन्तःकरणों में निरन्तर निवास करने वाली हैं। आप भक्तिपूर्वक चिन्तन करने पर सुलभ हैं। फिर भी मुझ अज्ञानी ने कभी एक क्षण के लिये भी अपने मन को आपके चरणों में अर्पण नहीं किया ॥१८॥ (१३) सरस्वतीलक्ष्मीपार्वतीनां वस्तुतः पराशक्तिस्वरूपाणामैक्यात् 'इन्दिरे हरिहृदेकमन्दिरे' इति पार्वत्याः सम्बोधनं सुसङ्गतम् ।
चतुर्थः सर्गः ३५ दुर्निवारतरदुष्टवासनासूत्रसंयमितचेतसा मया । एवमेव जननि ! प्रमाद्यता यापितानि जनुषां शतान्यपि ॥१९॥ बड़ी कठिनता से दूर की जाने योग्य, प्रबल और दुष्ट वासनाओं की रस्सी से मेरा मन बँध रहा है (जैसे 'पशु' 'पाश' से बँधा रहता है। शैव-दर्शन के अनुसार जीवात्मा 'पशु' है और संसार 'पाश' ।) जननि ! इसी प्रकार अविद्या, कर्म और माया के मलरूपी पाश से बँधे हुये मुझ पशु ने प्रमादवश सैकड़ों जन्म व्यर्थ खो दिये ॥१९॥ तेन तेन विहितेन कर्मणा तासु तासु विविधासु योनिषु । संसरन् शरणमत्र जन्मनि त्वां गतोस्मि कृपया तवेरितः ॥२०॥ नाना प्रकार की योनियों में नाना प्रकार के कर्म करने के कारण जन्म-मृत्यु के इस संसार- चक्र में भ्रमण करता हुआ मैं इस जन्म में आपकी कृपा से प्रेरित होकर आपकी शरण आया हूँ॥२०॥ भूरिजन्मजनितं महेश्वरि ! क्षन्तुमर्हसि ममागसां शतम् । कर्म किञ्चिदपि साध्वसाधु वा यत् करोमि न विना त्वदाज्ञया ॥२१॥ महेश्वरि ! अनेक जन्मों में कृत मेरे सैकड़ों पापों को आप कृपया क्षमा करें। बिना आपकी आज्ञा के कोई अच्छा या बुरा कर्म नहीं करूँगा ॥२१॥ एतदेव जनुषः फलं महत् यत्र वाऽम्ब ! करुणैकपात्रता । किं पुनस्त्रिदशवृन्ददुर्लभं दर्शनं भुवनवन्दिते ! तव ॥२२॥ जननि ! आपकी करुणा के योग्य बन जाना ही इस जन्म का बड़ा भारी फल है। फिर, हे भुवन-वन्दिते ! देवताओं के समूहों के लिये भी दुर्लभ आपके साक्षात् दर्शन की तो बात ही क्या ? ॥२२॥ चञ्चलाञ्चलविलासचञ्चला रत्नकाञ्चनमहीसमृद्धयः । कीर्तिरन्नमति येन शाश्वती वैभवं वितर देवि ! तन्मयि ॥२३॥ चञ्चल अञ्चल वाली तरुणियों के विलास के समान क्षणिक इन रत्न, सुवर्ण, पृथ्वी और साम्राज्य से उत्पन्न सुखों में क्या धरा है ! देवि ! मुझे आप ऐसा वैभवशाली वरदान दें जिस कारण मेरी कीर्ति शाश्वत होकर व्याप्त रहे ॥२३॥ उल्लसद्विशदभक्तिभावितां भारतीमिति निशम्य भूपतेः । बिभ्रती प्रगुणितां प्रसन्नतां तं जगाद जगदम्बिका पुनः ॥२४॥ उन्नत और निष्कपट भक्ति से भरे हुये राजा विश्वपति के इन वचनों को सुनकर जगज्जननी शाकंभरी देवी अत्यधिक प्रसन्न होकर बोलीं—॥२४॥ सन्ततं मम समाश्रयादयं भूपते ! जनपदः प्रतिष्ठितः । नामधेयमपि मामकं दधन्मूलतो लवणमाशु जायताम् ॥२५॥ राजन् ! यह देश (साँभर) मेरे निरन्तर आश्रय से पवित्र है और मेरे ही नाम से (शाकंभरी या साँभर नाम से) विख्यात है। (मेरी कृपा से) अब इसके मूल में शीघ्र नमक बन जायगा ॥२५॥ (२३) चञ्चलान्यञ्चलानि यासां तास्तरुण्यस्तासां विलासवच्चञ्चल्यः क्षणिकाः ।
