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सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

चतुर्थः सर्गः ३५ दुर्निवारतरदुष्टवासनासूत्रसंयमितचेतसा मया । एवमेव जननि ! प्रमाद्यता यापितानि जनुषां शतान्यपि ॥१९॥ बड़ी कठिनता से दूर की जाने योग्य, प्रबल और दुष्ट वासनाओं की रस्सी से मेरा मन बँध रहा है (जैसे 'पशु' 'पाश' से बँधा रहता है। शैव-दर्शन के अनुसार जीवात्मा 'पशु' है और संसार 'पाश' ।) जननि ! इसी प्रकार अविद्या, कर्म और माया के मलरूपी पाश से बँधे हुये मुझ पशु ने प्रमादवश सैकड़ों जन्म व्यर्थ खो दिये ॥१९॥ तेन तेन विहितेन कर्मणा तासु तासु विविधासु योनिषु । संसरन् शरणमत्र जन्मनि त्वां गतोस्मि कृपया तवेरितः ॥२०॥ नाना प्रकार की योनियों में नाना प्रकार के कर्म करने के कारण जन्म-मृत्यु के इस संसार- चक्र में भ्रमण करता हुआ मैं इस जन्म में आपकी कृपा से प्रेरित होकर आपकी शरण आया हूँ॥२०॥ भूरिजन्मजनितं महेश्वरि ! क्षन्तुमर्हसि ममागसां शतम् । कर्म किञ्चिदपि साध्वसाधु वा यत् करोमि न विना त्वदाज्ञया ॥२१॥ महेश्वरि ! अनेक जन्मों में कृत मेरे सैकड़ों पापों को आप कृपया क्षमा करें। बिना आपकी आज्ञा के कोई अच्छा या बुरा कर्म नहीं करूँगा ॥२१॥ एतदेव जनुषः फलं महत् यत्र वाऽम्ब ! करुणैकपात्रता । किं पुनस्त्रिदशवृन्ददुर्लभं दर्शनं भुवनवन्दिते ! तव ॥२२॥ जननि ! आपकी करुणा के योग्य बन जाना ही इस जन्म का बड़ा भारी फल है। फिर, हे भुवन-वन्दिते ! देवताओं के समूहों के लिये भी दुर्लभ आपके साक्षात् दर्शन की तो बात ही क्या ? ॥२२॥ चञ्चलाञ्चलविलासचञ्चला रत्नकाञ्चनमहीसमृद्धयः । कीर्तिरन्नमति येन शाश्वती वैभवं वितर देवि ! तन्मयि ॥२३॥ चञ्चल अञ्चल वाली तरुणियों के विलास के समान क्षणिक इन रत्न, सुवर्ण, पृथ्वी और साम्राज्य से उत्पन्न सुखों में क्या धरा है ! देवि ! मुझे आप ऐसा वैभवशाली वरदान दें जिस कारण मेरी कीर्ति शाश्वत होकर व्याप्त रहे ॥२३॥ उल्लसद्विशदभक्तिभावितां भारतीमिति निशम्य भूपतेः । बिभ्रती प्रगुणितां प्रसन्नतां तं जगाद जगदम्बिका पुनः ॥२४॥ उन्नत और निष्कपट भक्ति से भरे हुये राजा विश्वपति के इन वचनों को सुनकर जगज्जननी शाकंभरी देवी अत्यधिक प्रसन्न होकर बोलीं—॥२४॥ सन्ततं मम समाश्रयादयं भूपते ! जनपदः प्रतिष्ठितः । नामधेयमपि मामकं दधन्मूलतो लवणमाशु जायताम् ॥२५॥ राजन् ! यह देश (साँभर) मेरे निरन्तर आश्रय से पवित्र है और मेरे ही नाम से (शाकंभरी या साँभर नाम से) विख्यात है। (मेरी कृपा से) अब इसके मूल में शीघ्र नमक बन जायगा ॥२५॥ (२३) चञ्चलान्यञ्चलानि यासां तास्तरुण्यस्तासां विलासवच्चञ्चल्यः क्षणिकाः ।

३६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् धावनाय निजवाहमीरयन् यावतीं भुवमुपैषि तावती । भाविनी लवणसाद् विवर्त्तिता यावदक्षि न दधासि पृष्ठतः ॥२६॥ अपने घोड़े को दौड़ाते हुये और पीछे दृष्टि न डालते हुये आप जितनी भूमि तय कर लेंगे वह सारी भूमि लवणमय बन जायगी ॥२६॥ क्षोणिपैरधिबलैरनुक्षणं खन्यमानदृढमूलबन्धनः । देश एव विलयं व्रजेदतः काञ्चनस्य न खनिर्विनिर्मिता ॥२७॥ मैंने यहाँ सुवर्ण की खान इसलिये नहीं बनाई कि कहीं बलवान् राजाओं द्वारा लोभ के कारण निरन्तर खोदे जाने से दृढ़ मूलबन्धन भी शिथिल हो जाय और यह मेरा देश ही नष्ट हो जाय ॥२७॥ इत्युदीरितवती तिरोदधे तारकारमणमौलिगेहिनी । तन्निदेशमधिमौलि धारयन् दण्डवद् भुवि ननाम भूपतिः ॥२८॥ यह कह कर भगवान् चन्द्रचूड़ की अर्द्धांगिनी अन्तर्धान हो गईं और उनके आदेश को शिरो- धार्य कर राजा ने भूमि पर साष्टाङ्ग दण्डवत् प्रणाम किया ॥२८॥ सोऽधिरुह्य तरुणं तुरङ्गमं रंहसा हसितहेलिवाहनम् । ताडयन्नकरुणं कशाञ्चलैः प्राणुदच्छिथिलवल्गमग्रतः ॥२९॥ फिर एक जवान घोड़े पर चढ़ कर, जो अपने वेग से सूर्य के घोड़ों को मात कर रहा था, लगाम ढीली कर जोर से चाबुक लगाते हुये राजा विश्वपति ने उसे आगे दौड़ाया ॥२९॥ पूर्णमेत्य मतिमान् मनोरथं स प्रणम्य परमेश्वरीं पुनः । गीयमानविभवः पुरोगमैर्निवृतो निववृते निजां पुरीम् ॥३०॥ अपने मनोरथ को पूर्ण करके कार्य से निवृत्त हो तथा फिर भगवती शाकंभरी को प्रणाम करके, आगे चलने वाले लोगों द्वारा गाये जा रहे वैभव वाले बुद्धिमान् राजा विश्वपति शान्ति- पूर्वक अपनी नगरी की ओर चले ॥३०॥ सन्निवृत्तमधिगत्य पार्थिवं बान्धवाः प्रकृतयश्च सैनिकैः । प्रत्युदीयुरथ दूरतो द्रुतं वारिवाहमिव बर्हिणां गणाः ॥३१॥ राजा को वापस आया जान कर बन्धु-वर्ग, प्रजा-जन और सैनिक उनका स्वागत करने के लिये दूर तक चल पड़े, जिस प्रकार वेग से आते हुये मेघ का स्वागत करने के लिये मयूर-वृन्द नाच उठते हैं ॥३१॥ रेणुभिः पिहितहेलिमण्डलं प्रोल्लसद्द्विपनिपीतदिङ्मुखम् । धोरणध्वनितयन्त्रिताम्बरं स्वामिनाऽथ समगङ्स्त तद् बलम् ॥३२॥ इसके बाद राज-सेना (सैनिकों और वाहनों के पैरों से उड़ी) धूल से सूर्य-मंडल को ढाँकती हुई तथा मदोत्कट हाथियों के समूह से दिशाओं के मुखों को चूमती हुई और वाद्यों की ध्वनि से आकाश को गुंजाती हुई अपने स्वामी से मिली ॥३२॥ (२६) लवणसाद् विवर्त्तिता लवणरूपेण परिणता ।

