सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् प्रद्योतयन्ती परितः प्रदीपान् स्वभूषणेषु प्रतिबिम्बिताङ्गान् । मनोभुवो मूर्तिमतातपेनालिङ्गितेव प्रतिभाति तन्वी ॥४३॥ कोईं सुमध्या तरुणी चारों ओर दीपक जला रही है। उसके आभूषणों में दीपकों का प्रति- बिम्ब पड़ने से ऐसा प्रतीत होता है मानों कामदेव के मूर्तिमान् प्रताप ने उसका आलिङ्गन कर रखा हो ॥४३॥ इयं भवानीभवनं पुनः किं चित्रेण सम्भावयति स्म सुभ्रूः । अलभ्यवस्तुप्रतिपादनेन चित्रं प्रकृत्यैव समस्तमस्य ॥४४॥ कोई सुन्दर भौंहों वाली तरुणी देवी के मन्दिर में चित्र बना रही है। यह मन्दिर तो (अपने भक्तों को) अलभ्य वस्तु प्रदान करने के कारण स्वभाव से ही 'चित्र' अर्थात् विचित्र महिमा वाला है। फिर इसको दोबारा 'चित्र' से सुसज्जित करने का प्रयास क्यों ? ॥४४॥ असौ स्वभक्तिप्रतिपादनाय भक्तिं शिवासद्मभुवस्तनोतु । तथापि कामं कमलाननानां