३६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् धावनाय निजवाहमीरयन् यावतीं भुवमुपैषि तावती । भाविनी लवणसाद् विवर्त्तिता यावदक्षि न दधासि पृष्ठतः ॥२६॥ अपने घोड़े को दौड़ाते हुये और पीछे दृष्टि न डालते हुये आप जितनी भूमि तय कर लेंगे वह सारी भूमि लवणमय बन जायगी ॥२६॥ क्षोणिपैरधिबलैरनुक्षणं खन्यमानदृढमूलबन्धनः । देश एव विलयं व्रजेदतः काञ्चनस्य न खनिर्विनिर्मिता ॥२७॥ मैंने यहाँ सुवर्ण की खान इसलिये नहीं बनाई कि कहीं बलवान् राजाओं द्वारा लोभ के कारण निरन्तर खोदे जाने से दृढ़ मूलबन्धन भी शिथिल हो जाय और यह मेरा देश ही नष्ट हो जाय ॥२७॥ इत्युदीरितवती तिरोदधे तारकारमणमौलिगेहिनी । तन्निदेशमधिमौलि धारयन् दण्डवद् भुवि ननाम भूपतिः ॥२८॥ यह कह कर भगवान् चन्द्रचूड़ की अर्द्धांगिनी अन्तर्धान हो गईं और उनके आदेश को शिरो- धार्य कर राजा ने भूमि पर साष्टाङ्ग दण्डवत् प्रणाम किया ॥२८॥ सोऽधिरुह्य तरुणं तुरङ्गमं रंहसा हसितहेलिवाहनम् । ताडयन्नकरुणं कशाञ्चलैः प्राणुदच्छिथिलवल्गमग्रतः ॥२९॥ फिर एक जवान घोड़े पर चढ़ कर, जो अपने वेग से सूर्य के घोड़ों को मात कर रहा था, लगाम ढीली कर जोर से चाबुक लगाते हुये राजा विश्वपति ने उसे आगे दौड़ाया ॥२९॥ पूर्णमेत्य मतिमान् मनोरथं स प्रणम्य परमेश्वरीं पुनः । गीयमानविभवः पुरोगमैर्निवृतो निववृते निजां पुरीम् ॥३०॥ अपने मनोरथ को पूर्ण करके कार्य से निवृत्त हो तथा फिर भगवती शाकंभरी को प्रणाम करके, आगे चलने वाले लोगों द्वारा गाये जा रहे वैभव वाले बुद्धिमान् राजा विश्वपति शान्ति- पूर्वक अपनी नगरी की ओर चले ॥३०॥ सन्निवृत्तमधिगत्य पार्थिवं बान्धवाः प्रकृतयश्च सैनिकैः । प्रत्युदीयुरथ दूरतो द्रुतं वारिवाहमिव बर्हिणां गणाः ॥३१॥ राजा को वापस आया जान कर बन्धु-वर्ग, प्रजा-जन और सैनिक उनका स्वागत करने के लिये दूर तक चल पड़े, जिस प्रकार वेग से आते हुये मेघ का स्वागत करने के लिये मयूर-वृन्द नाच उठते हैं ॥३१॥ रेणुभिः पिहितहेलिमण्डलं प्रोल्लसद्द्विपनिपीतदिङ्मुखम् । धोरणध्वनितयन्त्रिताम्बरं स्वामिनाऽथ समगङ्स्त तद् बलम् ॥३२॥ इसके बाद राज-सेना (सैनिकों और वाहनों के पैरों से उड़ी) धूल से सूर्य-मंडल को ढाँकती हुई तथा मदोत्कट हाथियों के समूह से दिशाओं के मुखों को चूमती हुई और वाद्यों की ध्वनि से आकाश को गुंजाती हुई अपने स्वामी से मिली ॥३२॥ (२६) लवणसाद् विवर्त्तिता लवणरूपेण परिणता ।