चतुर्थः सर्गः ३७ प्रेक्ष्य पाण्डुशतपत्रसोदरं छत्रमस्य पुरतो रथोपरि । स्यन्दनद्विरदवाजिवाहना वाहनान्निज निजादवातरन् ॥३३॥ विश्वपति के रथ का श्वेत कमल के समान सुन्दर छत्र देख कर रथ, हाथी और घोड़ों पर चलने वाले लोग अपने अपने वाहनों से नीचे उतर पड़े ॥३३॥ यावदुद्यमभृतो भवन्ति ते पादचारगमनोपमन्त्रिणः । तावदेव नरदेवनोदितः स्यन्दनः स्यदवशादुपासदत् ॥३४॥ ज्यों ही वे लोग पैदल राजा के समीप जाने के लिये बढ़े त्यों ही विश्वपति द्वारा प्रेरित रथ वेग से पास आ गया ॥३४॥ स प्रणम्य गुरुवर्गमादरात् सौहृदेन परिरभ्य बान्धवान् । प्रीतिचारुभणितैः कृतानतीनत्यरञ्जयदथानुजीविनः ॥३५॥ विश्वपति ने गुरु-वर्ग को सादर प्रणाम किया, बन्धु-वर्ग को बड़े स्नेह से सीने से लगाया एवं झुक कर प्रणाम करने वाले भृत्य-वर्ग को प्रेम से मनोहर वचनों से प्रसन्न किया ॥३

Wait! Look at the end of line 35: "धैर्यसमृद्ध्यादी" or "धैर्यसमृद्ध्यादी"? Let's zoom in on the end of line 35: "स्वस्य धैर्यसमृद्ध्यादी" Line 36: "उत्कृष्टत्वात् । अधुना तु अपरं लवणाकरं निर्मितवता समुद्रस्य यत् जडत्वं मूर्खत्वं जलत्वं च तदेव अवशेषितम् ।"

Check dots before line 4: There are two dots: ".." or dirt/ink spots before "विश्वपति". It's just indentation or ink marks. Same before line 18: ".. विश्वपति".

Everything looks very clear and thoroughly checked.३८ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् सेवनाद् गिरिभुवो भुवः प्रभुं तं निशम्य सपदि प्रतिष्ठितम् । शत्रवोऽपि शरणार्थिनस्तदा भूयसीर्गिरिभुवः सिषेविरे ॥४०॥ विश्वपति को गिरिजा के मन्दिर की भूमि के सेवन के कारण प्रभुतायुक्त एवं प्रतिष्ठित जान कर शत्रु लोग भी, शरणार्थी बन कर, बड़ी बड़ी गिरि-भूमियों का सेवन करने लगे (अर्थात् विश्वपति के शत्रु कहीं शरण न पाकर पर्वतों की बड़ी बड़ी गुफाओं में छिप गये) ॥४०॥ [

धनुर्धरः ।-> wait,काण्डीरः धनुर्धरः । * Look atकाण्डीरः: yes, it has visarga! (४९) काण्डीरः धनुर्धरः ।`

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    Top header line: चतुर्थः सर्गः (center), ३९ (right)

    Main text: उपरतमवगत्य वज्रसूनुं यवनपतिर्जवेन वाजिनाऽथ । सहचरितचमूचरस्तरस्वी समरसमुत्कमनास्ततार सिन्धुम् ॥४७॥ वज्रपुत्र विश्वपति को कैलासवासी जान कर यवनपति वेगशील अश्व पर आरूढ़ हो, अपने साथ एक बड़ी सेना लेकर, वेग से सिन्धु के पार, युद्ध की इच्छा से, आया ॥४७॥ अभिपतितुमुदग्रानुद्धतान् पारसीकान् करिण इव मदान्धान् दूतवक्त्राद् विदित्वा । हरिरिव हरिराजस्तान् नियन्तुं नियन्ता सममुचितबलेन द्राक् प्रतीचों प्रतस्थे ॥४८॥ [L

४० सुर्जनचरितमहाकाव्यम् हूणाः स्थूणा इवासन् तनयधनसुहृच्छोकसंदानदूनाः मद्राः स्वीकृत्य भद्राकरणमपि निजं त्यक्तभद्रासनास्थाः । चीना मन्दाक्षहीनाः सपदि रणमुखे दुद्रुवुर्दीनदीना म्लेच्छाः स्वेच्छाविहारं प्रणिजहुरितरे प्राप्य मूर्च्छाविरामम् ॥५२॥ पुत्र, धन और मित्र के शोक के सन्ताप से दुखी हूण स्तम्भ के समान स्तंभित हो गये । मद्र देश के लोगों ने अपने राजसिंहासनों की आस्था छोड़कर (यतियों के समान) शिरोमुण्डन स्वी- कार कर (वन की ओर प्रस्थान किया) । चीन देश के लोग अपनी छोटी-छोटी आँखों से भी हीन हो अत्यन्त दीन बन कर शीघ्र रण से भाग गये । अन्य म्लेच्छ मूर्च्छित होकर स्वेच्छा विहार से हीन हो गये ॥५२॥ जित्वैवं यवनाञ् जवेन विजयश्रीचिह्नमुर्वीपति- दुर्गं योधपुरं च मण्डपपुरस्याभ्यर्णतो निर्ममे । यस्याद्यापि विलोकनात् स्मृतपुरावृत्तास्तु तुच्छा जनाः कम्पार्ताः पतितं विदन्ति न शिरस्त्राणं पुरस्त्रासतः ॥५३॥ राजा हरिराज ने इस प्रकार उन यवनों को वेग से जीत कर अपनी विजय-लक्ष्मी का स्मारक योधपुर (जोधपुर) नामक दुर्ग मण्डपपुर के समीप बनवाया । आज भी जिस दुर्ग को देखकर प्राचीन वृत्त का स्मरण कर भय से कम्पित होने वाले तुच्छ पुरुषों को अपनी नीचे गिर जाने वाली पग- ड़ियों तक का बोध नहीं होता ॥५३॥ इति सुर्जनचरितमहाकाव्ये चतुर्थः सर्गः (५२) भद्राकरणं सर्वमण्डनम् । त्यक्ता सिंहासनेषु आस्था यैस्ते ।

