भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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३४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् देने वाली हैं और आप ही 'मुक्ति' (मोक्ष) देने वाली हैं। (आप भुक्तिमुक्तिप्रदायिका हैं।) आप ही प्राणियों की सच्ची बन्धु हैं। आप ही बन्धनरूप और बन्ध-हेतु हैं तथा आप ही मोक्ष- रूप और बन्धन छुड़ाने वाली हैं ॥१२॥ निर्गुणोऽपि सगुणस्त्वदाश्रयात् त्वां विना बहुगुणोपि निर्गुणः । इन्दिरे ! हरिहृदेकमन्दिरे ! त्वत्कृपाऽल्पतपसां न पार्श्वगा ॥१३॥ निर्गुण परशिव भी आपके कारण सगुण प्रतीत होते हैं। आपका आश्रय लेने पर गुण- हीन भी गुणवान् बन जाते हैं। आपके बिना गुणवान् भी गुण-हीन हैं। आप पराशक्ति हैं (और जिस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु, महेश आपके रूप हैं, उसी प्रकार सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती भी आपके रूप हैं)। आप ही विष्णु के हृदय-मन्दिर की देवी लक्ष्मी हैं (और आप ही सरस्वती और पार्वती हैं)। आपकी कृपा अल्प-पुण्य वालों के भाग्य में नहीं है ॥१३॥ शुम्भदैत्यदलने ! रणाङ्गणे का प्रशस्तिरधिका चकास्ति ते । अप्यखण्डजगदण्डमण्डलं चण्डि ! खण्डयसि हेलयैव यत् ॥१४॥ शुम्भ दैत्य को मारने वाली देवि ! जब आप उग्ररूप धारण कर चण्डी बन जाती हैं तब रण क्षेत्र में आपकी क्या प्रशंसा की जाय, आप सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को सहज ही में तोड़ सकती हैं ॥१४॥ त्वामपारमहिमोपबृंहितां स्तोतुमुद्यमवती मनागसौ । किं करोमि रसना निरङ्कुशा शङ्कते न खलु शङ्करप्रिये ! ॥१५॥ अपार महिमा से अलंकृत आपकी स्तुति करने के लिये मेरी निरंकुश जिह्वा थोड़ा प्रयत्न कर रही है। देवि ! मैं क्या करूँ, यह निरंकुश जिह्वा मानती ही नहीं ॥१५॥ त्वद्गुणश्रवणसाधनं मया नाश्रितं सदुपदेशिनां सदः । त्वं गता श्रुतिपथं यदि क्वचिन् नादरान् मनसि चाधिरोपिता ॥१६॥ आपके गुण को सुनने के लिये मैंने सदुपदेश देने वाले विद्वानों के समाज का आश्रय नहीं लिया। यदि कभी आपकी महिमा सुन भी ली तो आपको अपने मनमें आदरपूर्वक स्थित नहीं किया ॥१६॥ मादृशाऽलसतया शयालुना कुर्वताप्यनुपपत्तिकल्पनाम् । नैव पाणियुगलं पवित्रितं शैलपुत्रि ! परिचर्यया तव ॥१७॥ मुझ जैसे आलसी और (अज्ञानान्धकार में) सोने वाले मनुष्य ने, अनेक प्रकार की अयुक्त कल्पनायें करते रहने पर भी, कभी, हे पार्वति ! आपकी सेवा करके इन दोनों हाथों को पवित्र नहीं किया ॥१७॥ चिन्तनेन सुलभा त्वमन्तरं प्राणिनां श्रितवती निरन्तरम् । मानसं तदपि न क्षणं मया पादयोस्तव शिवे ! निवेशितम् ॥१८॥ मङ्गलमयि ! आप अन्तर्यामिनी हैं। सब प्राणियों के अन्तःकरणों में निरन्तर निवास करने वाली हैं। आप भक्तिपूर्वक चिन्तन करने पर सुलभ हैं। फिर भी मुझ अज्ञानी ने कभी एक क्षण के लिये भी अपने मन को आपके चरणों में अर्पण नहीं किया ॥१८॥ (१३) सरस्वतीलक्ष्मीपार्वतीनां वस्तुतः पराशक्तिस्वरूपाणामैक्यात् 'इन्दिरे हरिहृदेकमन्दिरे' इति पार्वत्याः सम्बोधनं सुसङ्गतम् ।