सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठः सर्गः ५३ निःसत्वो वीतशौटीर्यः परपाणिस्थजीवनः । सोऽभूत् क्षणादगस्त्येन गृहीत इव सागरः ॥२३॥ उस समय भोज बलहीन, अभिमानहीन और दूसरे के हाथ में स्थित निज जीवन वाला बन कर अगस्त्य मुनि द्वारा आक्रान्त समुद्र के समान लगा जिसके जलचर शान्त हो गये थे, जिसका वेग समाप्त हो गया था और जिसका सारा पानी अगस्त्य की चुल्लू में था ॥२३॥ शीर्णदंष्ट्रो यथा सिंहः प्रलीनास्त्रपरिच्छदः । परवान् पञ्जरावासं सेहे भोजः कथञ्चन ॥२४॥ जिसके अस्त्रशस्त्र रूपी आभूषण छीन लिये गये थे ऐसे भोज ने विवश होकर किसी प्रकार कारावास भोगा जैसे सिंह, जिसकी दाढ़ें तोड़ दी गई हों, विवश होकर किसी प्रकार पिंजरे में रहता है ॥२४॥ तं नियन्त्रितमारोप्य नियन्ता निजदन्तिनि । ययौ विजयनिर्घोषैः साकं शाकम्भरीपुरम् ॥२५॥ नियंत्रित भोज को अपने हाथी पर बैठा कर राजा वल्लभ विजय ध्वनि के साथ शाकंभरी नगरी की ओर रवाना हुये ॥२५॥ कृतप्रायोपवेशं तमन्वकम्पत वल्लभः । कृपैव कृपणे शत्रौ शोभते जयशोभिनाम् ॥२६॥ अनशन लेकर बैठे हुये भोज पर वल्लभ ने दया की । शत्रु के नम्र होने पर जयशील राजाओं को कृपा ही शोभा देती है ॥२६॥ विमोच्य वैरिणं बन्धादथाऽवन्ध्यपराक्रमः । सत्कारैः सान्त्वयामास सौम्यः सापत्रपं नृपः ॥२७॥ जिनका पराक्रम कभी व्यर्थ नहीं गया ऐसे सौम्यमूर्ति वल्लभ ने शत्रु राजा भोज को बन्धन से छुड़ा कर और उसका सत्कार कर लज्जित भोज को सान्त्वना दी ॥२७॥ किरीटेन शिरः शत्रोः स राजा समयोजयत् । उच्चैःशिरस्त्वमेतस्य बभूवाधिकमद्भुतम् ॥२८॥ राजा वल्लभ ने शत्रु के सिर पर किरीट रक्खा, किन्तु इससे उन्हीं का सिर ऊँचा हुआ ॥२८॥ परं संभावयामास सुवर्णाभरणैः प्रभुः । अभूवन्नस्य यशसा सुवर्णाभरणा दिशः ॥२९॥ वल्लभ ने शत्रु को सोने के आभूषणों से सज्जित किया, किन्तु इससे दिशाओं ने उन्हीं के यशरूपी आभूषण धारण किये ॥२९॥ कृत्वा महार्हसंभारैमंहेन्द्रोचितमर्हणम् । तं प्रतिविशदै वाक्यै विससर्ज विशां पतिः ॥३०॥ राजा वल्लभ ने बहुमूल्य उपहारों से भोज का इन्द्रोचित सत्कार किया और प्रेम से सुन्दर वचनों से आश्वासन देकर उन्हें अपनी राजधानी भेज दिया ॥३०॥