सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् तस्याभिषेकप्रभवप्रवाहैरुवाह शैत्यं सुतरां धरित्री । विवेश तस्माद्दवथुः प्रथोयानन्तः परानीकपृथुस्तनीनाम् ॥३५॥ भीम के राज्याभिषेक के जल के प्रवाह से पृथिवी को शीतलता का अनुभव हुआ; किन्तु उसी से शत्रुओं की विशाल स्तनों वाली कामिनियों के हृदय में विपुल सन्ताप होने लगा॥३५॥ निवेशितैकाङ्गुलिरेकमस्य गुरुर्ललाटे तिलकञ्चकार । स्वबान्धवैरुञ्जलिभिः परेषां व्यतीतसंस्थास्तिलका विकीर्णाः ॥३६॥ इधर पितातुल्य सिंहराज ने अपनी एक उँगली से भीम के ललाट में राज्यतिलक किया और उधर शत्रुओं के लिये उनके बन्धु-बान्धवों ने पूरी अञ्जलि द्वारा असंख्य तिलक (तिल) बिखेर दिये (मृतात्मा को सम्बन्धी लोग तिलाञ्जलि देते हैं) ॥३६॥ तमभ्यषिञ्चत् सकृदेव राज्ये गुरुः पयोभिः किल पुष्करोत्थैः । सदाभ्यषिञ्चन् निजगर्भरूपं रिपुस्त्रियोलोचनपुष्करोत्थैः ॥३७॥ पितातुल्य सिंहराज ने भीम का पुष्करतीर्थ के पुनीत जल से एक ही बार अभिषेक किया, किन्तु शत्रुओं की स्त्रियों ने अपने बालकों का, नेत्र रूपी पुष्कर (कमल) से निकले जल से (आँसु- ओं से) सदा अभिषेक किया ॥३७॥ महाभिषेकेण महीयमानं नवोच्छ्रितं सोममिवाम्बुराशेः । मुदा प्रवाष्पः प्रवया युवानमालिङ्गय राजानमिदञ्जगाद ॥३८॥ राज्याभिषेक के कारण बढ़ी हुई महिमा वाले एवं समुद्र से सद्य-स्नात नवोदित उत्तरोत्तर उत्कृष्ट होने वाले द्वितीया के चन्द्र के समान शोभित युवा भीम को प्रौढ़ तथा आनन्दाश्रुयुत सिंहराज ने आलिंगन कर यह शिक्षा दी ॥३८॥ निशम्य मामप्रजमुज्झितास्त्रं कुतर्कचक्राहितवक्रचित्ताः । उद्भावयन्तः किमपि प्रतीपा विप्लावयिष्यन्ति बलेन देशान् ॥३९॥ मुझे निःसन्तान और अस्त्रशस्त्र को त्याग कर वानप्रस्थ आश्रम को अपनाने वाला सुनकर, कुतर्क जाल के कारण अहित और कुटिल मन वाले शत्रु कोई न कोई बहाना खड़ा करके देश में विप्लव मच