भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

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तृतीयः सर्गः ३१ अभ्यासयोगेन निरन्तरेण निरन्तरायेण हितस्य राज्ञः । विनैव निर्बन्धमवन्ध्यसेवा शाकम्भरी प्रादुरभूदजस्रम् ॥६३॥ विघ्नरहित और निरन्तर योगाभ्यास के कारण राजा से प्रसन्न होकर उनके हित के लिये भगवती शाकंभरी देवी, जिनकी सेवा कभी भी व्यर्थ नहीं जाती, बिना आग्रह के, साक्षात् प्रकट हुईं ॥६३॥ तद्ध्यानधाराविनिमग्नचेता विस्मृत्य सर्वान् विषयान् वशीन्द्रः । दशासु सर्वासु समस्तदिक्षु ददर्श तां दैवतवृन्दवन्द्याम् ॥६४॥ भगवती के ध्यान की धारा में मग्न चित्त वाले राजा ने सब प्रकार के विषयों को भूल कर एवं सब अवस्थाओं में अपने मन को वश में रख कर (भक्ति के प्रताप से) सब दिशाओं में देवताओं के वृन्दों से वन्द्य भगवती के दर्शन किये ॥६४॥ स्वप्नेषु स प्रेष्ठतमां पुरारेः पश्यन् विशेषात्नतु विस्मितोऽभूत् । ददर्श यज्जागरणेऽपि योगी जगन्ति पूर्णानि तयैव तावत् ॥६५॥ राजा स्वप्नों में भगवती के दर्शन करके अधिक विस्मित नहीं होते थे, किन्तु जब उन्होंने जाग्रत् अवस्था में सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त भगवती के (विराट् रूप के) दर्शन किये (तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ) ॥६५॥ अन्तःस्फुरन्त्याः परदेवताया महीयमानो महसा महीशः । ॰सुदुःसहोऽभूत् तपसा कृशोऽपि यथार्ककान्तः किरणेन भानोः ॥६६॥ अन्तःकरण में सदा स्फुरित रहने वाली भगवती परा शक्ति के तेज से महनीय राजा, तप के कारण दुर्बल होने पर भी, रवि की किरण के सामने सूर्यकान्त मणि के समान, सुदुःसह प्रतीत हुये ॥६६॥ इत्थं जपै रभिवषैर्यजनैस्तपोभिर्ध्यानेन होमविधिना द्विजतर्पणे श्च । अन्यैश्च भक्तिरचितैरुचितोपचारैराविश्चकार जननी नृपतौ प्रसादम् ॥६७॥ इस प्रकार जप, अभिषेक, यज्ञ, तप, ध्यान, होम, द्विज-तर्पण एवं अन्य भक्तिपूर्वक किये गये उपचारों से प्रसन्न होकर जगदम्बा ने विश्वपति पर अपना प्रसाद प्रकट किया ॥६७॥ वरय वरमभीप्सितं ददामि द्रुतमिह विश्वपते न तेऽस्तु भीतिः । निरुपधिवरिवस्ययाऽनया ते मम समजायत सम्प्रति प्रसादः ॥६८॥ विश्वपति ! इच्छित वर माँगो, मैं शीघ्र उसे दूँगी, तुम्हें कोई भय नहीं होगा, तुम्हारी इस निष्कपट सेवा से प्रसन्न होकर में अब अपना प्रसाद प्रकट कर रही हूँ ॥६८॥ आलोक्य तां तरुणभास्करकोटिजैत्रज्योतिर्विशेषविभवादविभाव्यमूर्तिम् । न प्रत्यपद्यत किमप्यवशान्तरात्मा स्विद्यत्सवेपथुतनूर्मनुजाधिनाथः ॥६९॥ करोड़ों प्रचण्ड सूर्यों की प्रभा को जीतने वाली ज्योति के कारण आँखों को चौंधिया देने वाली देवी के दर्शन कर विश्वपति विमूढ हो गये, उनके शरीर में स्वेद और कम्प होने लगा और उन्हें कुछ भी न सूझा ॥६९॥ इति सुर्जनचरितमहाकाव्ये तृतीयः सर्गः Dr. Urmila Sharma Collection, Varanasi