६ पञ्चमः सर्गः सुरद्विषः क्रव्यभुजो द्विषस्तान् निहत्य वीर्याधिकदुर्दुरूहान् । जयश्रियं राम इवात्मकान्तामसौ समुद्धृत्य पुरीं प्रतस्थे ॥ १ ॥ हरिराज उन देव-द्वेषी, मांसभक्षी, अपने पराक्रम के कारण अत्यन्त अभिमानी, यवन शत्रुओं को मार कर एवं विजय की लक्ष्मी को अपने साथ लेकर, राक्षसों को मार कर अपनी प्रिया सीता को साथ ले अयोध्या जाने वाले राम के समान, अपनी नगरी की ओर चले ॥ १ ॥ अजायतास्मादथ सिंहराजः सिंहोर्जितो यस्य मृधे द्विषन्तः । विनेशुराशु स्फुटसिंहनादैर्नृसिंहनादैरिव दानवेन्द्राः ॥ २ ॥ इन हरिराज के सिंह के समान बलवान् सिंहराज नामक पुत्र उत्पन्न हुये जिनके भीषण सिंहनादों से युद्ध में भयभीत होकर शत्रु-गण, नृसिंह के नादों से भयभीत राक्षसों के समान, शीघ्र नष्ट हो गये ॥ २ ॥ यः पक्षवेगाद् विघटय्य दूराद् दुरन्तमग्रे परवाहिनीशम् । सुधां गरुत्मानिव यत्नगुप्तामनन्यलभ्यां श्रियमाजहार ॥ ३ ॥ जिन्होंने अपनी सेना के बल से प्रबल शत्रु सेनापति को दूर से ही भगा कर, अपने पंखों के वेग से शत्रुओं के प्रबल सेनापति को दूर से ही भगा कर बड़े यत्न से रक्षित अनन्यलभ्य अमत को हरने वाले गरुड़ के समान, यत्नपूर्वक रक्षित तथा अन्य पुरुषों द्वारा अप्राप्य राज्यश्री का हरण किया (गरुड़ अपनी माता विनता को विमाता कद्रू के दासत्व से छुड़ाने के लिये स्वर्ग से अमृत हर लाये थे) ॥ ३ ॥ स्वबन्धुभिर्वन्ध्ययशोऽभिमानैः स्वप्राणरक्षानिपुणैर्निरस्ताः । बन्दीकृता विद्विषतां कुमारीः सोऽन्वग्रहीद् दास्यपदे निधाय ॥ ४ ॥ जो अपनी ही प्राण-रक्षा करने में चतुर थे और जिनके यश का अभिमान व्यर्थ सिद्ध हो चुका था ऐसे अपने बन्धुओं द्वारा असहाय छोड़ दी गईं शत्रुओं की कुमारियों को सिंहराज ने बन्दी बना कर अपनी दासियों के रूप में ग्रहण किया ॥ ४ ॥ नियोजिताः काश्चन वीजनाय भयादिदमपूर्व्वतया विमूढाः । स्खलन्ति शश्वद् वलयानि बालाः प्रकोष्ठमूलेषु निवेशयन्त्यः ॥ ५ ॥ क्षणं दृगम्बुस्तिमितोत्तरीयव्यक्तस्तनोपान्तधृतैकहस्ताः । करस्थबालव्यजनानि दीर्घैरवीजयन् निःश्वसितैरशीतैः ॥ ६ ॥ उनमें से कुछ कुमारियाँ, जो पंखा झलने के कार्य में नियुक्त की गईं थीं, भय से कर्तव्य-विमूढ़ होकर अपनी नीचे खिसकने वाली चूड़ियों को (दुःख से दुर्बल) हाथों के ऊपरी भाग में बार बार (३) गरुडः स्वमातरं विनतां विमातुः कद्रूवाः दास्यान् मोचयितुं देवान् पराजित्य स्वर्गात् सुधामाजहारेति कथाऽत्राऽनुसन्धेया ।

४२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् सरकाते रहने के कारण, सदा अपने कर्तव्य में त्रुटियाँ करती थीं । वे अपने आँसुओं से गीली साड़ी के वक्षःस्थल से चिपक जाने के कारण प्रकटित आकार वाले स्तनों पर क्षण भर लज्जावश एक हाथ धर कर (राजा को पंखा न झल कर) दूसरे हाथ में स्थित पंखे को ही अपनी लंबी और गरम साँसों से पंखा झलने लगीं ॥५-६॥ नितान्तमादर्शमपि प्रसन्नं निश्वासधाराभिरथान्धयन्ती । क्लान्ता चिरं काचन मार्जनेन श्यामं दधौ पाणिमिवाननाब्जम् ॥ ७ ॥ खूब चमकते हुये शीशे को भी अपनी गरम साँस से अन्धा (धुंधला) बनाने वाली और कार्य भार से थकी हुई किसी कुमारी का मुख-कमल भी, माँजने के कारण काले पड़े हुये हाथ के समान, दुःख से काला पड़ गया ॥ ७ ॥ आदाय ताम्बूलकरण्डमन्या कलङ्कमेवात्मकुलस्य कन्या । नालं विमोक्तुं न च वोढुमग्रे व्यग्रा न चक्रे कतमां व्यवस्थाम् ॥ ८ ॥

पञ्चमः सर्गः ४३ अनङ्गसर्वस्वमथाङ्गमङ्गं तारुण्यसारं तरलायताक्षी । सा बिभ्रती विभ्रमकौशलेन विशां पतिं तं वशमानिनाय ॥१३॥ चञ्चल और विशाल नेत्रों वाली मनोरमाने, जिनका प्रत्येक अंग मानों यौवन का सार और कामदेव का सर्वस्व था, अपने हाव-भाव के कौशल द्वारा सिंहराज को वश में कर लिया ॥ १३ ॥ तयोस्तथान्योन्यमनोऽनुवृत्तौ सदानुकूलव्यवसायभाजोः । निशीथिनीभिः कियतीभिरेव जगाम काष्ठां प्रणयानुबन्धः ॥१४॥ सदा एक दूसरे की इच्छा के अनुकूल व्यवहार करने वाले उन दम्पत्ति का प्रेम कुछ रात्रियों में ही पराकाष्ठा पर पहुँच गया ॥१४॥ तस्याः प्ररूढेन स सौहृदेन सन्दानितान्तःकरणः सदैव । अमन्यत स्वं खलु सापराधं छायावलोकेऽप्यपराङ्गनायाः ॥१५॥ मनोरमा ने अपने सुदृढ़ प्रेम-पाश से सिंहराज के मन को इतना बन्दी बना लिया कि वे किसी दूसरी स्त्री की छाया तक देखने में स्वंयं को अपराधी समझने लगे थे ॥१५॥ समृद्धराज्यो बहुभार्यतायां राजोचितायामपि सिंहराजः । वितीर्यमाणा अपि वीतदोषा नाङ्गीकरोति स्म नरेन्द्रकन्याः ॥१६॥ समृद्ध साम्राज्य के अधिपति सिंहराज ने, अनेक रानियाँ रखना राजाओं की प्रथा के अनुकूल होत हुये भी, अन्य राजाओं द्वारा आग्रहपूर्वक दी जाने वाली दोषरहित राजकुमारियों को भी स्वीकार नहीं किया ॥१६॥ प्रतीक्षमाणः सुतमात्मतुल्यं मनोरमायां मनुजाधिनाथः । पराङ्मुखः सोऽन्यपरिग्रहेषु समाहितात्मा समयं निनाय ॥१७॥ अन्य राजकन्याओं के पाणिग्रहण में विरक्त जितेन्द्रिय सिंहराज मनोरमा के गर्भ में (रूप, गुण, शील आदि में) अपने तुल्य पुत्र के आने की प्रतीक्षा करते हुये समय व्यतीत करने लगे ॥१७॥ उपासितारौ सततं सुतार्थे तत्रोपयुक्तान्यथ दैवतानि । तौ दम्पती संप्रयतौ प्रयत्नात् पृथग्विधान्याददतुर्व्रतानि ॥१८॥ पुत्र की कामना के लिये विविध देवताओं की पूजा करने वाले उन सावधान और वशी दम्पती ने बड़े प्रयत्न से भिन्न भिन्न व्रत स्वीकार किये ॥१८॥ ऋत्विग्भिरभ्यस्तसमस्ततन्त्रैः सदागमाऽऽसादितसिद्धमन्त्रैः । अप्रीणयत् पुत्रदपुण्यलिप्सुः सप्तार्चिषं सोऽर्पितसम्यगृद्धिः ॥१९॥ सम्पूर्ण तन्त्रों का अभ्यास करने वाले एवं श्रेष्ठ आगमों के सिद्धि दायक मंत्रों को सिद्ध करने वाले श्रोत्रिय ब्राह्मणों द्वारा सम्पादित पुत्रेष्टि यज्ञ में पुत्र देनेवाले पुण्य को प्राप्त करने की इच्छा वाले तथा ब्राह्मणों को समृद्धि दने वाले राजा सिंहराज ने यज्ञ की अग्नि को उत्कृष्ट हव्य पदार्थों द्वारा प्रसन्न किया ॥१९॥ (१५) सन्दानितं निगडितं अन्तःकरणं यस्य सः ।

