सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् था, जो तीनों शक्तियों (प्रभुशक्ति, मंत्रशक्ति और उत्साहशक्ति) से युक्त थे और छहों गुणों (सन्धि, विग्रह, यान आदि) से शोभित थे, युद्ध में कान तक धनुष खींच कर कर्ण के समान पराक्रमी अवन्तिनरेश कर्ण को विजय करके अपने शुभ्र यश को दिशाओं का कर्णफूल बना दिया ॥४६-४७॥ निबध्याऽवन्ध्यनिर्वन्धः समरे कर्णभूपतिम् । आददेऽवन्तिनगरीं जयश्रियमिवापराम् ॥४८॥ अमोघ पराक्रम वाले बीसलदेव ने युद्ध में कर्ण राजा को मार कर अवन्ति नगरी (उज्जैन) को दूसरी विजय-लक्ष्मी के समान ग्रहण किया ॥४८॥ यस्यामुत्पन्नया नित्यं विशालवसुसम्पदा । यथार्थनामधेयत्वं लभते स्म वसुन्धरा ॥४९॥ जिस अवन्ति नगरी में नित्य उत्पन्न होने वाली विशाल वसु (धन-धान्य आदि) सम्पत्ति के कारण पृथ्वी का 'वसुन्धरा' नाम सार्थक होता था ॥४९॥ सौधोत्सङ्गपरिष्वङ्गनिर्वृते यत्र नीरदे । स्थिरसौदामिनीशोभामभजत् कामिनीजनः ॥५०॥ जहाँ के ऊँचे महलों के शिखरों का आलिंगन करके आनन्द से बैठे हुये बादलों में, शिखरा- रूढ़ कामिनियाँ स्थिर बिजलियों की शोभा प्राप्त करती थीं ॥५०॥ महाकालकिरीटस्था कला यत्र कलाभृतः । मालवीमुखपद्मानां द्युतिद्वैगुण्यमादधे ॥५१॥ जहाँ भगवान् महाकालेश्वर के मस्तक पर स्थित चन्द्रमा की कला मालव देश की स्त्रियों के मुख-कमलों की कान्ति को द्विगुणित बना रही थी (वैसे चन्द्रोदय के, समय कमल मुकुलित रहते हैं) ॥५१॥ रिङ्गद्गङ्गोत्तमाङ्गोऽपि यत्राऽनङ्गविमर्दनः । शिप्रारसाभिषेकाय साभिलाषः सदाऽभवत् ॥५२॥ जहाँ कामदेव को भस्म करने वाले भगवान् शिव, मस्तक पर गंगाजी के लहराते हुये भी, शिप्रा नदी के जलाभिषेक की सदा इच्छा रखते थे ॥५२॥ मध्यं दिनेऽपि देवस्य चूडाचन्द्रांशुचुम्बितम् । धारायन्त्रायते यत्र चन्द्रकान्तकृतं गृहम् ॥५३॥ जहाँ मध्याह्न में भी, चन्द्रकान्त मणियों से बना हुआ गृह भगवान् शिव के मस्तक पर स्थित चन्द्रमा की किरणों से चूमा जाकर धारायन्त्र (फौव्वारा) बन रहा था (चन्द्रकिरणों के स्पर्श से चन्द्रकान्त मणियों में से पानी निकलता है) ॥५३॥