सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
पृष्ठ 64, कुल 256 में से
संदर्भ में पढ़ेंWait! Look at the end of line 35: "धैर्यसमृद्ध्यादी" or "धैर्यसमृद्ध्यादी"? Let's zoom in on the end of line 35: "स्वस्य धैर्यसमृद्ध्यादी" Line 36: "उत्कृष्टत्वात् । अधुना तु अपरं लवणाकरं निर्मितवता समुद्रस्य यत् जडत्वं मूर्खत्वं जलत्वं च तदेव अवशेषितम् ।"
Check dots before line 4: There are two dots: ".." or dirt/ink spots before "विश्वपति". It's just indentation or ink marks. Same before line 18: ".. विश्वपति".
Everything looks very clear and thoroughly checked.३८ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् सेवनाद् गिरिभुवो भुवः प्रभुं तं निशम्य सपदि प्रतिष्ठितम् । शत्रवोऽपि शरणार्थिनस्तदा भूयसीर्गिरिभुवः सिषेविरे ॥४०॥ विश्वपति को गिरिजा के मन्दिर की भूमि के सेवन के कारण प्रभुतायुक्त एवं प्रतिष्ठित जान कर शत्रु लोग भी, शरणार्थी बन कर, बड़ी बड़ी गिरि-भूमियों का सेवन करने लगे (अर्थात् विश्वपति के शत्रु कहीं शरण न पाकर पर्वतों की बड़ी बड़ी गुफाओं में छिप गये) ॥४०॥ [