४४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् भूरीणि भूयिष्ठफलानि दानान्यदाद् वदान्यप्रवरः सदापि । उपस्थितायामथ कामनायामन्यैव धन्याऽजनि दानधारा ॥२०॥ दानी-शिरोमणि सिंहराज सदा ही उत्कृष्ट फल वाले विपुल दान दिया करते थे। अब पुत्र की कामना के कारण तो उनकी एक विलक्षण तथा स्तुत्य दान-परंपरा प्रारंभ हुई ॥२०॥ स भारतादिश्रवणे द्विजेन्द्रान् सभारतान् सन्ततमाश्रितोऽपि । सन्तानकादप्यधिकं दुरापं सन्तानकामो मनुते स्म कामम् ॥२१॥ सदा महाभारत आदि पुण्य ग्रन्थों के श्रवण के समय सभारत ब्राह्मण-श्रेष्ठों का आश्रय लेने पर भी, पुत्र की कामना वाले सिंहराज ने अपनी इच्छा को कल्पवृक्ष से भी अधिक दुष्प्राप्य माना ॥२१॥ बोधिद्रुमं बुद्धिमती कथञ्चित् परोत्य पारिप्लवलोचना सा । रूक्षत्वचं वक्षसि योजयन्ती कदर्थनं स्वार्थवशाद् विषेहे ॥२२॥ बुद्धिमती मनोरमा ने, डबडबाई आँखों से पीपल के पेड़ की परिक्रमा करके, पुत्र की कामना के कारण किसी प्रकार उसकी रूखी छाल को वक्षःस्थल पर धारण करने का कष्ट सहा ॥२२॥ वैद्यैः सुविद्यैर्यशसानवद्यैः सिद्धौ प्रसिद्धैरपि शुद्धवृत्तैः । प्रसाधितां सन्ततिमौषधानां सा सन्ततं सन्ततये सिषेवे ॥२३॥ शुद्ध आचरण वाले, अनवद्य यश वाले, सिद्धि में प्रसिद्ध, विद्वान् वैद्यों द्वारा तैयार की गईं नाना प्रकार की ओषधियों का मनोरमा ने सन्तानार्थ निरन्तर सेवन किया ॥२३॥ एवंविधैस्तैर्विविधैरुपायैः प्रयासभाजोप्यवनीभुजोऽस्य । मनोरथे नाऽभवदङ्कुरोऽपि चिरन्तने बीज इवोषरोप्ते ॥२४॥ उपर्युक्त प्रकार के और इनसे भी विविध प्रकार के उपायों द्वारा पुत्रप्राप्ति की इच्छा को पूर्ण करने का प्रयास करने वाले सिंहराज के मनोरथ में, ऊसर भूमि में बोये गये पुराने बीज के समान, ज़रा भी अंकुर नहीं उगा ॥२४॥ सोऽचिन्तयत् सञ्चितपुण्यकर्मा मर्माविधं वीक्ष्य विधेर्विधित्साम् । मनीषिते स्वे नितरान्निराशः प्रियाकरिष्यन् निजपूर्वजानाम् ॥२५॥ संचित पुण्य वाले और पूर्वजों को प्रसन्न करने की इच्छा रखने वाले सिंहराज ने विधि के विधान को मर्मस्पर्शी और विपरीत जानकर अपनी इच्छा की पूर्ति में बिलकुल निराश होकर इस प्रकार विचार किया—॥२५॥ श्रद्धानुबद्धान्यपि वैदिकानि केनापि नाङ्गेन वियोजितानि । कर्माणि हन्त स्वफले पराञ्चि को वेद भावं भवितव्यतायाः ॥२६॥ अत्यन्त श्रद्धा के साथ सांगोपाङ्गतया विधिपूर्वक किये गये वैदिक यज्ञादिक कर्म भी जब अपना फल देने में विमुख हो रहे हैं तो भवितव्यता को कौन जान सकता है ? ॥ २६॥ (२१) सन्तानकात् कल्पद्रुमात् । (२५) प्रियाकरिष्यन् प्रियं विधित्सुरित्यर्थः ।

पञ्चमः सर्गः ४५ वेदानुशिष्टे पथि शिष्टजुष्टे नास्त्येव सन्देहलावावतारः । फलानुमेयस्य महान् ममायमधर्मराशेरशिवो विवर्तः ॥२७॥ शिष्ट पुरुषों द्वारा आश्रित वेद-प्रतिपादित मार्ग में अणुमात्र भी सन्देह नहीं हो सकता । जो कुछ हो रहा है उससे यही अनुमान होता है कि यह सब मेरे संचित पापों के महान् समूह का अमंगलकारी परिणाम है ॥२७॥ नूनं ममान्ते रिपवो दुरन्ता निःशङ्कमस्वामिकमस्मदीयम् । राष्ट्रं ग्रहीष्यन्ति गिरिप्रदेशं विपन्नपारीन्द्रमिव द्विपेन्द्राः ॥२८॥ हमारे बाद निश्चय ही हमारे उग्र शत्रु निःशंक होकर हमारे स्वामी-हीन इस गिरिप्रदेश राज्य को छीन लेंगे, जिस प्रकार सिंह के मर जाने पर गिरिप्रदेश पर हाथी ही राज्य करने लगते हैं ॥२८॥ वृन्दावतीयं कुलराजधानी पाणौ परेषां पतितैव तावत् । अतो निवृत्ता भुवि चाहुवाणवंशस्य वार्तापि यशोविलोपात् ॥२९॥ यह हमारी कुल राजधानी वृन्दावती (बूंदी) निश्चय ही शत्रुओं के हाथ में पड़ जायगी । यश के लुप्त हो जाने से संसार में अब चौहान वंश की वार्ता भी समाप्त हो जायगी ॥२९॥ स्नेहेन पुत्रप्रतिमं ममापि यवीयसः पुत्रमतो युवानम् । राज्येऽभिषेक्ष्यामि समक्षमेव भीमं रिपूणामिह भीमदेवम् ॥३०॥ अतः मैं अब अपने छोटे भाई के पुत्र, शत्रुओं के लिये भयंकर भीमदेव का, जिस पर मेरा भी पुत्रवत्प्रेम है, अपने सामने ही राज्याभिषेक कर देता हूँ ॥३०॥ निश्चित्य चित्तेन विधेयमेवं बुधोपमः प्रेमवशात् प्रियां ताम् । आभाष्य विद्याविशदान् तथान्यानामन्त्र्य मन्त्रिप्रवरांश्च राजा ॥३१॥ दिदेश भीमस्य महाभिषेकसम्भारमाहर्तुमथ स्वभृत्यान् । तेऽप्येतदाज्ञानुपदं तदैव सम्पादयामासुरदीर्घसूत्राः ॥३२॥ इस प्रकार मन में निश्चय कर देवताओं के समान (प्रतापी) सिंहराज ने, अपनी महिषी मनोरमा की प्रेमवश अनुमति प्राप्त कर और अन्य विद्वान् मुख्य मंत्रियों से परामर्श कर, अनुचरों को भीम के राज्याभिषेक की तैयारी करने की आज्ञा दी । कार्य को अविलम्ब पूर्ण करने में कुशल अनुचरों ने भी शीघ्र ही इस आज्ञा का पालन किया ॥३१-३२॥ ततः समाहूय समाहितात्मा हिताय वंशस्य पुरोहितांश्च । समर्पयामास समः स पित्रा भीमाय धीमान् निजमाधिपत्यम् ॥३३॥ तत्पश्चात् जितेन्द्रिय, बुद्धिमान् और भीम के पिता के समान सिंहराज ने वंश के राजपुरो- हित को बुला कर अपना राज्य, वंश के हित के लिये, भीमदेव को सौंप दिया ॥३३॥ तत्रातिभूमिङ्गतमस्य दृष्ट्वा निर्वेदमुद्वेगविदीर्णचेताः । बाष्पाम्बुपूरं, गुरुवत्सलत्वान् नापारयद् वारयितुं कुमारः ॥३४॥ उस समय सिंहराज के वैराग्य को चरम सीमा पर देख कर कुमार का हृदय शोक-सन्तप्त हो गया । भारी वात्सल्य के कारण सिंहराज की अश्रुधारा को रोकने में कुमार भीम भी समर्थ न हो सके ॥३४॥

