भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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षष्ठः सर्गः ५५ त्रिसन्ध्यं त्रिविधाः पूजास्त्र्यम्बकस्य विशेषयन् । तप्यते स्म तपस्तीव्रं शैवव्रतपरायणः ॥३९॥ शैवव्रत में परायण चामुण्ड, प्रातः, मध्याह्न और सायं तीनों समय शिव की तीनों प्रकार की विशिष्ट पूजा करके तीव्र तप करने लगे ॥३९॥ तप्ताङ्गारकरालायां सरण्यां सञ्चचार सः। भक्तेरनन्यगामिन्या विशुद्धिमिव दर्शयन् ॥४०॥ मानों अनन्य भक्ति की विशुद्धि दिखाते हुये वे जलते हुये अंगारों के भीषण मार्ग पर भी चले जाते थे ॥४०॥ एवंविधैरथान्यैश्च तपोभिरतिदुष्करैः । प्रादात् प्रीतमनास्तस्मै प्रार्थितं प्रमथाधिपः ॥४१॥ इस प्रकार के तथा अन्य अत्यन्त कठिन तपों से प्रसन्न होकर भगवान् शिव ने उन्हें प्रार्थित वरदान दिया ॥४१॥ स जित्वा जित्वरः सङ्ख्ये यवनानीकनायकान् । शकानामधिपं शक्त्या कारातिथिमकारयत् ॥४२॥ जिसके कारण विजयी चामुण्ड ने अपनी शक्ति से यवन सेना के नायकों को युद्ध में जीता और शकों के स्वामी को रण में जीत कर कैद कर लिया ॥४२॥ सुतं दुर्लभराजाख्यं कृत्वा राजानमार्यधीः । चामुण्डश्चन्द्रचूडस्य लोकं लोकोत्तरं ययौ ॥४३॥ श्रेष्ठबुद्धि वाले चामुण्ड, अपने दुर्लभराज नामक पुत्र को राजा बना कर, भगवान् शिव के लोक कैलास में चले गये ॥४३॥ सुतो दुलसदेवोऽथ जातो दुर्लभराजतः । कुशलो वीरचर्यायां चिरं वसुमतीमशात् ॥४४॥ इन दुर्लभराज के दुलसदेव नामक पुत्र हुये जो वीरों की चर्या में कुशल थे और जिन्होंने बहुत समय तक पृथ्वी पर शासन किया ॥४४॥ तस्माद् विशालयशसो वीशलाख्यः सुतोऽजनि । विषयान् वशयामास विश्वोद्गीतगुणेन यः ॥४५॥ उन विशाल यश वाले दुलसदेव के बीसलदेव नामक पुत्र हुये जिन्होंने विश्व में गाये जाने वाले गुणों द्वारा प्रजा को और विषयों को अपने वश में कर लिया ॥४५॥ जगद्विजयिवीर्येण वज्रपाणिसमत्विषा । शक्तित्रयसनाथेन तेन षाड्गुण्यशोभिना ॥४६॥ आकर्णकृष्टचापेन सङ्गरे कर्णविक्रमम् । कर्णं संयम्य ककुभां कर्णपूरीकृतं यशः ॥४७॥ बीसलदेव ने, जिनका पराक्रम जगत् को विजय करने वाला था, जिनका तेज इन्द्र के समान