भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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पृष्ठ 67

६ पञ्चमः सर्गः सुरद्विषः क्रव्यभुजो द्विषस्तान् निहत्य वीर्याधिकदुर्दुरूहान् । जयश्रियं राम इवात्मकान्तामसौ समुद्धृत्य पुरीं प्रतस्थे ॥ १ ॥ हरिराज उन देव-द्वेषी, मांसभक्षी, अपने पराक्रम के कारण अत्यन्त अभिमानी, यवन शत्रुओं को मार कर एवं विजय की लक्ष्मी को अपने साथ लेकर, राक्षसों को मार कर अपनी प्रिया सीता को साथ ले अयोध्या जाने वाले राम के समान, अपनी नगरी की ओर चले ॥ १ ॥ अजायतास्मादथ सिंहराजः सिंहोर्जितो यस्य मृधे द्विषन्तः । विनेशुराशु स्फुटसिंहनादैर्नृसिंहनादैरिव दानवेन्द्राः ॥ २ ॥ इन हरिराज के सिंह के समान बलवान् सिंहराज नामक पुत्र उत्पन्न हुये जिनके भीषण सिंहनादों से युद्ध में भयभीत होकर शत्रु-गण, नृसिंह के नादों से भयभीत राक्षसों के समान, शीघ्र नष्ट हो गये ॥ २ ॥ यः पक्षवेगाद् विघटय्य दूराद् दुरन्तमग्रे परवाहिनीशम् । सुधां गरुत्मानिव यत्नगुप्तामनन्यलभ्यां श्रियमाजहार ॥ ३ ॥ जिन्होंने अपनी सेना के बल से प्रबल शत्रु सेनापति को दूर से ही भगा कर, अपने पंखों के वेग से शत्रुओं के प्रबल सेनापति को दूर से ही भगा कर बड़े यत्न से रक्षित अनन्यलभ्य अमत को हरने वाले गरुड़ के समान, यत्नपूर्वक रक्षित तथा अन्य पुरुषों द्वारा अप्राप्य राज्यश्री का हरण किया (गरुड़ अपनी माता विनता को विमाता कद्रू के दासत्व से छुड़ाने के लिये स्वर्ग से अमृत हर लाये थे) ॥ ३ ॥ स्वबन्धुभिर्वन्ध्ययशोऽभिमानैः स्वप्राणरक्षानिपुणैर्निरस्ताः । बन्दीकृता विद्विषतां कुमारीः सोऽन्वग्रहीद् दास्यपदे निधाय ॥ ४ ॥ जो अपनी ही प्राण-रक्षा करने में चतुर थे और जिनके यश का अभिमान व्यर्थ सिद्ध हो चुका था ऐसे अपने बन्धुओं द्वारा असहाय छोड़ दी गईं शत्रुओं की कुमारियों को सिंहराज ने बन्दी बना कर अपनी दासियों के रूप में ग्रहण किया ॥ ४ ॥ नियोजिताः काश्चन वीजनाय भयादिदमपूर्व्वतया विमूढाः । स्खलन्ति शश्वद् वलयानि बालाः प्रकोष्ठमूलेषु निवेशयन्त्यः ॥ ५ ॥ क्षणं दृगम्बुस्तिमितोत्तरीयव्यक्तस्तनोपान्तधृतैकहस्ताः । करस्थबालव्यजनानि दीर्घैरवीजयन् निःश्वसितैरशीतैः ॥ ६ ॥ उनमें से कुछ कुमारियाँ, जो पंखा झलने के कार्य में नियुक्त की गईं थीं, भय से कर्तव्य-विमूढ़ होकर अपनी नीचे खिसकने वाली चूड़ियों को (दुःख से दुर्बल) हाथों के ऊपरी भाग में बार बार (३) गरुडः स्वमातरं विनतां विमातुः कद्रूवाः दास्यान् मोचयितुं देवान् पराजित्य स्वर्गात् सुधामाजहारेति कथाऽत्राऽनुसन्धेया ।