४६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् तस्याभिषेकप्रभवप्रवाहैरुवाह शैत्यं सुतरां धरित्री । विवेश तस्माद्दवथुः प्रथोयानन्तः परानीकपृथुस्तनीनाम् ॥३५॥ भीम के राज्याभिषेक के जल के प्रवाह से पृथिवी को शीतलता का अनुभव हुआ; किन्तु उसी से शत्रुओं की विशाल स्तनों वाली कामिनियों के हृदय में विपुल सन्ताप होने लगा॥३५॥ निवेशितैकाङ्गुलिरेकमस्य गुरुर्ललाटे तिलकञ्चकार । स्वबान्धवैरुञ्जलिभिः परेषां व्यतीतसंस्थास्तिलका विकीर्णाः ॥३६॥ इधर पितातुल्य सिंहराज ने अपनी एक उँगली से भीम के ललाट में राज्यतिलक किया और उधर शत्रुओं के लिये उनके बन्धु-बान्धवों ने पूरी अञ्जलि द्वारा असंख्य तिलक (तिल) बिखेर दिये (मृतात्मा को सम्बन्धी लोग तिलाञ्जलि देते हैं) ॥३६॥ तमभ्यषिञ्चत् सकृदेव राज्ये गुरुः पयोभिः किल पुष्करोत्थैः । सदाभ्यषिञ्चन् निजगर्भरूपं रिपुस्त्रियोलोचनपुष्करोत्थैः ॥३७॥ पितातुल्य सिंहराज ने भीम का पुष्करतीर्थ के पुनीत जल से एक ही बार अभिषेक किया, किन्तु शत्रुओं की स्त्रियों ने अपने बालकों का, नेत्र रूपी पुष्कर (कमल) से निकले जल से (आँसु- ओं से) सदा अभिषेक किया ॥३७॥ महाभिषेकेण महीयमानं नवोच्छ्रितं सोममिवाम्बुराशेः । मुदा प्रवाष्पः प्रवया युवानमालिङ्गय राजानमिदञ्जगाद ॥३८॥ राज्याभिषेक के कारण बढ़ी हुई महिमा वाले एवं समुद्र से सद्य-स्नात नवोदित उत्तरोत्तर उत्कृष्ट होने वाले द्वितीया के चन्द्र के समान शोभित युवा भीम को प्रौढ़ तथा आनन्दाश्रुयुत सिंहराज ने आलिंगन कर यह शिक्षा दी ॥३८॥ निशम्य मामप्रजमुज्झितास्त्रं कुतर्कचक्राहितवक्रचित्ताः । उद्भावयन्तः किमपि प्रतीपा विप्लावयिष्यन्ति बलेन देशान् ॥३९॥ मुझे निःसन्तान और अस्त्रशस्त्र को त्याग कर वानप्रस्थ आश्रम को अपनाने वाला सुनकर, कुतर्क जाल के कारण अहित और कुटिल मन वाले शत्रु कोई न कोई बहाना खड़ा करके देश में विप्लव मच

पञ्चमः सर्गः ४७ प्रोत्साहयन् साहसिकप्रवीरानुत्कर्तयन् कातरलोकचेतः । दिग्जैत्रयात्रोचितदुन्दुभीनां प्रास्थानिकः प्रादुरभूत् प्रणादः ॥४२॥ दिग्विजय की यात्रा के प्रस्थान के समय साहसी वीरों का उत्साह बढ़ाने वाला और कायर लोगों के चित्त को भयभीत बनाने वाला दुन्दुभियों का प्रबल घोष हुआ ॥४२॥ युगान्तजीमूतनिनादघोरान् तत्तूर्यघोषाननलं विषोढुम् । आकारयामासुरिवात्मपालानाशाः प्रतिश्रुन्मिषतस्तदानीम् ॥४३॥ उस समय प्रलय काल के बादलों की गर्जना के समान भयंकर उस नगाड़ों के घोष को सहने में असमर्थ दिशायें, प्रतिध्वनि के बहाने, मानों अपने स्वामी दिक्पालों को (अपनी रक्षार्थ) बुला रहीं थीं ॥४३॥ चमूचराणां चरणोद्धतैः खं रुन्धद्भिरन्धङ्करणैः खरांशोः । दिक्पालदन्तावलदाननद्यो जम्बालभावं दधिरे रजोभिः ॥४४॥ सैनिकों के पैरों से उड़ी हुई धूल के कारण, जो आकाश को व्याप्त कर रही थी और सूर्य को धुंधला बना रही थी, दिशाओं के हाथियों के मदजल की नदियाँ कीचड़मय बन गईं ॥४४॥ उपायनैः सम्यगुपायविज्ञो विज्ञातसारो मगधाधिनाथः । तमागतं मार्गत एव दूरात् प्रत्युद्गमात् प्रीततरञ्चकार ॥४५॥ मगध देश के राजा, जो भीमदेव के पराक्रम को जानते थे और जो रक्षा के उपाय में कुशल थे, भीमदेव को आया जान कर, दूर मार्ग तक उनके स्वागत के लिये गये और नम्रतापूर्वक विविध बहुमूल्य उपहार देकर उन्हें अत्यन्त प्रसन्न किया ॥४५॥ सङ्ग्रामसीम्नि क्षणदत्तरङ्गानङ्गान्निरङ्गान्नयविद् विधाय । जगाम गङ्गातटवर्त्मनैव गौडोपकण्ठं गरुडोपमानः ॥४६॥ नीतिकुशल भीमदेव ने युद्धक्षेत्र में थोड़ी देर तक सामना करने वाले अंग देशवासियों के अंगों को छिन्न-भिन्न कर दिया और फिर गंगा के तट के मार्ग से गरुड़ के समान बलवान् और वेगगामी भीम गौड़ देश के समीप पहुँचे ॥४६॥ सिन्धोरगाधेऽम्भसि शीर्णरश्मौ निमग्नमूर्त्तौ तरणौ रणेषु । तमोनुदं सोममिवाथ बङ्गास्तमेव राजानमयुः शरण्यम् ॥४७॥ युद्धक्षेत्र में सूर्य के नष्ट-किरण होकर समुद्र के अगाध जल में डूब जाने पर वङ्गदेशवासी अन्धकार को नष्ट करने वाले चन्द्र के समान इस राजा भीम की ही शरण में आये (अर्थात् दिन भर युद्ध करक सायंकाल राजा भीम के शरणागत बन गये) ॥४७॥ कलिङ्गसैन्यं स्वबलात् निरस्य यथा बलं कौरवमुग्रवीर्यम् । जिष्णुर्यशोभिः सह शात्रवाणां जहार वृन्दानि विषाणिनां सः ॥४८॥ प्रबल पराक्रम वाली कलिंग देश के राजा की सेना को अपने बल से परास्त कर विजयी राजा भीम ने शत्रुओं के यश के साथ-साथ उनके उत्तम हाथियों के समूह भी छीन लिये, जिस प्रकार कि (४६) क्षणं दत्तः रङ्गः युद्धः यैस्तान् । (४८) जिष्णुः विजयशीलः, अर्जुनश्च । विषाणिनां गजानां गवाञ्च ।

