सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें: ५२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् सुतं वल्लभनामानं लभते स्म स भूपतिः । अगणेया गुणा यस्य स्वर्गिणामपि वल्लभाः ॥१६॥ इन गुन्ददेव के वल्लभ नामक पुत्र हुये जिनके असंख्य गुण देवताओं को भी प्रिय थे ॥१६॥ रागिणापि प्रतापेन सङ्गताया निरन्तरम् । भ्रान्तिभाजोपि यत्कीर्तेः शुद्धिर्व्वर्धिष्णुतामगात् ॥१७॥ रक्त (अनुरक्त; लाल) प्रताप के साथ सहवास करने वाली और इसीलिये (सहवास से दूषित होने की) भ्रान्ति वाली जिन वल्लभ राजा की कीर्ति की शुद्धि (शुद्धता; शुभ्रता) निरन्तर बढ़ती ही गई ॥१७॥ विकत्थमानं विक्रान्त्या भोजं भुजभृतां वरः । तेजसा जितदिक्पालश्चेदिपालमुपाद्रवत् ॥१८॥ अपने तेज से दिक्पालों को जीतने वाले राज-श्रेष्ठ वल्लभ ने पराक्रम की डींग हाँकने वाले चेदि-नरेश भोज पर चढ़ाई की ॥१८॥ स वाहिनीभिः सर्वाभिरबाधितविधित्सितः । अक्रमेण समाक्रामन्नग्रसत् कं धराभृताम् ॥१९॥ अपनी सब सेनाओं से अपनी इच्छा को अबाध रूप से पूर्ण करने में समर्थ वल्लभ ने क्रम का ध्यान न रख कर सब से पहले शत्रु-राजाओं के सिरमौर भोज पर ही आक्रमण किया ॥१९॥ अरुणत् सोऽरुणप्रख्यो वेगाद् वैरिवरूथिनीम् । युगान्ते मुक्तमर्यादो महीमिव महार्णवः ॥२०॥ (सूर्यसारथी) अरुण के समान तेजस्वी वल्लभ ने शत्रु-सेना को रौंद दिया, जिस प्रकार प्रलय के समय सीमा का ध्यान न रखने वाला समुद्र पृथ्वी को रौंद देता है ॥२०॥ स क्षणादकरोद् दक्षः प्रतिपक्षस्य पक्षगान् । सैनिकान् शरवर्षेण सम्पराये पराङ्मुखान् ॥२१॥ युद्ध-कुशल वल्लभ ने युद्ध में शत्रुपक्ष के सैनिकों को अपने बाणों की वर्षा से भगा दिया ॥२१॥ तरस्वी तुरगारूढं गरुत्मानिव पन्नगम् । जीवग्राहं स जग्राह सङ्ग्रामे भोजभूपतिम् ॥२२॥ वेगशील और अश्वारूढ वल्लभ ने युद्ध में राजा भोज को जीवित ही पकड़ लिया जैसे गरुड़ जीवित सर्प को वेग से पकड़ लेता है ॥२२॥ (१७) राज्ञः कीर्तिवनिता प्रेमयुक्तेन परपुंसा सङ्गच्छमानाऽपि तेन सह भ्राम्यन्ती अपि शुद्धेति विरोधः, रक्तवर्णेन प्रतापेन संगताऽपि कीर्तिः रक्ता नाभूत् किन्तु शुभ्रैवेत्यपरो विरोधः, परिहारस्तु प्रजासु प्रेम्णा सर्वत्र प्रभावेण च साहित्यात् विश्वं परिभ्राम्यन्त्या यदीयायाः कीर्तेर्निर्मलता प्रवर्धमानाऽभूदिति । (१९) धराभृतां राज्ञां कं मूर्द्धन्यम् ।