भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 80, कुल 256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 80

५४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् व्रजतः पथि भोजस्य यः श्रुतो दुन्दुभिध्वनिः । स एव वल्लभस्यासीज्जगत्यां जयघोषणा ॥३१॥ जाने वाले भोज के मार्ग में जो उनके नगाड़ों की ध्वनि सुनाई देती थी वही संसार में वल्लभ के विजय की घोषणा थी ॥३१॥ नीत्या नितान्तमित्येवं कृतकृत्यत्वमीयिवान् । अनामयमनाः सम्यक् शशास वसुधां सुधीः ॥३२॥ नीतिवान्, बुद्धिमान् और स्वस्थचित्त वल्लभ ने कृतकृत्य होकर पृथ्वी पर सुन्दर शासन किया ॥३२॥ ततस्तस्मिन् यशःशेषे शेषोपमयशोभरे । अभवत् पृथिवीनाथो रामनाथस्तदात्मजः ॥३३॥ शेष के समान शुभ्र यश वाले वल्लभ के यशःशेष (स्वर्गवासी) हो जाने पर उनके पुत्र रामनाथ राजा हुये ॥३३॥ रामोऽस्य नाथ इत्येतच्चरितैरन्वमीयत । भजन्ते स्वामिशीलं हि भृत्यास्तदनुवर्तिनः ॥३४॥ अनुचर भृत्य स्वामी के शील का अनुकरण करते हैं अतः राजा रामनाथ के गुण और शील के कारण यह अनुमान हुआ कि राम ही इनके नाथ हैं ॥३४॥ सुतोऽभूत् तस्य चामुण्डश्चण्डदोर्दण्डमण्डनः । खण्डितारिचमूमुण्डैश्चामुण्डागणतोषकृत् ॥३५॥ रामनाथ के चामुण्ड नामक पुत्र हुये जो प्रबल भुजयुग से शोभित थे और जिन्होंने शत्रु- सैनिकों के मुण्ड काट काट कर देवी चामुण्डा के गणों को संतुष्ट किया ॥३५॥ सितातपत्रं पुत्राय प्रतिपाद्य ततः पिता । आस्पदं मुनिभिर्मृग्यमारुरोह मरुत्वतः ॥३६॥ पिता रामनाथ ने अपने पुत्र चामुण्ड को श्वेत छत्र सौंप कर, मुनियों द्वारा इच्छित इन्द्र- पद प्राप्त किया ॥३६॥ चारुणा चरितेनाथ चामुण्डो मण्डयञ्जनान् । वृषाङ्कवरिवस्यायां वशी चित्तं न्यवेशयत् ॥३७॥ अपने सुन्दर चरितों से प्रजा को प्रसन्न रखने वाले चामुण्ड ने जितेन्द्रिय होकर भगवान् शिव की सेवा में मन लगाया ॥३७॥ आरोप्य मेदिनीभारं मन्त्रिवृद्धेष्वगृध्नुषु । विततान त्रिनेत्रस्य प्रसादोपयिकीः क्रियाः ॥३८॥ विश्वस्त और वृद्ध मंत्रियों को, जिनको लोभ छू भी नहीं गया था, राज्य-भार सौंप कर चामुण्ड ने शिव को प्रसन्न करने के लिये प्रयत्न प्रारंभ किया ॥३८॥