चतुर्थः सर्गः ३७ प्रेक्ष्य पाण्डुशतपत्रसोदरं छत्रमस्य पुरतो रथोपरि । स्यन्दनद्विरदवाजिवाहना वाहनान्निज निजादवातरन् ॥३३॥ विश्वपति के रथ का श्वेत कमल के समान सुन्दर छत्र देख कर रथ, हाथी और घोड़ों पर चलने वाले लोग अपने अपने वाहनों से नीचे उतर पड़े ॥३३॥ यावदुद्यमभृतो भवन्ति ते पादचारगमनोपमन्त्रिणः । तावदेव नरदेवनोदितः स्यन्दनः स्यदवशादुपासदत् ॥३४॥ ज्यों ही वे लोग पैदल राजा के समीप जाने के लिये बढ़े त्यों ही विश्वपति द्वारा प्रेरित रथ वेग से पास आ गया ॥३४॥ स प्रणम्य गुरुवर्गमादरात् सौहृदेन परिरभ्य बान्धवान् । प्रीतिचारुभणितैः कृतानतीनत्यरञ्जयदथानुजीविनः ॥३५॥ विश्वपति ने गुरु-वर्ग को सादर प्रणाम किया, बन्धु-वर्ग को बड़े स्नेह से सीने से लगाया एवं झुक कर प्रणाम करने वाले भृत्य-वर्ग को प्रेम से मनोहर वचनों से प्रसन्न किया ॥३
Wait! Look at the end of line 35: "धैर्यसमृद्ध्यादी" or "धैर्यसमृद्ध्यादी"? Let's zoom in on the end of line 35: "स्वस्य धैर्यसमृद्ध्यादी" Line 36: "उत्कृष्टत्वात् । अधुना तु अपरं लवणाकरं निर्मितवता समुद्रस्य यत् जडत्वं मूर्खत्वं जलत्वं च तदेव अवशेषितम् ।"
Check dots before line 4: There are two dots: ".." or dirt/ink spots before "विश्वपति". It's just indentation or ink marks. Same before line 18: ".. विश्वपति".
Everything looks very clear and thoroughly checked.३८ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् सेवनाद् गिरिभुवो भुवः प्रभुं तं निशम्य सपदि प्रतिष्ठितम् । शत्रवोऽपि शरणार्थिनस्तदा भूयसीर्गिरिभुवः सिषेविरे ॥४०॥ विश्वपति को गिरिजा के मन्दिर की भूमि के सेवन के कारण प्रभुतायुक्त एवं प्रतिष्ठित जान कर शत्रु लोग भी, शरणार्थी बन कर, बड़ी बड़ी गिरि-भूमियों का सेवन करने लगे (अर्थात् विश्वपति के शत्रु कहीं शरण न पाकर पर्वतों की बड़ी बड़ी गुफाओं में छिप गये) ॥४०॥ [
धनुर्धरः ।-> wait,काण्डीरः धनुर्धरः । * Look atकाण्डीरः: yes, it has visarga! (४९) काण्डीरः धनुर्धरः ।`
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चतुर्थः सर्गः(center),३९(right)Main text: उपरतमवगत्य वज्रसूनुं यवनपतिर्जवेन वाजिनाऽथ । सहचरितचमूचरस्तरस्वी समरसमुत्कमनास्ततार सिन्धुम् ॥४७॥ वज्रपुत्र विश्वपति को कैलासवासी जान कर यवनपति वेगशील अश्व पर आरूढ़ हो, अपने साथ एक बड़ी सेना लेकर, वेग से सिन्धु के पार, युद्ध की इच्छा से, आया ॥४७॥ अभिपतितुमुदग्रानुद्धतान् पारसीकान् करिण इव मदान्धान् दूतवक्त्राद् विदित्वा । हरिरिव हरिराजस्तान् नियन्तुं नियन्ता सममुचितबलेन द्राक् प्रतीचों प्रतस्थे ॥४८॥ [L
४० सुर्जनचरितमहाकाव्यम् हूणाः स्थूणा इवासन् तनयधनसुहृच्छोकसंदानदूनाः मद्राः स्वीकृत्य भद्राकरणमपि निजं त्यक्तभद्रासनास्थाः । चीना मन्दाक्षहीनाः सपदि रणमुखे दुद्रुवुर्दीनदीना म्लेच्छाः स्वेच्छाविहारं प्रणिजहुरितरे प्राप्य मूर्च्छाविरामम् ॥५२॥ पुत्र, धन और मित्र के शोक के सन्ताप से दुखी हूण स्तम्भ के समान स्तंभित हो गये । मद्र देश के लोगों ने अपने राजसिंहासनों की आस्था छोड़कर (यतियों के समान) शिरोमुण्डन स्वी- कार कर (वन की ओर प्रस्थान किया) । चीन देश के लोग अपनी छोटी-छोटी आँखों से भी हीन हो अत्यन्त दीन बन कर शीघ्र रण से भाग गये । अन्य म्लेच्छ मूर्च्छित होकर स्वेच्छा विहार से हीन हो गये ॥५२॥ जित्वैवं यवनाञ् जवेन विजयश्रीचिह्नमुर्वीपति- दुर्गं योधपुरं च मण्डपपुरस्याभ्यर्णतो निर्ममे । यस्याद्यापि विलोकनात् स्मृतपुरावृत्तास्तु तुच्छा जनाः कम्पार्ताः पतितं विदन्ति न शिरस्त्राणं पुरस्त्रासतः ॥५३॥ राजा हरिराज ने इस प्रकार उन यवनों को वेग से जीत कर अपनी विजय-लक्ष्मी का स्मारक योधपुर (जोधपुर) नामक दुर्ग मण्डपपुर के समीप बनवाया । आज भी जिस दुर्ग को देखकर प्राचीन वृत्त का स्मरण कर भय से कम्पित होने वाले तुच्छ पुरुषों को अपनी नीचे गिर जाने वाली पग- ड़ियों तक का बोध नहीं होता ॥५३॥ इति सुर्जनचरितमहाकाव्ये चतुर्थः सर्गः (५२) भद्राकरणं सर्वमण्डनम् । त्यक्ता सिंहासनेषु आस्था यैस्ते ।
६ पञ्चमः सर्गः सुरद्विषः क्रव्यभुजो द्विषस्तान् निहत्य वीर्याधिकदुर्दुरूहान् । जयश्रियं राम इवात्मकान्तामसौ समुद्धृत्य पुरीं प्रतस्थे ॥ १ ॥ हरिराज उन देव-द्वेषी, मांसभक्षी, अपने पराक्रम के कारण अत्यन्त अभिमानी, यवन शत्रुओं को मार कर एवं विजय की लक्ष्मी को अपने साथ लेकर, राक्षसों को मार कर अपनी प्रिया सीता को साथ ले अयोध्या जाने वाले राम के समान, अपनी नगरी की ओर चले ॥ १ ॥ अजायतास्मादथ सिंहराजः सिंहोर्जितो यस्य मृधे द्विषन्तः । विनेशुराशु स्फुटसिंहनादैर्नृसिंहनादैरिव दानवेन्द्राः ॥ २ ॥ इन हरिराज के सिंह के समान बलवान् सिंहराज नामक पुत्र उत्पन्न हुये जिनके भीषण सिंहनादों से युद्ध में भयभीत होकर शत्रु-गण, नृसिंह के नादों से भयभीत राक्षसों के समान, शीघ्र नष्ट हो गये ॥ २ ॥ यः पक्षवेगाद् विघटय्य दूराद् दुरन्तमग्रे परवाहिनीशम् । सुधां गरुत्मानिव यत्नगुप्तामनन्यलभ्यां श्रियमाजहार ॥ ३ ॥ जिन्होंने अपनी सेना के बल से प्रबल शत्रु सेनापति को दूर से ही भगा कर, अपने पंखों के वेग से शत्रुओं के प्रबल सेनापति को दूर से ही भगा कर बड़े यत्न से रक्षित अनन्यलभ्य अमत को हरने वाले गरुड़ के समान, यत्नपूर्वक रक्षित तथा अन्य पुरुषों द्वारा अप्राप्य राज्यश्री का हरण किया (गरुड़ अपनी माता विनता को विमाता कद्रू के दासत्व से छुड़ाने के लिये स्वर्ग से अमृत हर लाये थे) ॥ ३ ॥ स्वबन्धुभिर्वन्ध्ययशोऽभिमानैः स्वप्राणरक्षानिपुणैर्निरस्ताः । बन्दीकृता विद्विषतां कुमारीः सोऽन्वग्रहीद् दास्यपदे निधाय ॥ ४ ॥ जो अपनी ही प्राण-रक्षा करने में चतुर थे और जिनके यश का अभिमान व्यर्थ सिद्ध हो चुका था ऐसे अपने बन्धुओं द्वारा असहाय छोड़ दी गईं शत्रुओं की कुमारियों को सिंहराज ने बन्दी बना कर अपनी दासियों के रूप में ग्रहण किया ॥ ४ ॥ नियोजिताः काश्चन वीजनाय भयादिदमपूर्व्वतया विमूढाः । स्खलन्ति शश्वद् वलयानि बालाः प्रकोष्ठमूलेषु निवेशयन्त्यः ॥ ५ ॥ क्षणं दृगम्बुस्तिमितोत्तरीयव्यक्तस्तनोपान्तधृतैकहस्ताः । करस्थबालव्यजनानि दीर्घैरवीजयन् निःश्वसितैरशीतैः ॥ ६ ॥ उनमें से कुछ कुमारियाँ, जो पंखा झलने के कार्य में नियुक्त की गईं थीं, भय से कर्तव्य-विमूढ़ होकर अपनी नीचे खिसकने वाली चूड़ियों को (दुःख से दुर्बल) हाथों के ऊपरी भाग में बार बार (३) गरुडः स्वमातरं विनतां विमातुः कद्रूवाः दास्यान् मोचयितुं देवान् पराजित्य स्वर्गात् सुधामाजहारेति कथाऽत्राऽनुसन्धेया ।
४२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् सरकाते रहने के कारण, सदा अपने कर्तव्य में त्रुटियाँ करती थीं । वे अपने आँसुओं से गीली साड़ी के वक्षःस्थल से चिपक जाने के कारण प्रकटित आकार वाले स्तनों पर क्षण भर लज्जावश एक हाथ धर कर (राजा को पंखा न झल कर) दूसरे हाथ में स्थित पंखे को ही अपनी लंबी और गरम साँसों से पंखा झलने लगीं ॥५-६॥ नितान्तमादर्शमपि प्रसन्नं निश्वासधाराभिरथान्धयन्ती । क्लान्ता चिरं काचन मार्जनेन श्यामं दधौ पाणिमिवाननाब्जम् ॥ ७ ॥ खूब चमकते हुये शीशे को भी अपनी गरम साँस से अन्धा (धुंधला) बनाने वाली और कार्य भार से थकी हुई किसी कुमारी का मुख-कमल भी, माँजने के कारण काले पड़े हुये हाथ के समान, दुःख से काला पड़ गया ॥ ७ ॥ आदाय ताम्बूलकरण्डमन्या कलङ्कमेवात्मकुलस्य कन्या । नालं विमोक्तुं न च वोढुमग्रे व्यग्रा न चक्रे कतमां व्यवस्थाम् ॥ ८ ॥
पञ्चमः सर्गः ४३ अनङ्गसर्वस्वमथाङ्गमङ्गं तारुण्यसारं तरलायताक्षी । सा बिभ्रती विभ्रमकौशलेन विशां पतिं तं वशमानिनाय ॥१३॥ चञ्चल और विशाल नेत्रों वाली मनोरमाने, जिनका प्रत्येक अंग मानों यौवन का सार और कामदेव का सर्वस्व था, अपने हाव-भाव के कौशल द्वारा सिंहराज को वश में कर लिया ॥ १३ ॥ तयोस्तथान्योन्यमनोऽनुवृत्तौ सदानुकूलव्यवसायभाजोः । निशीथिनीभिः कियतीभिरेव जगाम काष्ठां प्रणयानुबन्धः ॥१४॥ सदा एक दूसरे की इच्छा के अनुकूल व्यवहार करने वाले उन दम्पत्ति का प्रेम कुछ रात्रियों में ही पराकाष्ठा पर पहुँच गया ॥१४॥ तस्याः प्ररूढेन स सौहृदेन सन्दानितान्तःकरणः सदैव । अमन्यत स्वं खलु सापराधं छायावलोकेऽप्यपराङ्गनायाः ॥१५॥ मनोरमा ने अपने सुदृढ़ प्रेम-पाश से सिंहराज के मन को इतना बन्दी बना लिया कि वे किसी दूसरी स्त्री की छाया तक देखने में स्वंयं को अपराधी समझने लगे थे ॥१५॥ समृद्धराज्यो बहुभार्यतायां राजोचितायामपि सिंहराजः । वितीर्यमाणा अपि वीतदोषा नाङ्गीकरोति स्म नरेन्द्रकन्याः ॥१६॥ समृद्ध साम्राज्य के अधिपति सिंहराज ने, अनेक रानियाँ रखना राजाओं की प्रथा के अनुकूल होत हुये भी, अन्य राजाओं द्वारा आग्रहपूर्वक दी जाने वाली दोषरहित राजकुमारियों को भी स्वीकार नहीं किया ॥