ाद्" -> wait! Let's look at the letters: यु (yu) ग्म (gma) There is a हलन्त or something? Look at: "युग्माद्"? No! There is an आ-कार! यु (yu) - ग्म (gma) - ा (ā) - द् (d) -> युग्माद् (yugmād)! Wait! Let's re-read: यु - ग्म - ा - द् = युग्माद्! Yes! "समेताज्जग्राह युग्माद् युगपद् द्वयं सः ।" Wait, "समेतात् ग्राह युग्माद् युगपद् द्वयं सः" -> समेतात् (from the united couple) + जग्राह (he took) + युग्मात् (from the pair) + युगपत् (simultaneously) + द्वयं (the two) + सः (he)! Yes! "युग्माद् युगपद् द्वयं सः ।" Look at the Hindi translation: "प्रगाढ़ प्रेम के कारण परस्पर मिले हुये दोनों पति-पत्नी से भीमदेव ने एक साथ दो उपहार ग्रहण किये—" "मिले हुये दोनों पति-पत्नी से" = समेताद् युग्मात्! "एक साथ" = युगपत्! "दो उपहार" = द्वयम्! "ग्रहण किये" = जग्राह! "भीमदेव ने ... सः" = सः! Brilliant! So it is definitely: `रसा

७ पञ्चमः सर्गः ४९ प्राचेतसीं प्राप्य दिशं प्रचेताः पाश्चात्ययोधैर्जववत्तुरङ्गैः । आयोधनं सज्यधनुःसहायः प्रसारयामास पुरःशरौघैः ॥५६॥ पश्चिम दिशा में पहुँच कर प्रकृष्ट चित्त वाले तथा मौर्वीयुत धनुष वाले राजा भीम ने अपने आगे वाणसमूह रखने वाले और वेगगामी घोड़ों वाले पाश्चात्य योद्धाओं से युद्ध छेड़ा ॥५६॥ खसानसाधूनसुभिर्वियोज्य स्वबन्धुभिः सिन्धुतटाधिवासान् । काम्बोजकाम्भोजवने तुषारैः शकान् स काण्डैः शकलीचकार ॥५७॥ दुष्ट खसों को प्राणों से वियुक्त करके तथा सिन्धु तट के वासियों को अपने बन्धुओं से वियुक्त करके, काम्बोज देशवासियों रूपी कमलवन के लिये तुषार रूप बाणों से उन्होंने शकों के टुकड़े टुकड़े उड़ा दिये ॥५७॥ इत्थं पराजित्य पराभिमर्दी नराधिनाथः प्रबलानरातीन् । तुरङ्गरत्नानि पुरङ्गतोऽसौ महार्हतेजांसि जहार तेषाम् ॥५८॥ शत्रु का दमन करने वाले श्रेष्ठ राजा भीमदेव ने इस प्रकार प्रबल शत्रुओं को परास्त करके उनके बड़े तेजस्वी बहुमूल्य तुरंगरूपी रत्नों को हर लिया ॥५८॥ आशामथासाद्य कुबेरगुप्तां स दुःसहं प्रज्वलयन् प्रतापम् । सारं कराक्रान्तिभरेण भास्वान् हिमाद्रिभूमे र्भृशमाचकर्ष ॥५९॥ तद्वश्चात् कुबेर द्वारा रक्षित उत्तर दिशा में जाकर भीमदेव ने हिमालय की भूमि का सार, अपने दुःसह प्रताप को प्रकट करते हुये, सूर्य के समान, करों (कर; किरणों) द्वारा लादे गये भार से, अच्छी तरह खींच लिया ॥५९॥ न कामरूपाक्रमणे तदानीं तेजःप्रकर्षोऽभिनवो ՚ नृपस्य । अयं हि देहप्रभया पुरैव विनापि यत्नं जितकामरूपः ॥६०॥ फिर भीमदेव ने कामरूप (आसाम) देश पर चढ़ाई की । अपने उत्कृष्ट तेज से कामरूप पर आक्रमण करना भीमदेव के लिये नई बात नहीं थी क्योंकि अपने शरीर की कान्ति से वे पहले ही, बिना यत्न किये ही, कामरूप (कामदेव के रूप) को जीत चुके थे ॥६०॥ इत्थं विधाय जगतीजययोग्ययात्रामुत्सादिताप्रतिभटक्षितिपालवर्गः । वृन्दावतीं रुचिरमङ्गलतोरणाङ्कां स प्राविशद् विशदकीर्तिपवित्रिताशः ॥६१॥ इस प्रकार जगद्विजय की यात्रा पूर्ण करके और शत्रु-राजाओं के समूह को नष्ट करके, भीमदेव अपने उज्वल यश से दिशाओं को पवित्र करते हुये, स्वागतार्थ सुन्दर और मांगलिक दरवाजों से सजाई हुई वृन्दावती (बूंदी) नगरी में लौट आये ॥६१॥ ॥ इति सुर्जनचरितमहाकाव्ये पञ्चमः सर्गः ॥

षष्ठः सर्गः तस्य विग्रहदेवोऽभूत् तनयश्चारुविग्रहः । निग्रहे वैरिबृन्दानां बहुशो दत्तनिग्रहः ॥ १ ॥ उन भीमदेव के पुत्र सुन्दर शरीरवाले विग्रहदेव हुये जिन्होंने शत्रुओं को युद्ध में कई बार पराजित किया ॥ १ ॥ पदं पैतामहं तस्मिन्नारोप्य नृपनायकः । प्रपेदे पूर्ववंश्यानां पदवीं वार्द्धकोचिताम् ॥ २ ॥ भीमदेव ने उनको पूर्वजों का राज्य सौंप कर पूर्वजों द्वारा वृद्धावस्था में स्वीकृत वानप्रस्थ आश्रम ग्रहण किया ॥ २ ॥ स्वबलेन विनिर्जित्य गुर्जरान् भृशदुर्जयान् । राज्यं तेषां गुणप्राज्यमथ जग्राह विग्रहः ॥ ३ ॥ विग्रहदेव ने अपने पराक्रम और सेना से अत्यन्त दुर्जय गुर्जरों को जीत कर उनके गुणसमृद्ध राज्य को ले लिया ॥ ३ ॥ यत् पुरं परितो रत्नैः पूरयित्वा प्रजापतिः । यानि शिष्टानि तान्येव नीरधौ निदधे ध्रुवम् ॥ ४ ॥ जिन गुर्जरों के नगर को ब्रह्मा जी ने चारों ओर रत्नों से भर कर निश्चय ही बचे-खुचे रत्नों को समुद्र में फेंका था ॥ ४ ॥ आरात् पारायणे पत्युः शृण्वत्यः श्रुतिसंहिताः । यत्र ताः शिक्षयन्ति स्म बहून् पटुगिरः स्त्रियः ॥ ५ ॥ जहाँ वेदपाठी पतियों के समीप वेदों की संहिताओं को सुन कर चतुरवाणी वाली स्त्रियाँ बहुतों को वेद पढ़ाती थीं ॥ ५ ॥ दधत्यो नखरत्नानि रदनच्छदविद्रुमान् । दन्तमुक्ताकलापं च कण्ठकम्बुभिरन्विताः ॥ ६ ॥ पञ्चबाणवणिक्पण्यवीथयो वामलोचनाः । यौवनद्रविणैः पुंभिर्यत्रासेव्यन्त सन्ततम् ॥ ७ ॥ जहाँ नख रूपी रत्नों से, अधर रूपी प्रवालों (मूँगों) से, दाँतरूपी मोतियों के समूहों से और कण्ठ रूपी शंखों से सुसज्जित तिरछे नयनों वाली रमणियाँ कामदेव रूपी जौहरी के बाजार के समान लगती थीं और यौवन रूपी धन वाले पुरुषों से सदा सेवित थीं ॥ ६-७ ॥ (१) दत्तनिग्रहः कृतपराजयो दत्तदण्डो वा ।

