भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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चतुर्थः सर्गः ३७ प्रेक्ष्य पाण्डुशतपत्रसोदरं छत्रमस्य पुरतो रथोपरि । स्यन्दनद्विरदवाजिवाहना वाहनान्निज निजादवातरन् ॥३३॥ विश्वपति के रथ का श्वेत कमल के समान सुन्दर छत्र देख कर रथ, हाथी और घोड़ों पर चलने वाले लोग अपने अपने वाहनों से नीचे उतर पड़े ॥३३॥ यावदुद्यमभृतो भवन्ति ते पादचारगमनोपमन्त्रिणः । तावदेव नरदेवनोदितः स्यन्दनः स्यदवशादुपासदत् ॥३४॥ ज्यों ही वे लोग पैदल राजा के समीप जाने के लिये बढ़े त्यों ही विश्वपति द्वारा प्रेरित रथ वेग से पास आ गया ॥३४॥ स प्रणम्य गुरुवर्गमादरात् सौहृदेन परिरभ्य बान्धवान् । प्रीतिचारुभणितैः कृतानतीनत्यरञ्जयदथानुजीविनः ॥३५॥ विश्वपति ने गुरु-वर्ग को सादर प्रणाम किया, बन्धु-वर्ग को बड़े स्नेह से सीने से लगाया एवं झुक कर प्रणाम करने वाले भृत्य-वर्ग को प्रेम से मनोहर वचनों से प्रसन्न किया ॥३