भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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पृष्ठ 58

चतुर्थः सर्गः स क्षणात् प्रकृतिमेत्य पार्थिवः प्रार्थिताधिकफलोपधायिनीम् । स्तोतुमद्रितनयामुपाददे भारतीमिति सुभक्तिभावितः ॥ १ ॥ क्षण भर में ही विश्वपति ने प्रकृतिस्थ हो, प्रार्थना से भी अधिक फल देने वाली भगवती की पूर्ण भक्ति-भाव से यों स्तुति करना प्रारंभ किया ॥ १ ॥ गौरि! शौरिगिरिशाम्बुजासनास्त्वद्गुणोक्तिषु निबद्धवासनाः । आननानि दधतो बहून्यपि स्पन्दयन्ति रसना न साध्वसात् ॥ २ ॥ हे गौरि ! ब्रह्मा, विष्णु और शंकर आपके अपरिमित और अनिर्वचनीय गुणों को वर्णन करने की इच्छा रखते हुये भी और अनेक मुखों को (चतुरानन, पञ्चानन आदि) धारण करते हुये भी, भय से अपनी जिह्वा नहीं खोल पाते हैं ॥ २ ॥ वैभवं तव भवानि ! वेदितुं कोऽहमत्र गुरुमोहविह्वलः । नावधारयितुमुत्सहेत यत् सावधानमपि वैधसं मनः ॥ ३ ॥ हे भवानि ! भारी मोह से घिरा हुआ मैं आपका वैभव कैसे जान सकता हूँ ? ब्रह्मा जी का सावधान मन भी उसे जानने में समर्थ नहीं है ॥ ३ ॥ रूपमौपनिषदः सदातनं चिन्मयं तव वदन्ति केचन । चेतनेति चितिरित्यथाऽपरे शब्दभेदचतुराः पुराविदः ॥ ४ ॥ कोई उपनिषद्-ज्ञानी आपके रूप को कूटस्थ नित्य शुद्ध 'सत्' और शुद्ध 'चित्' बतलाते हैं और कोई शब्द-चतुर प्राचीन विद्वान् उसे 'चेतना' या 'चिति' कहते हैं ॥ ४ ॥ यद्बहिस्थमखिलप्रपञ्चतस्तद्विदामनुभवैकवेदनम् । स्वप्रकाशमवकाशि सर्वतः पार्वति ! त्वमसि तत्ववस्तु तत् ॥ ५ ॥ हे पार्वति ! आप वह अनादि और अनन्त तत्त्व वस्तु हैं जो तत्त्व समस्त-प्रपञ्चातीत है, स्वप्रकाश है, स्वतःसिद्ध है, सर्वव्यापी है और जिसका साक्षात्कार अपरोक्ष स्वानुभूति द्वारा ही हो सकता है ॥ ५ ॥ त्वां विना जननि ! चेतनामयीं नैव चेतितुमपि क्षमः पुमान् । किं पुनस्त्रिभुवनस्य निर्मितौ पालने प्रलयकल्पनेऽथवा ॥ ६ ॥ जगदम्ब ! आप परा चित्-शक्ति हैं। आपके बिना 'शिव' स्पन्दन भी नहीं कर सकते, जगत् के निर्माण, पालन और संहार की तो बात ही क्या । (जगत् के निर्माता ब्रह्मा, पालक विष्णु और संहर्ता शिव पराशक्ति के ही अंश हैं। परशिव और पराशक्ति में कोई अन्तर नहीं । गुणातीत और प्रपञ्चातीत परशिव शक्ति के कारण सगुण प्रतीत होते हैं। बिना शक्ति के शिव स्पन्दन भी नहीं कर सकते। बिना शक्ति के 'शिव' 'शव' के समान हैं) ॥ ६ ॥