षष्ठः सर्गः ५१ सावर्ण्यदिवानिर्णयपीतकौशेयकञ्चुकाः । अविगूढस्वभावत्वादौन्नत्यपरिणाहयोः ॥ ८ ॥ चम्पकप्रतिमाङ्गीनां गाढंगुप्ता अपि स्तनाः । निरावरणवद् यत्र लक्ष्यन्ते स्म विदूरतः ॥ ९ ॥ चम्पे के फूल के समान हलके पीले रंग वाली कामिनियों के चोली के अन्दर अच्छी तरह छिपाये गये स्तन भी, जिनकी पीली रेशमी चोली का रंग शरीर के रंग से मिल रहा था और जिन स्तनों का उभार और विशाल आकार चोली के अन्दर भी नहीं छिप रहा था, दूर से, खुले हुये से दिखाई देते थे ॥ ८-९ ॥ भुजान्दोलरणत्कारिकङ्कणाकारितस्मरा । सविलासपदन्न्यासतारनूपुरकूजिता ॥१०॥ प्रगल्भं सञ्चरन्तीनां यत्र लोलदृशां मुहुः । स्वभावगतिरप्यासीन् नृत्यवच्चित्तहारिणी ॥११॥ जहाँ हाथ हिलाते समय बजने वाले कंकणों की ध्वनि द्वारा मानों कामदेव को बुलाने वालीं, सविलास चाल से चलने के कारण जोर से बजनेवाले नूपुरों की ध्वनि से शोभित, एवं चंचल नेत्र वालीं स्त्रियों की स्वाभाविक चाल भी नृत्य के समान मनोहर लगती थी ॥१०-११॥ यत्र गुर्जरगौराङ्गीदीर्घदृष्टिनिषेवणात् । जगतां विजये कामः सन्दधे दीर्घदर्शिताम् ॥१२॥ जगद् विजय करने के लिये गुर्जर देश की गौरवर्ण वाली रमणियों के विशाल नेत्रों का आश्रय लेकर कामदेव ने दूरदर्शिता से काम लिया ॥१२॥ मृष्टं मुखं मृगाक्षीणां शोणस्थासकरञ्जितम् । बन्धुजीवार्चितस्येन्दोः सन्दधे यत्र बन्धुताम् ॥१३॥ मृगनयनी तरुणियों का स्वच्छ और लाल बिन्दी से सुशोभित मुख लाल बन्धुजीव (गुल- दुपहरिया) पुष्प से पूजित चन्द्रमा के समान लगता था ॥१३॥ तत् पुरं स्ववशे कृत्वा प्रविश्य नगरं निजम् । अनयन् नयवित् कालं निर्वृंतो निर्जिताहितः ॥१४॥ उस नगर को अपने आधीन करके विग्रहदेव अपनी राजधानी में लौट आये । नीतिकुशल राजा शत्रुओं को जीत कर आनन्द से समय बिताने लगे ॥१४॥ अजायत जयो तस्मात् तनुजो मनुजाधिपात् । कीर्तिनिन्दितकुन्देन्दुर्गून्ददेव इति श्रुतः ॥१५॥ राजा विग्रहदेव के, यश से पूर्ण चन्द्र का तिरस्कार करने वाले, विजयी पुत्र गून्ददेव नाम से विख्यात हुये ॥१५॥ (१३) स्थासकं तिलकम् । बन्धुजीवः रक्तवर्णपुष्पविशेषः ।

: ५२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् सुतं वल्लभनामानं लभते स्म स भूपतिः । अगणेया गुणा यस्य स्वर्गिणामपि वल्लभाः ॥१६॥ इन गुन्ददेव के वल्लभ नामक पुत्र हुये जिनके असंख्य गुण देवताओं को भी प्रिय थे ॥१६॥ रागिणापि प्रतापेन सङ्गताया निरन्तरम् । भ्रान्तिभाजोपि यत्कीर्तेः शुद्धिर्व्वर्धिष्णुतामगात् ॥१७॥ रक्त (अनुरक्त; लाल) प्रताप के साथ सहवास करने वाली और इसीलिये (सहवास से दूषित होने की) भ्रान्ति वाली जिन वल्लभ राजा की कीर्ति की शुद्धि (शुद्धता; शुभ्रता) निरन्तर बढ़ती ही गई ॥१७॥ विकत्थमानं विक्रान्त्या भोजं भुजभृतां वरः । तेजसा जितदिक्पालश्चेदिपालमुपाद्रवत् ॥१८॥ अपने तेज से दिक्पालों को जीतने वाले राज-श्रेष्ठ वल्लभ ने पराक्रम की डींग हाँकने वाले चेदि-नरेश भोज पर चढ़ाई की ॥१८॥ स वाहिनीभिः सर्वाभिरबाधितविधित्सितः । अक्रमेण समाक्रामन्नग्रसत् कं धराभृताम् ॥१९॥ अपनी सब सेनाओं से अपनी इच्छा को अबाध रूप से पूर्ण करने में समर्थ वल्लभ ने क्रम का ध्यान न रख कर सब से पहले शत्रु-राजाओं के सिरमौर भोज पर ही आक्रमण किया ॥१९॥ अरुणत् सोऽरुणप्रख्यो वेगाद् वैरिवरूथिनीम् । युगान्ते मुक्तमर्यादो महीमिव महार्णवः ॥२०॥ (सूर्यसारथी) अरुण के समान तेजस्वी वल्लभ ने शत्रु-सेना को रौंद दिया, जिस प्रकार प्रलय के समय सीमा का ध्यान न रखने वाला समुद्र पृथ्वी को रौंद देता है ॥२०॥ स क्षणादकरोद् दक्षः प्रतिपक्षस्य पक्षगान् । सैनिकान् शरवर्षेण सम्पराये पराङ्मुखान् ॥२१॥ युद्ध-कुशल वल्लभ ने युद्ध में शत्रुपक्ष के सैनिकों को अपने बाणों की वर्षा से भगा दिया ॥२१॥ तरस्वी तुरगारूढं गरुत्मानिव पन्नगम् । जीवग्राहं स जग्राह सङ्ग्रामे भोजभूपतिम् ॥२२॥ वेगशील और अश्वारूढ वल्लभ ने युद्ध में राजा भोज को जीवित ही पकड़ लिया जैसे गरुड़ जीवित सर्प को वेग से पकड़ लेता है ॥२२॥ (१७) राज्ञः कीर्तिवनिता प्रेमयुक्तेन परपुंसा सङ्गच्छमानाऽपि तेन सह भ्राम्यन्ती अपि शुद्धेति विरोधः, रक्तवर्णेन प्रतापेन संगताऽपि कीर्तिः रक्ता नाभूत् किन्तु शुभ्रैवेत्यपरो विरोधः, परिहारस्तु प्रजासु प्रेम्णा सर्वत्र प्रभावेण च साहित्यात् विश्वं परिभ्राम्यन्त्या यदीयायाः कीर्तेर्निर्मलता प्रवर्धमानाऽभूदिति । (१९) धराभृतां राज्ञां कं मूर्द्धन्यम् ।

