भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

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३० सुर्जनचरितमहाकाव्यम् मुदं विधानात् किल देवतानां विशुद्धपक्षाश्रयणात् स राजा । वृत्तं दधानः परिपूर्णमेव बभौ मृगेणेव मृगाजिनेन ॥५६॥ यज्ञादि कर्मों से देवताओं को प्रसन्न रखने वाले, शुद्ध पक्ष का आश्रय लेने वाले, पूर्ण विशुद्ध चरित्र वाले वे राजा विश्वपति मृगचर्म पर, देवों के प्रिय एवं पूर्ण विम्ब धारण करने वाले शुक्ल- पक्ष के मृगांक चन्द्रमा के समान सुशोभित हुये (शुक्लपक्ष में पूर्ण बिम्ब से शोभित होने वाला मृगलाञ्छन चन्द्रमा देवताओं को अमृत पिला कर तृप्त करता है) ॥५६॥ वन्यं फलं मूलमथार्द्रपर्णं शुष्कं तदेवेति नृपः क्रमेण । प्रकल्पयन् भक्ष्यमपेततृष्णो दर्भास्तृतं स्थण्डिलमध्यशेत ॥५७॥ वे क्रम से पहले वन के फल, फिर कन्द-मूल, फिर हरे पत्ते और फिर सूखे पत्ते खाते थे एवं तृष्णा छोड़कर एक छोटे से मिट्टी के चबूतरे पर दर्भ का आसन बिछा कर सोते थे ॥५७॥ श्रद्धासमृद्धागमसम्प्रदायसत्वानुरूपैरखिलो पहारैः । त्रिसन्ध्यमेवान्धकवैरिजायामाराधयामास धरावतंसः ॥५८॥ पूर्ण श्रद्धालु भूमि-भूषण राजा ने आगम सम्प्रदाय के अनुकूल सब प्रकार की विधियों से— प्रातः, मध्याह्न और सायं—तीनों समय, शिवपत्नी भगवती की आराधना की ॥५८॥ कुर्वन् यथाकालमुपात्तकृत्यं निराकृतप्रावरणो नृवीरः । अम्बापदद्वन्द्वनिवेशितात्मा न द्वन्द्वदुःखानि विदाञ्चकार ॥५९॥ यथासमय विधिवत् कार्य करने वाले नरपति का अज्ञान आवरण हटने लगा और भगवती के चरणों में मन लगा देने के कारण उन्हें द्वन्द्व दुःखों का अनुभव नहीं हुआ ॥५९॥ यमेन नित्यं नियमेन चायं नितान्तमासादितभावशुद्धिः । सिंहासनार्होऽप्युचितं मुनीनां पद्मासनं शान्तमना बबन्ध ॥६०॥ नित्य यम-नियम का पालन करने से उन्हें उत्कृष्ट सत्त्व-शुद्धि प्राप्त हुई । राजसिंहासन पर बैठने वाले विश्वपति अब शान्तमना होकर मुनियों के योग्य पद्मासन लगा कर बैठने लगे ॥६०॥ सप्राणपञ्चेन्द्रियसंयमेन स निस्तरङ्गं निजमन्तरङ्गम् । नासाग्रसंदंशितशान्तदृष्टिर्नियोजयामास निजेष्टदेवे ॥६१॥ पंच प्राण और पंच इन्द्रियों का संयम करके तथा नासिका के अग्र भाग पर दृष्टि गाड़ कर शान्तमना राजा ने अपने (चंचल) मन को स्थिर बना कर इष्ट देवी भगवती में लीन कर दिया ॥६१॥ सर्वेन्द्रियाणां विनिरुध्य वृत्तिं स वीतसङ्कल्पतया कथञ्चित् । शनैः शनैः सानुमतस्तनूजामन्तःपदव्याः पथिकीञ्चकार ॥६२॥ संकल्प-विकल्प से ऊपर उठ कर, इन्द्रियों की विषय-वृत्ति को रोक कर, चित्त-वृत्ति का निरोध कर, राजा ने धीरे धीरे भगवती पार्वती को अपने अन्तःकरण में उतार लिया ॥६२॥ (५६) चन्द्रः शुक्लपक्षे सुधाप्रदानेन देवान् रञ्जयति, असौ राजा यज्ञादिकर्मसु हवीरूपसुधादानेन तान् रञ्जयति, पवित्रं पक्षं चाश्रयति । वृत्तं बिम्बं चरित्रं च ।