भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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पञ्चमः सर्गः ४७ प्रोत्साहयन् साहसिकप्रवीरानुत्कर्तयन् कातरलोकचेतः । दिग्जैत्रयात्रोचितदुन्दुभीनां प्रास्थानिकः प्रादुरभूत् प्रणादः ॥४२॥ दिग्विजय की यात्रा के प्रस्थान के समय साहसी वीरों का उत्साह बढ़ाने वाला और कायर लोगों के चित्त को भयभीत बनाने वाला दुन्दुभियों का प्रबल घोष हुआ ॥४२॥ युगान्तजीमूतनिनादघोरान् तत्तूर्यघोषाननलं विषोढुम् । आकारयामासुरिवात्मपालानाशाः प्रतिश्रुन्मिषतस्तदानीम् ॥४३॥ उस समय प्रलय काल के बादलों की गर्जना के समान भयंकर उस नगाड़ों के घोष को सहने में असमर्थ दिशायें, प्रतिध्वनि के बहाने, मानों अपने स्वामी दिक्पालों को (अपनी रक्षार्थ) बुला रहीं थीं ॥४३॥ चमूचराणां चरणोद्धतैः खं रुन्धद्भिरन्धङ्करणैः खरांशोः । दिक्पालदन्तावलदाननद्यो जम्बालभावं दधिरे रजोभिः ॥४४॥ सैनिकों के पैरों से उड़ी हुई धूल के कारण, जो आकाश को व्याप्त कर रही थी और सूर्य को धुंधला बना रही थी, दिशाओं के हाथियों के मदजल की नदियाँ कीचड़मय बन गईं ॥४४॥ उपायनैः सम्यगुपायविज्ञो विज्ञातसारो मगधाधिनाथः । तमागतं मार्गत एव दूरात् प्रत्युद्गमात् प्रीततरञ्चकार ॥४५॥ मगध देश के राजा, जो भीमदेव के पराक्रम को जानते थे और जो रक्षा के उपाय में कुशल थे, भीमदेव को आया जान कर, दूर मार्ग तक उनके स्वागत के लिये गये और नम्रतापूर्वक विविध बहुमूल्य उपहार देकर उन्हें अत्यन्त प्रसन्न किया ॥४५॥ सङ्ग्रामसीम्नि क्षणदत्तरङ्गानङ्गान्निरङ्गान्नयविद् विधाय । जगाम गङ्गातटवर्त्मनैव गौडोपकण्ठं गरुडोपमानः ॥४६॥ नीतिकुशल भीमदेव ने युद्धक्षेत्र में थोड़ी देर तक सामना करने वाले अंग देशवासियों के अंगों को छिन्न-भिन्न कर दिया और फिर गंगा के तट के मार्ग से गरुड़ के समान बलवान् और वेगगामी भीम गौड़ देश के समीप पहुँचे ॥४६॥ सिन्धोरगाधेऽम्भसि शीर्णरश्मौ निमग्नमूर्त्तौ तरणौ रणेषु । तमोनुदं सोममिवाथ बङ्गास्तमेव राजानमयुः शरण्यम् ॥४७॥ युद्धक्षेत्र में सूर्य के नष्ट-किरण होकर समुद्र के अगाध जल में डूब जाने पर वङ्गदेशवासी अन्धकार को नष्ट करने वाले चन्द्र के समान इस राजा भीम की ही शरण में आये (अर्थात् दिन भर युद्ध करक सायंकाल राजा भीम के शरणागत बन गये) ॥४७॥ कलिङ्गसैन्यं स्वबलात् निरस्य यथा बलं कौरवमुग्रवीर्यम् । जिष्णुर्यशोभिः सह शात्रवाणां जहार वृन्दानि विषाणिनां सः ॥४८॥ प्रबल पराक्रम वाली कलिंग देश के राजा की सेना को अपने बल से परास्त कर विजयी राजा भीम ने शत्रुओं के यश के साथ-साथ उनके उत्तम हाथियों के समूह भी छीन लिये, जिस प्रकार कि (४६) क्षणं दत्तः रङ्गः युद्धः यैस्तान् । (४८) जिष्णुः विजयशीलः, अर्जुनश्च । विषाणिनां गजानां गवाञ्च ।