षष्ठः सर्गः ५३ निःसत्वो वीतशौटीर्यः परपाणिस्थजीवनः । सोऽभूत् क्षणादगस्त्येन गृहीत इव सागरः ॥२३॥ उस समय भोज बलहीन, अभिमानहीन और दूसरे के हाथ में स्थित निज जीवन वाला बन कर अगस्त्य मुनि द्वारा आक्रान्त समुद्र के समान लगा जिसके जलचर शान्त हो गये थे, जिसका वेग समाप्त हो गया था और जिसका सारा पानी अगस्त्य की चुल्लू में था ॥२३॥ शीर्णदंष्ट्रो यथा सिंहः प्रलीनास्त्रपरिच्छदः । परवान् पञ्जरावासं सेहे भोजः कथञ्चन ॥२४॥ जिसके अस्त्रशस्त्र रूपी आभूषण छीन लिये गये थे ऐसे भोज ने विवश होकर किसी प्रकार कारावास भोगा जैसे सिंह, जिसकी दाढ़ें तोड़ दी गई हों, विवश होकर किसी प्रकार पिंजरे में रहता है ॥२४॥ तं नियन्त्रितमारोप्य नियन्ता निजदन्तिनि । ययौ विजयनिर्घोषैः साकं शाकम्भरीपुरम् ॥२५॥ नियंत्रित भोज को अपने हाथी पर बैठा कर राजा वल्लभ विजय ध्वनि के साथ शाकंभरी नगरी की ओर रवाना हुये ॥२५॥ कृतप्रायोपवेशं तमन्वकम्पत वल्लभः । कृपैव कृपणे शत्रौ शोभते जयशोभिनाम् ॥२६॥ अनशन लेकर बैठे हुये भोज पर वल्लभ ने दया की । शत्रु के नम्र होने पर जयशील राजाओं को कृपा ही शोभा देती है ॥२६॥ विमोच्य वैरिणं बन्धादथाऽवन्ध्यपराक्रमः । सत्कारैः सान्त्वयामास सौम्यः सापत्रपं नृपः ॥२७॥ जिनका पराक्रम कभी व्यर्थ नहीं गया ऐसे सौम्यमूर्ति वल्लभ ने शत्रु राजा भोज को बन्धन से छुड़ा कर और उसका सत्कार कर लज्जित भोज को सान्त्वना दी ॥२७॥ किरीटेन शिरः शत्रोः स राजा समयोजयत् । उच्चैःशिरस्त्वमेतस्य बभूवाधिकमद्भुतम् ॥२८॥ राजा वल्लभ ने शत्रु के सिर पर किरीट रक्खा, किन्तु इससे उन्हीं का सिर ऊँचा हुआ ॥२८॥ परं संभावयामास सुवर्णाभरणैः प्रभुः । अभूवन्नस्य यशसा सुवर्णाभरणा दिशः ॥२९॥ वल्लभ ने शत्रु को सोने के आभूषणों से सज्जित किया, किन्तु इससे दिशाओं ने उन्हीं के यशरूपी आभूषण धारण किये ॥२९॥ कृत्वा महार्हसंभारैमंहेन्द्रोचितमर्हणम् । तं प्रतिविशदै वाक्यै विससर्ज विशां पतिः ॥३०॥ राजा वल्लभ ने बहुमूल्य उपहारों से भोज का इन्द्रोचित सत्कार किया और प्रेम से सुन्दर वचनों से आश्वासन देकर उन्हें अपनी राजधानी भेज दिया ॥३०॥

५४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् व्रजतः पथि भोजस्य यः श्रुतो दुन्दुभिध्वनिः । स एव वल्लभस्यासीज्जगत्यां जयघोषणा ॥३१॥ जाने वाले भोज के मार्ग में जो उनके नगाड़ों की ध्वनि सुनाई देती थी वही संसार में वल्लभ के विजय की घोषणा थी ॥३१॥ नीत्या नितान्तमित्येवं कृतकृत्यत्वमीयिवान् । अनामयमनाः सम्यक् शशास वसुधां सुधीः ॥३२॥ नीतिवान्, बुद्धिमान् और स्वस्थचित्त वल्लभ ने कृतकृत्य होकर पृथ्वी पर सुन्दर शासन किया ॥३२॥ ततस्तस्मिन् यशःशेषे शेषोपमयशोभरे । अभवत् पृथिवीनाथो रामनाथस्तदात्मजः ॥३३॥ शेष के समान शुभ्र यश वाले वल्लभ के यशःशेष (स्वर्गवासी) हो जाने पर उनके पुत्र रामनाथ राजा हुये ॥३३॥ रामोऽस्य नाथ इत्येतच्चरितैरन्वमीयत । भजन्ते स्वामिशीलं हि भृत्यास्तदनुवर्तिनः ॥३४॥ अनुचर भृत्य स्वामी के शील का अनुकरण करते हैं अतः राजा रामनाथ के गुण और शील के कारण यह अनुमान हुआ कि राम ही इनके नाथ हैं ॥३४॥ सुतोऽभूत् तस्य चामुण्डश्चण्डदोर्दण्डमण्डनः । खण्डितारिचमूमुण्डैश्चामुण्डागणतोषकृत् ॥३५॥ रामनाथ के चामुण्ड नामक पुत्र हुये जो प्रबल भुजयुग से शोभित थे और जिन्होंने शत्रु- सैनिकों के मुण्ड काट काट कर देवी चामुण्डा के गणों को संतुष्ट किया ॥३५॥ सितातपत्रं पुत्राय प्रतिपाद्य ततः पिता । आस्पदं मुनिभिर्मृग्यमारुरोह मरुत्वतः ॥३६॥ पिता रामनाथ ने अपने पुत्र चामुण्ड को श्वेत छत्र सौंप कर, मुनियों द्वारा इच्छित इन्द्र- पद प्राप्त किया ॥३६॥ चारुणा चरितेनाथ चामुण्डो मण्डयञ्जनान् । वृषाङ्कवरिवस्यायां वशी चित्तं न्यवेशयत् ॥३७॥ अपने सुन्दर चरितों से प्रजा को प्रसन्न रखने वाले चामुण्ड ने जितेन्द्रिय होकर भगवान् शिव की सेवा में मन लगाया ॥३७॥ आरोप्य मेदिनीभारं मन्त्रिवृद्धेष्वगृध्नुषु । विततान त्रिनेत्रस्य प्रसादोपयिकीः क्रियाः ॥३८॥ विश्वस्त और वृद्ध मंत्रियों को, जिनको लोभ छू भी नहीं गया था, राज्य-भार सौंप कर चामुण्ड ने शिव को प्रसन्न करने के लिये प्रयत्न प्रारंभ किया ॥३८॥