सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थः सर्गः ३५ दुर्निवारतरदुष्टवासनासूत्रसंयमितचेतसा मया । एवमेव जननि ! प्रमाद्यता यापितानि जनुषां शतान्यपि ॥१९॥ बड़ी कठिनता से दूर की जाने योग्य, प्रबल और दुष्ट वासनाओं की रस्सी से मेरा मन बँध रहा है (जैसे 'पशु' 'पाश' से बँधा रहता है। शैव-दर्शन के अनुसार जीवात्मा 'पशु' है और संसार 'पाश' ।) जननि ! इसी प्रकार अविद्या, कर्म और माया के मलरूपी पाश से बँधे हुये मुझ पशु ने प्रमादवश सैकड़ों जन्म व्यर्थ खो दिये ॥१९॥ तेन तेन विहितेन कर्मणा तासु तासु विविधासु योनिषु । संसरन् शरणमत्र जन्मनि त्वां गतोस्मि कृपया तवेरितः ॥२०॥ नाना प्रकार की योनियों में नाना प्रकार के कर्म करने के कारण जन्म-मृत्यु के इस संसार- चक्र में भ्रमण करता हुआ मैं इस जन्म में आपकी कृपा से प्रेरित होकर आपकी शरण आया हूँ॥२०॥ भूरिजन्मजनितं महेश्वरि ! क्षन्तुमर्हसि ममागसां शतम् । कर्म किञ्चिदपि साध्वसाधु वा यत् करोमि न विना त्वदाज्ञया ॥२१॥ महेश्वरि ! अनेक जन्मों में कृत मेरे सैकड़ों पापों को आप कृपया क्षमा करें। बिना आपकी आज्ञा के कोई अच्छा या बुरा कर्म नहीं करूँगा ॥२१॥ एतदेव जनुषः फलं महत् यत्र वाऽम्ब ! करुणैकपात्रता । किं पुनस्त्रिदशवृन्ददुर्लभं दर्शनं भुवनवन्दिते ! तव ॥२२॥ जननि ! आपकी करुणा के योग्य बन जाना ही इस जन्म का बड़ा भारी फल है। फिर, हे भुवन-वन्दिते ! देवताओं के समूहों के लिये भी दुर्लभ आपके साक्षात् दर्शन की तो बात ही क्या ? ॥२२॥ चञ्चलाञ्चलविलासचञ्चला रत्नकाञ्चनमहीसमृद्धयः । कीर्तिरन्नमति येन शाश्वती वैभवं वितर देवि ! तन्मयि ॥२३॥ चञ्चल अञ्चल वाली तरुणियों के विलास के समान क्षणिक इन रत्न, सुवर्ण, पृथ्वी और साम्राज्य से उत्पन्न सुखों में क्या धरा है ! देवि ! मुझे आप ऐसा वैभवशाली वरदान दें जिस कारण मेरी कीर्ति शाश्वत होकर व्याप्त रहे ॥२३॥ उल्लसद्विशदभक्तिभावितां भारतीमिति निशम्य भूपतेः । बिभ्रती प्रगुणितां प्रसन्नतां तं जगाद जगदम्बिका पुनः ॥२४॥ उन्नत और निष्कपट भक्ति से भरे हुये राजा विश्वपति के इन वचनों को सुनकर जगज्जननी शाकंभरी देवी अत्यधिक प्रसन्न होकर बोलीं—॥२४॥ सन्ततं मम समाश्रयादयं भूपते ! जनपदः प्रतिष्ठितः । नामधेयमपि मामकं दधन्मूलतो लवणमाशु जायताम् ॥२५॥ राजन् ! यह देश (साँभर) मेरे निरन्तर आश्रय से पवित्र है और मेरे ही नाम से (शाकंभरी या साँभर नाम से) विख्यात है। (मेरी कृपा से) अब इसके मूल में शीघ्र नमक बन जायगा ॥२५॥ (२३) चञ्चलान्यञ्चलानि यासां तास्तरुण्यस्तासां विलासवच्चञ्चल्यः क्षणिकाः ।