सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५ चतुर्थः सर्गः ३३ त्वत्कलाभिरणिमादिभिः परं सिद्धिभिः परशिवः समेधितः । ईशितेति गिरिपुत्रि ! गीयते निष्कलोऽपि निखिलार्थदर्शिभिः ॥ ७ ॥ निर्गुण, निष्कल, पर शिव आपकी कलाओं, गुणों और अणिमा-महिमादिक सिद्धियों के कारण सगुण और सकल प्रतीत होकर 'ईशिता' (प्रभु, स्वामी, जगत् के निर्माता, पालक और संहर्ता) कहलाते हैं—ऐसा आगमों के अर्थ को जानने वाले विद्वानों का मत है ॥ ७ ॥ पद्मभूवदनपद्मपावनौ वाङ्मयीं प्रकृतिमाश्रयामि ते । या प्रसूय निगमाञ्जगत्प्रसूः सप्रकाशमकरोज्जगत्त्रयम् ॥ ८ ॥ मैं आपकी वाङ्मयी प्रकृति की शरण लेता हूँ जो समस्त जगत् की जननी है, जो ब्रह्मा जी के मुख-कमल द्वारा पवित्रित है और जिसने वेदों को प्रकट करके तीनों लोकों को सप्रकाश बना दिया है ॥ ८ ॥ निर्गुणस्य न शरीरसंस्थितिः सर्व एव हि गुणास्तदाश्रयाः । ब्रह्मविष्णुगिरिशाः शरीरिणो युक्तमेव वशगास्तवाम्बिके ॥ ९ ॥ निर्गुण, निष्कल, पर शिव की तो शरीर-स्थिति भी संभव नहीं (अर्थात् गुणातीत एवं प्रपञ्चा- तीत होने के कारण वे अशरीरी और अनिर्वचनीय हैं) । हमारी बुद्धि तो केवल गुणों को जान सकती है (निर्गुण को नहीं) और सम्पूर्ण गुणों का आधार आप ही हैं । जगन्मातः ! सृष्टि के निर्माता ब्रह्मा, पालक विष्णु और संहर्ता शिव ये तीनों आप ही के रूप हैं क्योंकि तीनों सगुण और शरीरधारी हैं और आपके वश में हैं ॥ ९ ॥ अप्यनावरणमीश्वरं शिवे ! सर्वतस्तिरयसि प्रभावतः । अप्यलीकमखिलं यथार्थवद् या तनोषि विभुता तवाद्भुता ॥१०॥ हे मंगलमयि ! आपका वैभव अद्भुत है क्योंकि वह अपने प्रभाव से स्वप्रकाश स्वतःसिद्ध पर शिव को भी, जो वस्तुतः कभी आवृत नहीं हो सकते, आवृत करता-सा प्रतीत होता है और इस सम्पूर्ण प्रपञ्च को, जो वस्तुतः मिथ्या है, सत्य-सा प्रतीत कराता है । (सत्य का आवरण करने वाली और मिथ्या की विक्षेप द्वारा प्रतीति कराने वाली आपकी सदसदनिर्वचनीय मा- का वैभव विलक्षण है) ॥१०॥ पञ्चवक्त्रचतुराननौ कथं वैभवं तव विवेक्तुमुद्यतौ । अर्थतस्तव पुरं च शंसितुं यत् सहस्रवदनोऽपि न क्षमः ॥११॥ चतुरानन ब्रह्मा और पञ्चानन शिव आपके वैभव को कैसे जान सकते हैं? जब सहस्रानन शेष भी वस्तुतः आपके विग्रह की महिमा को जान लेने में असमर्थ हैं ॥११॥ ज्ञानशक्तिरसि मुक्तिसाधनं भुक्तिरप्यचलपुत्रि ! मुक्तिदा । बन्धहेतुरसि बन्धुरूपिणी बन्धमोचनकरी च जन्मिनाम् ॥१२॥ हे पार्वति ! आप ज्ञानशक्ति हैं जो मोक्ष प्राप्ति का साधन है । आप ही 'भुक्ति' (भोग मय संसार) हैं और आप ही 'मुक्ति' (मोक्ष रूप कैवल्य) हैं । आप ही 'भुक्ति' (सांसारिक भोग) (११) पुरं अतिशयमहिमान्वितं विग्रहम् ।