भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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३६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् धावनाय निजवाहमीरयन् यावतीं भुवमुपैषि तावती । भाविनी लवणसाद् विवर्त्तिता यावदक्षि न दधासि पृष्ठतः ॥२६॥ अपने घोड़े को दौड़ाते हुये और पीछे दृष्टि न डालते हुये आप जितनी भूमि तय कर लेंगे वह सारी भूमि लवणमय बन जायगी ॥२६॥ क्षोणिपैरधिबलैरनुक्षणं खन्यमानदृढमूलबन्धनः । देश एव विलयं व्रजेदतः काञ्चनस्य न खनिर्विनिर्मिता ॥२७॥ मैंने यहाँ सुवर्ण की खान इसलिये नहीं बनाई कि कहीं बलवान् राजाओं द्वारा लोभ के कारण निरन्तर खोदे जाने से दृढ़ मूलबन्धन भी शिथिल हो जाय और यह मेरा देश ही नष्ट हो जाय ॥२७॥ इत्युदीरितवती तिरोदधे तारकारमणमौलिगेहिनी । तन्निदेशमधिमौलि धारयन् दण्डवद् भुवि ननाम भूपतिः ॥२८॥ यह कह कर भगवान् चन्द्रचूड़ की अर्द्धांगिनी अन्तर्धान हो गईं और उनके आदेश को शिरो- धार्य कर राजा ने भूमि पर साष्टाङ्ग दण्डवत् प्रणाम किया ॥२८॥ सोऽधिरुह्य तरुणं तुरङ्गमं रंहसा हसितहेलिवाहनम् । ताडयन्नकरुणं कशाञ्चलैः प्राणुदच्छिथिलवल्गमग्रतः ॥२९॥ फिर एक जवान घोड़े पर चढ़ कर, जो अपने वेग से सूर्य के घोड़ों को मात कर रहा था, लगाम ढीली कर जोर से चाबुक लगाते हुये राजा विश्वपति ने उसे आगे दौड़ाया ॥२९॥ पूर्णमेत्य मतिमान् मनोरथं स प्रणम्य परमेश्वरीं पुनः । गीयमानविभवः पुरोगमैर्निवृतो निववृते निजां पुरीम् ॥३०॥ अपने मनोरथ को पूर्ण करके कार्य से निवृत्त हो तथा फिर भगवती शाकंभरी को प्रणाम करके, आगे चलने वाले लोगों द्वारा गाये जा रहे वैभव वाले बुद्धिमान् राजा विश्वपति शान्ति- पूर्वक अपनी नगरी की ओर चले ॥३०॥ सन्निवृत्तमधिगत्य पार्थिवं बान्धवाः प्रकृतयश्च सैनिकैः । प्रत्युदीयुरथ दूरतो द्रुतं वारिवाहमिव बर्हिणां गणाः ॥३१॥ राजा को वापस आया जान कर बन्धु-वर्ग, प्रजा-जन और सैनिक उनका स्वागत करने के लिये दूर तक चल पड़े, जिस प्रकार वेग से आते हुये मेघ का स्वागत करने के लिये मयूर-वृन्द नाच उठते हैं ॥३१॥ रेणुभिः पिहितहेलिमण्डलं प्रोल्लसद्द्विपनिपीतदिङ्मुखम् । धोरणध्वनितयन्त्रिताम्बरं स्वामिनाऽथ समगङ्स्त तद् बलम् ॥३२॥ इसके बाद राज-सेना (सैनिकों और वाहनों के पैरों से उड़ी) धूल से सूर्य-मंडल को ढाँकती हुई तथा मदोत्कट हाथियों के समूह से दिशाओं के मुखों को चूमती हुई और वाद्यों की ध्वनि से आकाश को गुंजाती हुई अपने स्वामी से मिली ॥३२॥ (२६) लवणसाद् विवर्त्तिता लवणरूपेण परिणता ।