१६॥ प्रतीक्षमाणः सुतमात्मतुल्यं मनोरमायां मनुजाधिनाथः । पराङ्मुखः सोऽन्यपरिग्रहेषु समाहितात्मा समयं निनाय ॥१७॥ अन्य राजकन्याओं के पाणिग्रहण में विरक्त जितेन्द्रिय सिंहराज मनोरमा के गर्भ में (रूप, गुण, शील आदि में) अपने तुल्य पुत्र के आने की प्रतीक्षा करते हुये समय व्यतीत करने लगे ॥१७॥ उपासितारौ सततं सुतार्थे तत्रोपयुक्तान्यथ दैवतानि । तौ दम्पती संप्रयतौ प्रयत्नात् पृथग्विधान्याददतुर्व्रतानि ॥१८॥ पुत्र की कामना के लिये विविध देवताओं की पूजा करने वाले उन सावधान और वशी दम्पती ने बड़े प्रयत्न से भिन्न भिन्न व्रत स्वीकार किये ॥१८॥ ऋत्विग्भिरभ्यस्तसमस्ततन्त्रैः सदागमाऽऽसादितसिद्धमन्त्रैः । अप्रीणयत् पुत्रदपुण्यलिप्सुः सप्तार्चिषं सोऽर्पितसम्यगृद्धिः ॥१९॥ सम्पूर्ण तन्त्रों का अभ्यास करने वाले एवं श्रेष्ठ आगमों के सिद्धि दायक मंत्रों को सिद्ध करने वाले श्रोत्रिय ब्राह्मणों द्वारा सम्पादित पुत्रेष्टि यज्ञ में पुत्र देनेवाले पुण्य को प्राप्त करने की इच्छा वाले तथा ब्राह्मणों को समृद्धि दने वाले राजा सिंहराज ने यज्ञ की अग्नि को उत्कृष्ट हव्य पदार्थों द्वारा प्रसन्न किया ॥१९॥ (१५) सन्दानितं निगडितं अन्तःकरणं यस्य सः ।
४४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् भूरीणि भूयिष्ठफलानि दानान्यदाद् वदान्यप्रवरः सदापि । उपस्थितायामथ कामनायामन्यैव धन्याऽजनि दानधारा ॥२०॥ दानी-शिरोमणि सिंहराज सदा ही उत्कृष्ट फल वाले विपुल दान दिया करते थे। अब पुत्र की कामना के कारण तो उनकी एक विलक्षण तथा स्तुत्य दान-परंपरा प्रारंभ हुई ॥२०॥ स भारतादिश्रवणे द्विजेन्द्रान् सभारतान् सन्ततमाश्रितोऽपि । सन्तानकादप्यधिकं दुरापं सन्तानकामो मनुते स्म कामम् ॥२१॥ सदा महाभारत आदि पुण्य ग्रन्थों के श्रवण के समय सभारत ब्राह्मण-श्रेष्ठों का आश्रय लेने पर भी, पुत्र की कामना वाले सिंहराज ने अपनी इच्छा को कल्पवृक्ष से भी अधिक दुष्प्राप्य माना ॥२१॥ बोधिद्रुमं बुद्धिमती कथञ्चित् परोत्य पारिप्लवलोचना सा । रूक्षत्वचं वक्षसि योजयन्ती कदर्थनं स्वार्थवशाद् विषेहे ॥२२॥ बुद्धिमती मनोरमा ने, डबडबाई आँखों से पीपल के पेड़ की परिक्रमा करके, पुत्र की कामना के कारण किसी प्रकार उसकी रूखी छाल को वक्षःस्थल पर धारण करने का कष्ट सहा ॥२२॥ वैद्यैः सुविद्यैर्यशसानवद्यैः सिद्धौ प्रसिद्धैरपि शुद्धवृत्तैः । प्रसाधितां सन्ततिमौषधानां सा सन्ततं सन्ततये सिषेवे ॥२३॥ शुद्ध आचरण वाले, अनवद्य यश वाले, सिद्धि में प्रसिद्ध, विद्वान् वैद्यों द्वारा तैयार की गईं नाना प्रकार की ओषधियों का मनोरमा ने सन्तानार्थ निरन्तर सेवन किया ॥२३॥ एवंविधैस्तैर्विविधैरुपायैः प्रयासभाजोप्यवनीभुजोऽस्य । मनोरथे नाऽभवदङ्कुरोऽपि चिरन्तने बीज इवोषरोप्ते ॥२४॥ उपर्युक्त प्रकार के और इनसे भी विविध प्रकार के उपायों द्वारा पुत्रप्राप्ति की इच्छा को पूर्ण करने का प्रयास करने वाले सिंहराज के मनोरथ में, ऊसर भूमि में बोये गये पुराने बीज के समान, ज़रा भी अंकुर नहीं उगा ॥२४॥ सोऽचिन्तयत् सञ्चितपुण्यकर्मा मर्माविधं वीक्ष्य विधेर्विधित्साम् । मनीषिते स्वे नितरान्निराशः प्रियाकरिष्यन् निजपूर्वजानाम् ॥२५॥ संचित पुण्य वाले और पूर्वजों को प्रसन्न करने की इच्छा रखने वाले सिंहराज ने विधि के विधान को मर्मस्पर्शी और विपरीत जानकर अपनी इच्छा की पूर्ति में बिलकुल निराश होकर इस प्रकार विचार किया—॥२५॥ श्रद्धानुबद्धान्यपि वैदिकानि केनापि नाङ्गेन वियोजितानि । कर्माणि हन्त स्वफले पराञ्चि को वेद भावं भवितव्यतायाः ॥२६॥ अत्यन्त श्रद्धा के साथ सांगोपाङ्गतया विधिपूर्वक किये गये वैदिक यज्ञादिक कर्म भी जब अपना फल देने में विमुख हो रहे हैं तो भवितव्यता को कौन जान सकता है ? ॥ २६॥ (२१) सन्तानकात् कल्पद्रुमात् । (२५) प्रियाकरिष्यन् प्रियं विधित्सुरित्यर्थः ।
पञ्चमः सर्गः ४५ वेदानुशिष्टे पथि शिष्टजुष्टे नास्त्येव सन्देहलावावतारः । फलानुमेयस्य महान् ममायमधर्मराशेरशिवो विवर्तः ॥२७॥ शिष्ट पुरुषों द्वारा आश्रित वेद-प्रतिपादित मार्ग में अणुमात्र भी सन्देह नहीं हो सकता । जो कुछ हो रहा है उससे यही अनुमान होता है कि यह सब मेरे संचित पापों के महान् समूह का अमंगलकारी परिणाम है ॥२७॥ नूनं ममान्ते रिपवो दुरन्ता निःशङ्कमस्वामिकमस्मदीयम् । राष्ट्रं ग्रहीष्यन्ति गिरिप्रदेशं विपन्नपारीन्द्रमिव द्विपेन्द्राः ॥२८॥ हमारे बाद निश्चय ही हमारे उग्र शत्रु निःशंक होकर हमारे स्वामी-हीन इस गिरिप्रदेश राज्य को छीन लेंगे, जिस प्रकार सिंह के मर जाने पर गिरिप्रदेश पर हाथी ही राज्य करने लगते हैं ॥२८॥ वृन्दावतीयं कुलराजधानी पाणौ परेषां पतितैव तावत् । अतो निवृत्ता भुवि चाहुवाणवंशस्य वार्तापि यशोविलोपात् ॥२९॥ यह हमारी कुल राजधानी वृन्दावती (बूंदी) निश्चय ही शत्रुओं के हाथ में पड़ जायगी । यश के लुप्त हो जाने से संसार में अब चौहान वंश की वार्ता भी समाप्त हो जायगी ॥२९॥ स्नेहेन पुत्रप्रतिमं ममापि यवीयसः पुत्रमतो युवानम् । राज्येऽभिषेक्ष्यामि समक्षमेव भीमं रिपूणामिह भीमदेवम् ॥३०॥ अतः मैं अब अपने छोटे भाई के पुत्र, शत्रुओं के लिये भयंकर भीमदेव का, जिस पर मेरा भी पुत्रवत्प्रेम है, अपने सामने ही राज्याभिषेक कर देता हूँ ॥३०॥ निश्चित्य चित्तेन विधेयमेवं बुधोपमः प्रेमवशात् प्रियां ताम् । आभाष्य विद्याविशदान् तथान्यानामन्त्र्य मन्त्रिप्रवरांश्च राजा ॥३१॥ दिदेश भीमस्य महाभिषेकसम्भारमाहर्तुमथ स्वभृत्यान् । तेऽप्येतदाज्ञानुपदं तदैव सम्पादयामासुरदीर्घसूत्राः ॥३२॥ इस प्रकार मन में निश्चय कर देवताओं के समान (प्रतापी) सिंहराज ने, अपनी महिषी मनोरमा की प्रेमवश अनुमति प्राप्त कर और अन्य विद्वान् मुख्य मंत्रियों से परामर्श कर, अनुचरों को भीम के राज्याभिषेक की तैयारी करने की आज्ञा दी । कार्य को अविलम्ब पूर्ण करने में कुशल अनुचरों ने भी शीघ्र ही इस आज्ञा का पालन किया ॥३१-३२॥ ततः समाहूय समाहितात्मा हिताय वंशस्य पुरोहितांश्च । समर्पयामास समः स पित्रा भीमाय धीमान् निजमाधिपत्यम् ॥३३॥ तत्पश्चात् जितेन्द्रिय, बुद्धिमान् और भीम के पिता के समान सिंहराज ने वंश के राजपुरो- हित को बुला कर अपना राज्य, वंश के हित के लिये, भीमदेव को सौंप दिया ॥३३॥ तत्रातिभूमिङ्गतमस्य दृष्ट्वा निर्वेदमुद्वेगविदीर्णचेताः । बाष्पाम्बुपूरं, गुरुवत्सलत्वान् नापारयद् वारयितुं कुमारः ॥३४॥ उस समय सिंहराज के वैराग्य को चरम सीमा पर देख कर कुमार का हृदय शोक-सन्तप्त हो गया । भारी वात्सल्य के कारण सिंहराज की अश्रुधारा को रोकने में कुमार भीम भी समर्थ न हो सके ॥३४॥
४६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् तस्याभिषेकप्रभवप्रवाहैरुवाह शैत्यं सुतरां धरित्री । विवेश तस्माद्दवथुः प्रथोयानन्तः परानीकपृथुस्तनीनाम् ॥३५॥ भीम के राज्याभिषेक के जल के प्रवाह से पृथिवी को शीतलता का अनुभव हुआ; किन्तु उसी से शत्रुओं की विशाल स्तनों वाली कामिनियों के हृदय में विपुल सन्ताप होने लगा॥३५॥ निवेशितैकाङ्गुलिरेकमस्य गुरुर्ललाटे तिलकञ्चकार । स्वबान्धवैरुञ्जलिभिः परेषां व्यतीतसंस्थास्तिलका विकीर्णाः ॥३६॥ इधर पितातुल्य सिंहराज ने अपनी एक उँगली से भीम के ललाट में राज्यतिलक किया और उधर शत्रुओं के लिये उनके बन्धु-बान्धवों ने पूरी अञ्जलि द्वारा असंख्य तिलक (तिल) बिखेर दिये (मृतात्मा को सम्बन्धी लोग तिलाञ्जलि देते हैं) ॥३६॥ तमभ्यषिञ्चत् सकृदेव राज्ये गुरुः पयोभिः किल पुष्करोत्थैः । सदाभ्यषिञ्चन् निजगर्भरूपं रिपुस्त्रियोलोचनपुष्करोत्थैः ॥३७॥ पितातुल्य सिंहराज ने भीम का पुष्करतीर्थ के पुनीत जल से एक ही बार अभिषेक किया, किन्तु शत्रुओं की स्त्रियों ने अपने बालकों का, नेत्र रूपी पुष्कर (कमल) से निकले जल से (आँसु- ओं से) सदा अभिषेक किया ॥३७॥ महाभिषेकेण महीयमानं नवोच्छ्रितं सोममिवाम्बुराशेः । मुदा प्रवाष्पः प्रवया युवानमालिङ्गय राजानमिदञ्जगाद ॥३८॥ राज्याभिषेक के कारण बढ़ी हुई महिमा वाले एवं समुद्र से सद्य-स्नात नवोदित उत्तरोत्तर उत्कृष्ट होने वाले द्वितीया के चन्द्र के समान शोभित युवा भीम को प्रौढ़ तथा आनन्दाश्रुयुत सिंहराज ने आलिंगन कर यह शिक्षा दी ॥३८॥ निशम्य मामप्रजमुज्झितास्त्रं कुतर्कचक्राहितवक्रचित्ताः । उद्भावयन्तः किमपि प्रतीपा विप्लावयिष्यन्ति बलेन देशान् ॥३९॥ मुझे निःसन्तान और अस्त्रशस्त्र को त्याग कर वानप्रस्थ आश्रम को अपनाने वाला सुनकर, कुतर्क जाल के कारण अहित और कुटिल मन वाले शत्रु कोई न कोई बहाना खड़ा करके देश में विप्लव मच